किं कर्म किमकर्मेति कवयोडप्यत्र मोहिता:।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्।।१६।।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान् पुरूष भी मोहित हैं। इसलिये मैं वह कर्म तेरे लिये अच्छी तरह से कहँूगा, जिसे जानकर तू अशुभात् मोक्ष्यसे अशुभ अर्थात संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु हैं, जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। इसी कर्म को जानने के लिये श्रीकृष्ण पुन: बल देते हैं-

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कर्मणो हा्रपि बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:।।१७।।

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, अकर्म का स्वरूप भी समझना चाहिये और विकर्म अर्थात विकल्पशून्य विशेष कर्म जो आप्तपुरूषों द्वारा होता है, उसे भी जानना चाहिये, क्योंकि कर्म की गति गहन है। कतिपय लोगों ने विकर्म का अर्थ निषिद्ध कर्म, मन लगाकर किया गया कर्म इत्यादि किया है। वस्तुत: यहाँ वि उपसर्ग विशिष्टता का द्योतक है। प्राप्ति के पश्चात महापुरूषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरूषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोडऩे से कोई हानि ही है, फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिये कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है।
उदाहरणार्थ गीता में जहाँ भी किसी कार्य में वि उपसर्ग लगा है, उसकी विशेषता का द्योतक है, निकृष्टता का नहीं। यथा योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:। जो योग से युक्त है वह विशेष रूप से शुद्ध आत्मावाला, विशेष रूप से जीते अन्त:करणवाला इत्यादि विशेषता के ही द्योतक हैं। इसी प्रकार गीता में स्थान स्थान पर वि का प्रयोग हुआ है, जो विशेष पूर्णता का द्योतक है। इसी प्रकार विकर्म भी विशिष्ट कर्म का द्योतक है जो प्राप्ति के पश्चात महापुरूषों के द्वारा स पादित होता है, जो शुभाशुभ संस्कार नहीं डालता। अभी आपने विकर्म देखा। रहा कर्म और अकर्म, जिसे अगले श£ोक में समझने का प्रयास करें। यदि यहाँ कर्म और अकर्म का विभाजन नहीं समझ सके तो कभी नहीं समझ सकेंगे-
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।
स बुद्धिमान्मनुष्येष स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत।।१८।।

जो पुरूष कर्म में अकर्म देखे, कर्म माने आराधना अर्थात आराधना करे और यह भी समझे कि करनेवाला मैं नहीं हँू बल्कि गुणों की अवस्थ्ज्ञा ही चिन्तन में हमें नियुक्त करती हैं, मैं इन गुणों द्वारा प्रेरित होकर कर्म में बरतता हँू अथवा मैं इष्ट द्वारा संचालित हँू – ऐसा देखे और जब इस प्रकार अकर्म देखने की क्षमता का जाय और धारावाहिक रूप से कर्म होता रहे, तभी समझना चाहिये कि कर्म सही दिशा में हो रहा है। वही पुरूष मनुष्यों में बुद्धिमान है, मनुष्यों में योगी है, योग से युक्त बुद्धिवाला है और स पूर्ण कर्मों को करनेवाला है। उसके द्वारा कर्म करने में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं रह जाती।
सारांशत: आराधना ही कर्म है, उस कर्म को करें और करते हुए अकर्म देखें कि मैं तो यन्त्रमात्र हूँ, करानेवाला इष्ट है और मैं गुणों से उत्पन्न अवस्था के अनुसार ही चेष्टा कर पाता हँू। जब अकर्म की यह क्षमता आ जाय और धारावाहिक कर्म होता रहे, त ाी परमकल्याण की स्थिति दिलानेवाला कर्म हो पाता है। पूज्य महाराज जी कहा करते थे कि, जब तक इष्ट रथी न हो जाय, रोकथाम न करने लगे, तब तक सही मात्रा में साधना का आर भ ही नहीं होता। इसके पूर्व जो कुछ भी किया जाता है, कर्म में प्रवेश के प्रयास से अधिक कुछ भी नहीं हैं। हल का सारा भार बैलों के कन्धों पर ही रहता है, फिर भी खेत की जुताई हलवाहे की देन है। ठीक इसी प्रकार साधन का सारा भार साधक के ऊपर ही रहता है, किन्त, वास्तविक साधक तो इष्ट है जो उसके पीछे लगा हुआ है, जो उसका मार्गदर्शन करता है। जब तक इष्ट निर्णय न दें, तब तक आप समझ ही नहीं सकेंगे कि हमसे हुआ क्या? हम प्रकृति में भटक रहे हैं या परमात्मा में? इस प्रकार इष्ट के निर्देशन में जो साधक इस आत्मिक पथ पर अग्रसर होता है, अपने को अकत्र्ता समझकर धारावाहिक कर्म करता है वही बुद्धिमान है, उसकी जानकारी यथार्थ है, वहीं योगी है।
श्रीकृष्ण के अनुसार जो कुछ किया जाता है, कर्म नहीं है। कर्म एक निर्धारित की हुई क्रिया है। नियंत कुरू कर्म त्वम – अर्जुन! तू निर्धारित कर्म को कर। निर्धारित कर्म है क्या? तब बताया, यज्ञार्थात्कर्मणोडन्यत्र लोकोडयं कर्मबन्धन:। यज्ञ को कार्यरूप देना ही कर्म है। तो इसके अतिरिक्त जो कुछ किया जाता है, क्या वह कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते है, अन्यत्र लोकोडयं कर्मबन्धन: इस यज्ञ को कार्यरूप देने के सिवाय जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का बन्धन है, न कि कर्म। तदर्थ कर्म – अर्जुन! उस यज्ञ की पूर्ति के लिये भली प्रकार आचरण कर और जब यज्ञ का स्वरूप बताया तो वह शुद्ध रूप से आराधना की एक विधि विशेष है, जो उस आराध्य देव तक पहुंचाकर उसमें विलय दिलाता है।
इस यज्ञ में इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, दैवी स पद का अर्जन इत्यादि बताते हुए अन्त में कहा- बहुत से योगी प्राण और अपान की गति का निरोध करके प्राणयाम के परायण हो जाते हैं। जहाँ न भीतर से संकल्प उठता है और न बाहा्र वातावरण का संकल्प मन के अन्दर प्रविष्ट हो पाता है, ऐसी स्थिति में चित्त का सर्वथा निरोध और निरूद्ध चित्त के भी विलयकाल में वह पुरूष यान्ति ब्रहा्र सनातनम शाश्वत, सनातन ब्रहा्र में प्रवेश पा जाता है। यही सब यज्ञ है, जिसे कार्र्यरूप देने का नाम कर्म है। अत: कर्म का शुद्ध अर्थ है आराधना, कर्म का अर्थ है भजन, कर्म का अर्थ है योग साधना को भली प्रकार स पादित करना, जिसका विशद वर्ण इसी अध्याय में आगे आ रहा है। यहाँ कर्म और अकर्म का केवल विभाजन किया गया, जिससे कर्म करते समय उसे सही दिशा दी जा सके और उस पर चला जा सके।
जिज्ञासा स्वाभाविक है कि कर्म करते ही रहेंगे या कभी कर्मों से छुटकारा भी मिलेगा? इस पर योगेश्वर कहते हैं-
यस्य सर्वे समार भा: कामसङ्कल्पवर्जिता:।
ज्ञानाग्रिदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।।१९।।

अर्जुन! यस्य सर्वे समार भा: जिस पुरूष के द्वारा स पूर्णता से आर भ की हुई क्रिया (जिसे पिछले श£ोक में कहा कि अकर्म देखने की क्षमता आ जाने पर कर्म में प्रवृत्त रहनेवाला पुरूष स पूर्ण कर्मों का करनेवाला है। जिसके करने में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है।) कामसङ्कल्पवर्जिता: क्रमश: उत्थान होते होते इतनी सूक्ष्म हो गयी कि वासना और मन के संकल्प विकल्प से ऊपर उठ गयी (कामना और संकल्पों का निरोध होना मन की विजितावस्था है। अत: कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो इस मन को कामना और संकल्प-विकल्प से ऊपर उठा देता है।) उस समय ज्ञानाग्रिदग्धकर्माणम अन्तिम संकल्प के भी शमन के साथ, जिसे हम नहीं जानते, जिसे जानने लिये हम इच्छुक थे उस परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी हो जाती है। क्रियात्मक पथ पर चलकर परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही ज्ञान है। उस ज्ञान के साथ ही दग्धकर्माणम कर्म सदा के लिये दग्ध हो जाते हैं। जिसे पाना था पा लिया, आगे कोई सत्ता नहीं जिसकी शोध करें। इसलिये कर्म करके ढूँढ़े भी तो किसे? उस जानकारी के साथ कर्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थितिवालों को ही बोधस्वरूप महापुरूषों ने पण्डित कहकर स बोधित किया है। उनकी जानकारी पूर्ण है। ऐसी स्थितिवाला महापुरूष करता क्या है? रहता कैसे है? उसकी रहनी पर प्रकाश डालते हैं-
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग नित्यतृप्तो निराश्रय:।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोडपि नैव किश्चित्करोति स:।।२०।।

अर्जुन! वह पुरूष सांसारिक आश्रम से रहित होकर, नित्यवस्तु परमात्मा में ही तृप्त रहकर, कर्मों के फल परमात्मा की आसक्ति को भी त्यागकर (क्योंकि परमात्मा भी अब भिन्न नहीं है) कर्म में अच्छी प्रकार बरतता हुआ भी कुछ नहीं करता।