पढ़े: यर्थाथ गीता के चौथे अध्याय के 31 से लेकर 35 तक श्लोक…

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यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोडस्त्ययज्ञस्य कुतोडन्य: कुरूसत्तम।।31।।

कुरूक्षेष्ठ अर्जुन! यज्ञशिष्टामृतभुजो – यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, जिसे अवशेष छोड़ता है, वह है अमृत। उसकी प्रत्यक्ष जानकारी ज्ञान हैँ उस ज्ञानामृत को भोगने अर्थात् प्राप्त करनेवाले योगीजन यान्ति ब्रह्म सनातनम शाश्वत सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है, जो पूर्ण होते ही सनातक परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। यज्ञ न करें तो आपत्ति क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञरहित पुरूष को पुन: यह मनुष्यलोक अर्थात मानव शरीर भी सुलभ नहीं होता, फिर अन्य लोक कैसे सुखदायी होंगे? उसके लिये तो तिर्यक् योनियाँ सुरक्षित हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। अत: यज्ञ करना मनुष्य मात्र के लिये नितान्त आवश्यक है।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।32।।

इस प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में कहे गय हैं, ब्रह्म के मुख से विस्तारित हैं। प्राप्ति के पश्चात् महापुरूषों के शरीर को परब्रह्म धारण कर लेता है। ब्रह्म से अभिन्न अवस्थावाले उन महात्माओं की बुद्धि मात्र यन्त्र होती है। उनके द्वारा वह ब्रह्म ही बोलता है। उनकी वाणी में इन यज्ञों का विस्तार किया गया है।
इस सब यज्ञों को तू कर्मजान विद्धि कर्म से उत्पन्न हुआ जान। यही पहले भी कह आये हैं- यज्ञ: कर्मसमुद्भव:। उन्हें इस प्रकार क्रियात्मक चलकर जान लेने पर अर्जुन! तू विमोक्ष्यसे संसार बन्धन से पूर्णत: छूट जायेगा। यहाँ योगेश्वर ने कर्म स्पष्ट कर दिया। वह हरकत कर्म है, जिससे उपर्युक्त यज्ञ पूर्ण होते हैं।
अब यदि दैवी सम्पद् का अर्जन, सद्गुरू का ध्यान, इन्द्रियों का संयम, श्वास का प्रश्वास में हवन, प्रश्वास का श्वास में हवन, प्राण-अपान की गति का निरोध खेती करने से होता हो, व्यापार नौकरी या राजनीति करने से होता हो तो आप करिये। यज्ञ तो ऐसी क्रिया है, जो पूर्ण होते ही तत्क्षण परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। बाह्य किसी भी कार्य से आप तत्क्षण ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हों तो कीजिये।
वस्तुत: यह सब के सब यज्ञ चिन्तन की अन्त:क्रियाएँ हैं, आराधना का चित्रण है, जिससे आराध्यदेव विदित होता है। यज्ञ उस आराध्य तक की दूरी तय करने की निर्धारित प्रक्रिया विशेष है। यह यज्ञ श्वास-प्रश्वास, प्राणायाम इत्यादि जिस क्रिया से सम्पन्न होते हैं, उस कार्य प्रणाली का नाम कर्म है। कर्म का शुद्ध अर्थ है- आराधना, चिन्तन।
प्राय: लोग कहते हैं कि संसार में कुछ भी किया जाय, हो गया कर्म। कामना से रहित होकर कुछ भी करते जाओ, हो गया निष्काम कर्मयोग। कोई कहता है कि अधिक लाभ के लिये विदेशी वस्त्र बेचते हैं तो आप सकामी हैं। देश-सेवा के लिये स्वदेशी बेचें तो हो गया निष्काम कर्मयोग। निष्ठापूर्वक नौकरी करें, हानि-लाभ की चिन्ता से मुक्त होकर व्यापार करें, हो गया निष्काम कर्मयोग। जय-पराजय की भावना से मुक्त हो युद्ध करें, चुनाव लड़े, हो गये निष्कर्मी। मरोगे तो मुक्ति हो जायेगी। वस्तुत: ऐसा कुछ भी नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शबदों में बताया कि इस निष्काम कर्म में निर्धारित क्रिया एक ही है- व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन। अर्जुन! तू निर्धारित कर्म को कर। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? श्वास प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों का संयम, यज्ञस्वरूप महापुरूष का ध्यान, प्राणायाम प्राणों का निरोध। यही मन की विजितावस्था है। मन का ही प्रसार जगत है। श्रीकृष्ण के ही शब्दों में , इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:। उन पुरूषों द्वारा चराचर जगत यहीं जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। भला मन के समत्व और जगत के जीतने से क्या सम्बन्ध है? यदि जगत को जीत ही लिया तो रूका कहाँ पर? तब कहते हैं- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर मन भी निर्दोष और समत्व की स्थितिवाला हो गया, अत: वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
सारांशत: मन का प्रसार ही जगत है। चराचर जगत ही हवन सामग्री के रूप में है। मन के सर्वथा निरोध होते ही जगत का निरोध हो जाता है। मन के निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है। यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला पुरूष सनातन ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। यह सभी यज्ञ ब्रह्मस्थित महापुरूषों की वाणी द्वारा कहे गये हैं। ऐसा नहीं कि अलग अलग सम्प्रदायों के साथ अलग-अलग प्रकार के यज्ञ करते हैं, बल्कि ये सभी यज्ञ एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं। यह यज्ञ जिससे होने लगे, उस क्रिया का नाम कर्म है। सम्पूर्ण गीता में एक भी श£ोक ऐसा नहीं है, जो सांसारिक कार्य-व्यापारों का समर्थन करता हो।
प्राय: यज्ञ का नाम आने पर लोग बाहर एक यज्ञ वेदी बनाकर तिल, जौ लेकर स्वाहा बोलते हुए हवन प्रारम्भ कर देते हैं। यह एक धोखा है। द्रव्ययज्ञ दूसरा है, जिसे श्रीकृष्ण ने कई बार कहा। पशुबलि, वस्तु-दाह इत्यादि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।33।।

अर्जुन! सांसारिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ है। यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है उस अमृततत्व की जानकारी का नाम ज्ञान है, ऐसा यज्ञ श्रेयस्कर है, परमकल्याणकारी है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में शेष हो जाते हैं, परिसमाप्यते भली प्रकार समाहित हो जाते हैं। ज्ञान यज्ञ की पराकाष्ठा है। उसके पश्चात कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ देने से उस महापुरूष की कोई क्षति ही होती है।
इस प्रकार भौतिक द्रव्यों से होने वाले यज्ञ भी यज्ञ हैं, किन्तु उस यज्ञ की तुलना में, जिसका परिणाम साक्षात्कार है, उस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। आप करोड़ों का हवन करें, सैकड़ों यज्ञवेदी बना लें, सत्पथ पर द्रव्य लगावें, साधु-सन्त-महापुरूषों की सेवा में द्रव्य लगावें, किन्तु इस ज्ञानयज्ञ की अपेक्षा अत्यन्त अल्प हैं। वस्तुत: यज्ञ श्वास-प्रश्वास का है, इन्द्रियों के संयम का है, मन के निरोध का है, जैसा श्रीकृष्ण अभी बता आये हैं। इस यज्ञ को प्राप्त कहाँ से किया जाय। उसकी विधि कहाँ से सीखें? मन्दिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों में मिलेगा या पुस्तकों में? तीर्थयात्राओं में मिलेगा या स्नान करने से मिलेगा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, उसका तो एक ही स्त्रोत है तत्वस्थित महापुरूष।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:।।34।।

इसलिये अर्जुन! तू तत्वदर्शी महापुरूष के पास जाकर भली प्रकार प्रणत होकर (दण्डवत प्रणाम करके, अहंकार त्यागकर, शरण होकर) भली प्रकार सेवा करके, निष्कपट भाव से प्रश्र करके तू उस ज्ञान को जान। वे तत्व को जाननेवाले ज्ञानीजन तेरे लिय उस ज्ञान का उपदेश करेंगे, साधना पथ पर चलायेंगे। समर्पित भाव से सेवा करने के उपरान्त ही इस ज्ञान को सीखने की क्षमता आती है। तत्वदर्शी महापुरूष परमतत्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन करनेवाले हैं। वे यज्ञ की विधि-विशेष के ज्ञाता हैं और वही आपको भी सिखायेंगे। यदि अन्य यज्ञ होता, तो ज्ञानी-तत्त्वदर्शी की क्या आवश्यकता थी?
स्वयं भगवान के सामने ही तो अर्जुन खड़ा था, भगवान उसे तत्त्वदर्शी के पास क्यों भेजते हैं? वस्तुत: श्रीकृष्ण एक योगी थे। उनका आशय है कि आज तो अनुरागी अर्जुन मेरे समक्ष उपस्थित है, भविष्य में अनुरागियों को कहीं भ्रम न हो जाय कि श्रीकृष्ण तो चले गये, अब किसकी शरण जायँ? इसलिये उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्वदर्शी के पास जाओ। वे ज्ञानीजन तुझे उपदेश करेंगे। और-
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।35।।
उस ज्ञान को उनके द्वारा समझकर तू इस प्रकार ऊिर कभी मोह को प्राप्त नहीं होगा। उनसे दी गयी जानकारी के द्वारा उस पर चलते हुए तू अपनी आत्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूतों को देखेगा अर्थात सभी प्राणियों में इसी का प्रसार देखेगा। जब सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रसार को देखने की क्षमता आ जायेगी, उसके पश्चात तू मुझमें प्रवेश करेगा। अत: उस परमात्मा को पाने का साधन तत्वस्थित महापुरूष के द्वारा है। ज्ञान के सम्बन्ध में, धर्म और शाश्वत सत्य के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण के अनुसार किसी तत्वदर्शी से ही पूछने का विधान है।