श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्रिषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्रिषु जुह्वति।।२६।।
अन्य योगीजन श्रोत्रादिक (श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, जिह्वा और नासिका) इन्द्रियों को संयमरूपी अग्रि में हवन करते हैं अर्थात इन्द्रियों को विषयों से समेटकर संयत कर लेते हैं। यहाँ आग नहीं जलती। जैसे अग्रि में डालने से हर वस्तु भस्मसात हो जाती है, ठीक इसी प्रकार संयम भी एक अग्रि है जो इन्द्रियों के सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवाह को दग्ध कर देता है। दूसरे योगी लोग शब्दादिक (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) विषयों को इन्द्रियरूपी अग्रि में हवन कर देते हैं अर्थात उनका आशय बदलकर साधनापरक बना लेते हैं।

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साधक को संसार में रहकर ही तो भजन करना है। सांसारिक लोगों के भले-बुरे शब्द उससे टकराते ही रहते हैं। विषयोत्तेजक ऐसे शब्दों को सुनते ही साधक उनके आशय को योग, वैराग्य सहायक, वैराग्योत्तेजक भावों में बदलकर इन्द्रियरूपी अग्रि में हवन कर देते है। जैसा कि एक बार अर्जुन अपने चिन्तन में रत था, अकस्मात उसके कर्ण कुहरों में संगीत-लहरी झनझना उठी। उसने सिर उठाकर देखा तो उर्वशी खड़ी थी, जो एक अप्सरा थी। सभी उसके रूप पर मुग्ध हो झूम रहे थे, किनतु अर्जुन ने उसे स्नेहिल दृष्टि से मातृवत देखा। उस शब्द, रूप से मिलनेवाले विकार विलीन हो गये। इन्द्रियों के अन्तराल में ही समाहित हो गये।
यहाँ इन्द्रिय की अग्रि है। अग्रि में डाली हुई वस्तु जैसे भस्मसात हो जाती है, इसी प्रकार आशय बदलकर इष्ट के अनुकूल ढाल लेने पर विषयोत्तेजक रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द भी भस्म हो जाते हैं, साधक पर कुप्रभाव नहीं डाल पाते। साधक इन शब्दादिकों में रूचि नहीं लेता, इन्हें ग्रहण नहीं करता।
इन श्लोकों में अपरे, अन्ये शब्द एक ही साधक की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं, एक ही यज्ञकर्ता का ऊँचा-नीचा स्तर है, न कि अपरे, अपरे कहने से कोई अलग-अलग यज्ञ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्रौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।२७।।

अभी तक योगेश्वर ने जिस यज्ञ की चर्चा की, उसमें क्रमश: दैवी सम्पद को अर्जित किया जाता है, इन्द्रियों की सम्पूर्ण चेष्टाओं का संयम किया जाता है, बलात विषयोत्तेजक शब्दादिकों के टकराने पर भी उनका आशय बदलकर उनसे बचा जाता है। इससे उन्नत अवस्था होने पर दूसरे योगीजन सम्पूर्ण इन्द्रियों की चेष्टाओं तथा प्राण के व्यापार को साक्षात्कारसहित ज्ञान से प्रकाशित परमात्मस्थितिरूपी योगाग्रि में हवन करते हैं। जब संयम की पकड़ आत्मा के साथ तद्रूप हो जाती है, प्राण और इन्द्रियों का व्यापार भी शान्त हो जाता है, उस समय विषयों को उद्दीप्त करनेवाली और इष्ट में प्रवृत्ति दिलाने वाली दोनों धाराएँ आत्मसात हो जाती हैं। परमात्मा में स्थिति मिल जाती है। यज्ञ का परिणाम निकल आता है। यह है यज्ञ की पराकाष्ठा। जिस परमात्मा को पाना था, उसी में स्थिति आ गयी तो शेष क्या रहा? पुन: योगेश्वर श्रीकृष्ण यज्ञ को भली प्रकार समझाते हैं-
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता:।।२८।।

अनेक लोग द्रव्ययज्ञ करते हैं अर्थात आत्मपथ में, महापुरूषों की सेवा में पत्र-पुष्प अर्पित करते हैं। वे समर्पण के साथ महापुरूषों की सेवा में द्रव्य लगाते हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं- भक्तिभाव से पत्र, पुष्प, फल, जल जो कुछ भी मुझे देता है, उसे मैं खाता हूँ और उसका परमकल्याण सृजन करनेवाला होता हूं। यह भी यज्ञ है। हर आत्मा की सेवा करना, भूले हुए को आत्मपथ पर लाना द्रव्ययज्ञ है, क्योंकि प्राकृतिक संस्कारों को जलाने में समर्थ है।
इसी प्रकार कई पुरूष तपोयज्ञा: स्वधर्म पालन में इन्द्रियों को तपाते हैं अर्थात स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार यज्ञ की निम्र और उन्नत अवस्थाओं के बीच तपते हैं। इसी पथ की अल्पज्ञता में पहली श्रेणी का साधक शूद्र परिचर्या द्वारा, वैश्य दैवी सम्पद के संग्रह द्वारा, क्षत्रिय काम क्रोधादि के उन्मूलन द्वारा और ब्राह्मण में प्रवेश की योग्यता के स्तर से इन्द्रियों को तपाता है। सबको एक जैसा परिश्रम करना पड़ता है। वास्तव में यज्ञ एक ही है। सबको एक जैसा परिश्रम करना पड़ता है। वास्तव में यज्ञ एक ही है। अवस्था के अनुसार ऊँची-नीची श्रेणियाँ गुजरती जाती है।
पूज्य महाराज जी कहते थे- मनसहित इन्द्रियों और शरीर को लक्ष्य के अनुरूप तपाना ही तप कहलाता है। ये लक्ष्य से दूर भागेंगे, इन्हें समेटकर उधर ही लगाओ।
अनेक पुरूष योगयज्ञ का आचरण करते हैं। प्रकृति में भटकती हुई आत्मा का प्रकृति से परे परमात्मा से मिलन का नाम योग है। योग की परिभाषा अध्याय ६/२३ में द्रष्टव्य है। सामान्यत: दो वस्तुओं का मिलन योग कहलाता है। कागज से कलम मिल गया, थाली और मेज मिल गये तो क्या योग हो गया? नहीं, ये तो पंचभूतों से निर्मित पदार्थ हैं। एक ही हैं, दो कहाँ? दो प्रकृति और पुरूष हैं। प्रकृति में स्थित आत्मा अपने ही शाश्वत रूप परमात्मा में प्रवेश पा जाता है तो प्रकृति पुरूष में विलीन हो जाती है। यहीं योग है। अत: अनेक पुरूष इस मिलन में सहायक शम, दम इत्यादि नियमों का भली प्रकार आचरण करते हैं। योगयज्ञ करनेवाले तथा अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त यत्नशील पुरूष स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च स्वयं का अध्ययन, स्वरूप का अध्ययन करनेवाले ज्ञानयज्ञ के कर्ता हैं। यहाँ योग के अंगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से निर्दिष्ट किया गया है। अनेक लोग स्वाध्याय करते हैं। पुस्तक पढऩा तो स्वाध्याय का आरम्कि स्तर मात्र है। विशुद्ध स्वाध्याय है स्वयं का अध्ययन, जिससे स्वरूप की उपलब्धि होती है, जिसका परिणाम है ज्ञान अर्थात साक्षात्कार।
यज्ञ का अगला चरण बताते हैं-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेडपानं तथापरे।
प्राणापानगती रूद्ध्वा प्राणायामपरायणा:।।२९।।

बहुत से योगी अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं और उसी प्रकार प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं। इससे सूक्ष्म अवस्था हो जाने पर अन्य योगीजन प्राण और अपान दोनों की गति रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं।
जिसे श्रीकृष्ण प्राण-अपान कहते हैं, उसी को महात्मा बुद्ध अनापान कहते हैं। इसी को उन्होंने श्वास-प्रश्वास भी कहा है। प्राण वह श्वास है जिसे आप भीतर खींचते हैं और अपान वह श्वास है जिसे आप बाहर छोड़ते हैं। योगियों की अनुभूति है कि आप श्वास के साथ बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भी ग्रहण करते है और प्रश्वास में इसी प्रकार आन्तरिक भले बुरे चिन्तन की लहर फेंकते रहते हैं। बाह्य दुनिया में चलनेवाले चिन्तन अन्दर क्षोभ उत्पन्न कर पायें, इस प्रकार प्राण और अपान दोनों की गति सम हो जाने पर प्राणों का याम अर्थात निरोध हो जाता है, यही प्राणायाम है। यह मन की विजितावस्था है। प्राणों का रूकना और मन का रूकना एक ही बात है।
प्रत्येक महापुरूष ने इस प्रकरण को लिया है। वेदों में इसका उल्लेख है। चत्वारि वाक् परिमिता पदान इसी को पूज्य महाराज कहा करत थे- हो! एक ही नाम चार श्रेणियों से जपा जाता है। बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। बैखरी उसे कहते हैं जो व्यक्त हो जाय। नाम का इस प्रकार उच्चारण हो कि आप सुनें और बाहर कोई बैठा हो तो उसे भी सुनायी पड़े। मध्यमा अर्थात मध्यम स्वर में जप, जिसे केवल आप ही सुनें, बगल में बैठा हुआ व्यक्ति भी उस उच्चारण को सुन न सके। यह उच्चारण कण्ठ से होता है। धीरे धीरे नाम की धुुन बन जाती है, डोर लग जाती है।
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेडप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:।।३०।।

दूसरे नियमित आहार करनेवाले प्राण को प्राण में ही हवन करते हैं। पूज्य महाराज ने कहा है कि, योगी का आहार दृढ़, आसन दृढ़ और निद्रा दृढ़ होनी चाहिये। आहार विहार पर नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। ऐसे अनेक योगी प्राण को प्राण में ही हवन कर देते हैं अर्थात श्वास लेने पर ही ध्यान केन्द्रित रखते हैं, प्रश्वास पर ध्यान नहीं देते। साँस आयी तो सुना ओम, पुन: साँस आयी तो ओम सुनते रहें। इस प्रकार यज्ञों द्वारा नष्ट पापवाले ये सभी पुरूष यज्ञ के जानकार हैं। इन निर्दिष्ट विधियों में से यदि कहीं से भी करते हैं तो वे सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं। अब यज्ञ का परिणाम बताते हैं…