इसी यक्ष को लोग त्रैविद्या: प्रार्थना, यजन और समत्व दिलानेवाली विधियों से सम्पादित करते हैं, किन्तु बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं तो मैं स्वर्ग भी देता हूं। उसके प्रभाव से वे इन्द्रपद प्राप्त कर लेते हैं, दीर्घकाल तक उसे भोगते हैं, किन्तु पुण्य क्षीण होने पर वे पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। उनकी क्रिया सही थी, किन्तु भोगों की कामना रहने पर पुनर्जन्म पाते हैं। अत: भोगों की कामना नहीं करनी चाहिये। जो अनन्य भाव से अर्थात मेरे सिवाय दूसरा है ही नहीं- ऐसे भाव से जो निरन्तर मेरा चिन्तन करते हैं, लेशमात्र भी त्रुटिी न रह जाय- ऐसे जो भजते हैं, उनके योग की सुरक्षा का भार मैं अपने हाथ में ले लेता हूं।

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इतना होने पर भी कुछ लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। वे भी मेरी ही पूजा करते हैं, किन्तु वह मेरी प्राप्ति की विधि नहीं है। वे सम्पूर्ण यज्ञों के भोक्ता के रूप में मुझे नहीं जानते अर्थात उनकी पूजा के परिणाम में मैं नहीं मिलता, इसीलिये उनका पतन हो जाता है। वे देवता, भूत अथवा पितरों के कल्पित रूप में निवास करते हैं, जबकि मेरा भक्त साक्षात मुझमें निवास करता है, मेरा ही स्वरूप हो जाता है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस यज्ञार्थ कर्म को अत्यन्त सुगम बताया कि कोई फल-फूल या जो भी श्रद्धा से देता है, उसे मैं स्वीकार करता हूं। अत: अर्जुन! तू जो कुछ आराधना करता है, मुझे समर्पित कर। जब सर्वस्व का न्यास हो जायेगा, तब योग से युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जायेगा और वह मुक्ति मेरा ही स्वरूप है।
दुनिया में सब प्राणी मेरे ही हैं। किसी भी प्राणी से न मुझे प्रेम है न द्वेष, मैं तटस्थ हूं, किन्तु जो मेरा अनन्य भक्त है, मैं उसमें हूं वह मुझ में है। अत्यन्त दुराचारी, जघन्यतम पापी ही कोई क्यों न हो, फिर भी अनन्य श्रद्धा भक्ति से मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है। उसका निश्चय स्थिर है तो वह शीघ्र ही परम से संयुक्त हो जाता है और सदा रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि धार्मिक कौन है। सृष्टि में जन्म लेनेवाले कोई भी प्राणी अनन्य भाव से एक परमात्मा को भजता है, उसका चिन्तन करता है तो वह शीघ्र ही धार्मिक हो जाता है। अत: धार्मिक वह हे, जो एक परमात्मा का सुमिरन करता है। अन्त में आश्वासन देते हैं- अर्जुन! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। कोई शुद्र हो, नीच हो, आदिवासी हो या अनादिवासी या कुछ भी नामधारी हो, पुरूष अथवा स्त्री हो अथवा पापयोगी, तिर्यक योनिवाला भी जो हो, मेरी शरण होकर परमश्रेय को प्राप्त होता है। इसलिये अर्जुन! सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर मेरा भजन कर। फिर तो जो ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली अर्हताओं से युक्त है, उस ब्राह्मण तथा जो राजर्षित्व से स्तर से भजनेवाला है, ऐसे योगी के लिये कहना ही क्या है? वह तो पार ही है। अत: अर्जुन! निरन्तर मुझमें मनवाला हो, निरन्तर नमस्कार कर। इस प्रकार मेरी शरण हुआ तू मुझे ही प्राप्त होगा, जहाँ से पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता।
प्रस्तुत अध्याय में उस विद्या पर प्रकाश डाला गया, जिसे श्रीकृष्ण स्वयं जागृत करते हैं। यह राजविद्य है, जो एक बार जागृत होने पर निश्चित कल्याण करती है। अत:-
ऊँ तत्सदिति श्रीमदद्भगवद्रीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे राजविद्याजगृति नाम नवमोऽध्याय:।।९।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूप उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में राजविद्या-जागृति नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअडग़ड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्रीताया: यथार्थगीता भाष्ये राजविद्याजागृति नाम नवमोऽध्याय:।।९।।
इस प्रकार श्रीमत परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अडग़ड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्रीता के भाष्य यथार्थ गीता में राजविद्या जागृति नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरि: ऊँ तत्सत्।।