पढ़े: यर्थाथ गीता के चौथे अध्याय के 41 से लेकर अन्त तक श्लोक…

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योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसछिंन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्रन्ति धनञ्जय।।४१।।
जिसके कर्म योग द्वारा भगवान में समाहित हो चुके हैं, जिसका सम्पूर्ण संशय परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी द्वारा नष्ट हो गया है, परमात्मा से संयुक्त ऐसे पुरूष को कर्म नहीं बाँधते। योग के द्वारा ही कर्मों का शमन होगा, ज्ञान से ही संशय नष्ट होगा। अत: श्रीकृष्ण कहते हैं-

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मन:।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।४२।।

इसलिये भरतवंशी अर्जुन! तू योग में स्थित हो और अज्ञान से उत्पन्न हुए हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट। युद्ध के लिये खड़ा हो। जब साक्षात्कार में बाधक संशयरूपी शत्रु मन के भीतर है तो बाहर कोई किसी से क्यों लड़ेगा? वस्तुत: जब आप चिन्तन-पथ पर अग्रसर होते हैं, तब संशय से उत्पन्न बाह्य प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में स्वाभाविक हैं। ये शत्रु के रूप में भयंकर आक्रमण करती हैं। संयम के साथ यज्ञ की विधि विशेष का आचरण करते हुए इन विकारों का पार पाना ही युद्ध हैं, जिसका परिणाम परमशान्ति है। यही अन्तिम विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है।
निष्कर्ष –
इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस योग की आरम्भ में मैंने सूर्य के प्रति कहा, सूर्य ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु के प्रति कहा और उनके राजषियों ने जाना। मैंने अथवा अव्यक्त स्थितिवाले ने कहा। महापुरूष भी अव्यक्त स्वरूपवाला ही है। शरीर तो उसके रहने का मकान मात्र है। ऐसे महापुरूष की वाणी में परमात्मा ही प्रवाहित होता है। ऐसे किसी महापुरूष से योग सूर्य द्वारा संचारित होता है। उस परम प्रकाशरूप का प्रसार सुरा के अन्तराल में होता है इसलिये सूर्य के प्रति कहा। श्वास में संचारित होकर वे संस्काररूप में आ गये। सुरा में संचित रहने पर, समय आने पर वही मन में संकल्प बनकर आ जाता है। उसकी महत्ता समझने पर मन में उस वाक्य के प्रति इच्छा जागृत होती है और योग कार्यरूप ले लेता है। क्रमश: उत्थान करते-करते यह योग ऋद्धियों-सिद्धियों की राजर्षित्व श्रेणी तक पहुँचने पर नष्ट होने की स्थिति में जा पहुँचता है, किन्तु जो प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है उसे महापुरूष ही सँभाल लेते हैं।
अर्जुन के प्रश्र करने पर कि आपका जन्म तो अब हुआ है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया-अव्यक्त, अविनाशी, अजन्मा और सम्पूर्ण भूतों में प्रवाहित होने पर भी आत्ममाया, योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को वश में करके मैं प्रकट होता हँू। प्रकट होकर करते क्या हैं? साध्य वस्तुओं को परित्राण देने तथा जिनसे दूषित उत्पन्न होते हैं उनका विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा को स्थिर करने के लिये मैं आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त पैदा होता हँू। मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य है। उसे केवल तत्वदर्शी ही जान पाते हैं। भगवान का आविर्भाव साधक समझ ही नहीं पाता कि यह भगवान बोल रहे हैं या योंही संकेत मिल रहे हैं। आकाश से कौन बोलता है? महाराज जी बताते थे कि जब भगवान कृपा करते हैं, आत्मा से रथी हो जाते हैं तो खम्भे से, वृक्ष से, पत्ते से, शून्य से हर स्थान से बोलते और सँभालते हैं। उत्थान होते होते जब परमतत्व परमात्मा विदित हो जाय, तभी स्पर्श के साथ ही वह स्पष्ट समझ पता है। इसलिये अर्जुन! मेरे उस स्वरूप को तत्वदर्शियों ने देखा और मुझे जानकर वे तत्क्षण मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, जहाँ से पुन: आवागमन में नहीं आते।
इस प्रकार उन्होंने भगवान के आविर्भाव की विधि को बताया कि वह किसी अनुरागी के हृदय में होता है, बाहर कदापि नहीं। श्रीकृष्ण ने बताया मुझे कर्म नहीं बाँधते और इस स्तर से जो जानता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। यही समझकर मुमुक्षु पुरूषों ने कर्म का आरम्भ किया था कि उस स्तर से जानेंगे तो जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही उस स्तर से जाननेवाला वह पुरूष, और जान लेने पर वैसा ही मुमुक्षु अर्जुन। यह उपलब्धि निश्चित है, यदि यज्ञ किया जाय। यज्ञ का स्वरूप बताया। यज्ञ का परिणाम परमत्त्व, परमशान्ति बताया। इस ज्ञान को पाया कहाँ जाय? इस पर किसी तत्वदर्शी के पास जाने और उन्हीं विधियों से पेश आने को कहा, जिससे वे महापुरूष अनुकूल हो जायँ।
योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि वह ज्ञान तू स्वयं आचरण करके पायेगा, दूसरे के आचरण से तुझे नहीं मिलेगा। वह भी योग की सिद्धि के काल में प्राप्त होगा, प्रारम्भ में नहीं। वह ज्ञान (साक्षात्कार) हृदय-देश में होगा, बाहर नहीं। श्रद्धालु, तत्पर, संयतेन्द्रिय एवं संशयरहित पुरूष ही उसे प्राप्त करता है। अत: हृदय में स्थित अपने संशय को वैराग्य की तलवार से काट। यह हृदय-देश की लड़ाई है। बाह्य युद्ध से गीतोक्त युद्ध का कोई प्रयोजन नहीं है।
इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मुख्य रूप से यज्ञ का स्वरूप स्पष्ट किया और बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उसे करने (कार्य-प्रणाली) का नाम कर्म है। कर्म को भली प्रकार इसी अध्यायय में स्पष्ट किया, अत:
ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुननसम्वादे यज्ञकर्मस्पष्टीकरणम् नाम चतुर्थोडध्याय:।।४।।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में यज्ञकर्म-स्पष्टीकरण नाम चौथा अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअडग़ड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीताया: यथार्थगीता भाष्ये यज्ञकर्मस्पष्टीकरणम् नाम चतुर्थोडध्याय:।।४।।

इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अडग़ड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीताय के भाष्य यथार्थ गीता में यज्ञकर्म-स्पष्टीकरण नामक चौथा अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरि: ऊँ तत्सत्।।