पढ़े: यर्थाथ गीता के चौथे अध्याय के 36 से लेकर 40 तक श्लोक…

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अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।36।।

यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है, तब भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा सभी पापों से नि:सन्देह भली प्रकार तर जायेगा। इसका आशय आप यह न लगा लें कि अधिक-से-अधिक पाप करके कभी भी तर जायेंगे। श्रीकृष्ण का आशय मात्र यही है कि कहीं आप भ्रम में न रहें कि हम तो बड़े पापी हैं, हमसे पार नहीं लगेगा – ऐसी कोई गुंजाइश न निकालें, इसलिये श्रीकृष्ण प्रोत्साहन और आश्वासन देते हैं कि सब पापियों के पापों के समूह से भी अधिक पाप करनेवाला हो, फिर भी तत्वदर्शियों से प्राप्त ज्ञानरूपी नौका द्वारा नि:सन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार पार कर जायेगा। किस प्रकार?-

यथैधांसि समिद्धोडग्रिर्भस्मसात्कुरूतेडर्जुन।
ज्ञानाग्रि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरूते तथा।।37।।

अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्रि ईंधन को भस्म कर देती है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्रि सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है। यह ज्ञान की प्रवेशिका नहीं है जहाँ से यज्ञ में प्रवेश मिलता है वरन् यह ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार की पराकाष्ठा का चित्रण है, जिसमें पहले विजातीय कर्म भस्म होते हैं और फिर प्राप्ति के साथ चिन्तन-कर्म भी उसी में विलय हो जाते हैं। जिसे पाना था पा लिया, अब आगे चिन्तन कर किसे ढँूढ़े? ऐसा साक्षात्कारवाला ज्ञानी सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मों का अन्त कर लेगा। वह साक्षात्कार होगा कहाँ? बाहर होगा अथवा भीतर? इस पर कहते हैं-
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।।38।।

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह कुछ भी नहीं है। इस ज्ञान (साक्षात्कार) को तू स्वयं (दूसरा नहीं) योग की परिपक्व अवस्था में (आरम्भ में नहीं) अपनी आत्मा के अन्तर्गत हृदय-देश में ही अनुभव करेगा, बाहर नहीं। इस ज्ञान के लिय कौन-सी योग्यता अपेक्षित है? योगेश्वर के ही शब्दों में-
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।

श्रद्धावान्, तत्पर तथा संयतेन्द्रिय पुरूष ही ज्ञान प्राप्त कर पाता है। भावपूर्वक जिज्ञासा नहीं है तो तत्वदर्शी की शरण जाने पर भी ज्ञान नहीं प्राप्त होता। केवल श्रद्धा ही पर्याप्त नहीं है, श्रद्धावान् शिथिल प्रयत्न भी हो सकता है। अत: महापुरूष द्वारा निर्दिष्ट पथ पर तत्परता से अग्रसर होने की लगन आवश्यक है। इसके साथ ही सम्पूर्ण इन्द्रियों का संयम अनिवार्य है। जो वासनाओं से विरत नहीं है, उसके लिये साक्षात्कार (ज्ञान की प्राप्ति) कठिन है। केवल श्रद्धावान्, आचरणरत संयतेन्द्रिय पुरूष ही ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त कर वह तत्क्षण परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है, जिसके पश्चात् कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। यही अन्तिम शान्ति है। फिर वह कभी अशान्त नहीं होता। और जहाँ श्रद्धा नहीं है-
अज्ञश्चाद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोडस्ति न परो सुखं संशयात्मन:।।40।।

अज्ञानी, जो यज्ञ की विधि-विशेष से अनभिज्ञ है एवं श्रद्धारहित तथा संशययुक्त पुरूष इस परमार्थ पथ से भ्रष्ट हो जाता है। उनमें भी संशययुक्त पुरूष के लिये न तो सुख है, न पुन: मनुष्य-शरीर है और न परमात्मा ही। अत: तत्वदर्शी महापुरूष के पास जाकर इस पथ के संशयों का निवारण कर लेना चाहिये अन्यथा वे वस्तु का परिचय कभी नहीं पायेंगे। फिर पाता कौन है?…