ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।११।।
पार्थ! जो मुझे जितनी लगन से जैसा भजते हैं, मैं भी उनको वैसा ही भजता हूं। उतनी ही मात्रा में सहयोग देता हूं। साधक की श्रद्धा ही कृपा बनकर उसे मिलती है। इस रहस्य को जानकर सुधीजन सम्पूर्ण भावों से मेरे मार्ग के अनुसार ही बरतते हैं। जैसा मैं बरतता हूं, जो मुझे प्रिय है वैसा ही आचरण करते हैं। जो मैं कराना चाहता हूँ, वही करते हैं। भगवान कैसे भजते हैं? वे रथी बनकर खड़े हो जाते हैं, साथ चलने लगते हैं, यहीं उनका भजना है। दूषित जिनसे पैदा होते हैं, उनका विनाश करने के लिये वे खड़े हो जाते हैं। सत्य में प्रवेश दिलानेवाले सद्गुणों का परित्राण करने के लिये वे खड़े हो जाते हैं। जब तक इष्टदेव हृदय से पूर्णत: रथी न हो और हर कदम पर सावधान न करें, तब तक कोई कैसा ही भजनानन्दी क्यों न हो, लाख आँख मूँदे, लाख प्रयत्न करें, वह इस प्रकृति के द्वन्द्व से पार नहीं हो सकता। वह कैसे समझेगा कि वह कितनी दूरी तय कर चुका, कितनी शेष है। इष्ट ही आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं कि तुम यहाँ पर हो, ऐसे करो, ऐसे चलो। इस प्रकार प्रकृति की खाईं पाटते हुए, शनै: शनै: आगे बढ़ाते हुए स्वरूप में प्रवेश दिला देंगे। भजन तो साधक को ही करना पड़ता हैं, किन्तु उसके द्वारा इस पथ में जो दूरी तय होती है, वह इष्ट की देन है। ऐसा जानकर सभी मनुष्य सर्वतोभावेन मेरा अनुसरण करते हैं। किस प्रकार वे बरतते हैं?-

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काडक्षनत: कर्मणां सिद्धि यजन्त इह देवता:।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।१२।।

वे पुरूष इस शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए देवताओं को पूजते हैं। कौसा-सा कर्म? श्रीकृष्ण ने कहा, अर्जुन! तू नियत कर्म कर। नियत कर्म क्या है? यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। यज्ञ क्या है? साधना की विधि-विशेष, जिसमें श्वास-प्रश्वास का हवन, इन्द्रियों के बहिर्मुशी प्रवाह को संयमाग्रि में हवन किया जाता है, जिसका परिणाम है परमात्मा। कर्म का शुद्ध अर्थ है आराधना, जिसका स्वरूप इसी अध्याय में आगे मिलेगा। इस आराधना का परिणाम क्या है? संसिद्धिम् – परमसिद्धि परमात्मा, यान्ति ब्रहा्र सनातनम् – शाश्वत ब्रहा्र में प्रवेश, परम नैष्कम्र्य की स्थिति। श्रीकृष्ण कहते हैं – मेरे अनुसार बरतनेवाले लोग इस मनुष्य लोक में कर्म के परिणाम परम नैष्कम्र्य सिद्धि के लिये देवताओं को पूजते हैं अर्थात् दैवी सम्पद् को बलवती बनाते है
तीसरे अध्याय में उन्होंने बताया कि इस यज्ञ द्वारा तुम देवताओं की वृद्धि करो, दैवी सम्पद् को बलवती बनाओ। ज्यों-ज्यों हृदय-देश में दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी उन्नति होगी। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुए परमश्रेय को प्राप्त हो जाओ। अन्त तक उन्नति करते जाने की यह अन्त:क्रिया है। इसी पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरे अनुकूल बरतनेवाले लोग इस मनुष्य शरीर में कर्मों की सिद्धि चाहते हुए दैवी सम्पद् को बलवती बनाते हैं, जिससे वह नैष्कम्र्य-सिद्धि शीघ्र होती है। वह असफल नहीं होती, सफल ही होती है। शीघ्र का तात्पर्य? क्या कर्म में प्रवृत्त होते ही तत्क्षण यह परमसिद्धि मिल जाती है? श्रीकृष्ण कहते हैं – नहीं, इस सोपान पर क्रमश: चढऩे का विधान है। कोई छलांग लगाकर भावतीत ध्यान जैसा चमत्कार नहीं होता। इस पर देखें-
चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।।१३।।

अर्जुन! चातुर्वण्र्यं मया सृष्टम् – चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, गुणकर्म विभागश: गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। गुण एक पैमाना है, मापदण्ड है। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकत्र्तव्य से निवृत्ति न हो पाने की विवशता रहेगी। ऐसी अवस्था में साधन आरम्भ कैसे करें? दो घंटे आप आराधना में बैठते हैं, इस कर्म के लिये प्रयत्नशील होना चाहते हैं किन्तु दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाते। शरीर अवश्य बैठा है, लेकिन जिस मन को बैठना चाहिये वह हवा से बातें कर रहा है, कुतर्कों का जाल बुन रहा है, तरंग पर तरंग छायी है, तो आप बैठे क्यों हैं? समय क्यों नष्ट करते हैं? उस समय केवल परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम। जो महापुरूष अव्यक्त की स्थितिवाले हैं, अविनाशी तत्व में स्थित हैं उनकी तथा इस पथ पर अग्रसर अपने से उन्नत लोगों की सेवा में लग जाओ। इससे दूषित संस्कार शमन होते जायेंगे, साधना में प्रवेश दिलानेवाले संस्कार सबल होते जायेंगे। क्रमश: तामसी गुण न्यूज होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्विक गुण के स्वल्प संचार के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो जाती है। उस समय वही साधक इन्द्रिय-संयम, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह स्वभावत: करने लगेगा। कर्म करते-करते उसी साधक में सात्विक गुणों का बाहुल्य हो जायेगा, राजसी गुण कम रह जायेंगे, तामसी गुण शान्त रहेंगे। उस समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य, कर्म में प्रवृत्त रहने की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, सब भावों पर स्वामिभाव, प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जायेगी। वही कर्म और सूक्ष्म होने पर, मात्र सात्विक गुण कार्यरत रह जाने पर मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, एकाग्रता, सरलता, ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, आस्तिकता इत्यादि ब्रहा्र में प्रवेश दिलानेवाली स्वाभाविक क्षमता के साथ वही साधक ब्राहा्रण श्रेणी का कहा जाता है। यह ब्राहा्रण श्रेणी के कर्म की निम्रतम सीमा है। जब वही साधक ब्रहा्र में स्थित हो जाता है, उस अन्तिम सीमा में वह स्वयं में न ब्राहा्रण रहता है न क्षत्रिय, न वैश्य न शुद्र: किन्तु दूसरों के मार्गदर्शन हेतु वही ब्राहा्रण है। कर्म एक ही है- नियत कर्म, आराधना। अवस्था-भेद से इसी कर्म को ऊँची-नीची चार सीढिय़ों में बाँटा। किसने बाँटा? किसी योगेश्वर ने बाँटा, अव्यक्त स्थितिवाले महापुरूष ने बाँटा। उसके कत्र्ता मुझ अविनाशी को अकत्र्ता ही जान क्यों?-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योडभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।१४।।

क्योंकि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है। कर्मों का फल क्या है? श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि यज्ञ जिससे पूरा होता है, उस क्रिया का नाम कर्म है और पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी रचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला शाश्वत, सनातन ब्रहा्र में प्रवेश पा लेता है। कर्म का परिणाम है परमात्मा, उस परमात्मा की चाह भी अब मुझे नहीं है, क्योंकि वह मुझसे भिन्न नहीं है। मैं अव्यक्त स्वरूप हूं, उसी की स्थितिवाला हूं। अब आगे कोई सत्ता नहीं, जिसके लिये इस कार्य पर स्नेह रखूं। इसलिये कर्म मुझे लिपायमान नहीं करते और इसी स्तर से जो भी मुझे जानता है अर्थात जो कर्मों के परिणाम परमात्मा को प्राप्त कर लेता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते, जैसे श्रीकृष्ण वैसे उस स्तर से जाननेवाले महापुरूष।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
कुरू कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्।।१५।।

अर्जुन! पहले होने वाले मोक्ष की इच्छावाले पुरूषों द्वारा भी यही जानकार कर्म किया गया। क्या जानकर? यही कि जब कर्मों का परिणाम परमात्मा भिन्न न रह जाय, कर्मों के परिणाम परमात्मा की स्पृहा न रह जाने पर उस पुरूष को कर्म नहीं बाँधते। श्रीकृष्ण इसी स्थितिवाले हैं इसलिये वे कर्म में लिपायमान नहीं होते और उसी स्तर से हम जान लेंगे तो हमें भी कर्म नहीं बाँधेगा। जैसे श्रीकृष्ण ठीक उसी स्तर से जो भी जान लेगा, वैसा ही वह पुरूष भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा। अब श्रीकृष्ण भगवान, महात्मा, अव्यक्त, योगेश्वर या महायोगेश्वर जो भी रहे हों, वह स्वरूप सबके लिये है। यही समझकर पहले के मुमुक्षु पुरूषों ने, मोक्ष का इच्छावाले पुरूषों ने कर्म पर कदम रखा। इसलिये अर्जुन! तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए इसी कर्म को कर। यहीं कल्याण का एकमात्र मार्ग है।
अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म करने पर बल दिया, किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया कि कर्म क्या है? अध्याय दो में उन्होंने कर्म का नाम मात्र लिया कि अब इसी को तू निष्काम कर्म के विषय में सुन। उसकी विशेषताओं का वर्णन किया कि यह जन्म मरण के महान भय से रक्षा करता है। कर्म करते समय सावधानी का वर्णन किया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म क्या है? अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि ज्ञानमार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्मयोग, कर्म तो करना ही पड़ेगा। न तो कर्मों को त्यागने से कोई ज्ञानी होता है और न तो कर्मों को न आरम्भ करने से कोई निष्कर्मी। हठवश जो नहीं करते, वे दम्भी हैं। इसलिये मन से इन्द्रियों को वश में करके कर्म कर। कौन सा कर्म करें? तो बताया- नियत कर्म कर। अब यह निर्धारित कर्म है क्या? तो बोले यज्ञ की प्रक्रिया ही नियत कर्म है। एक नवीन प्रश्र दिया कि यज्ञ क्या है, जिसे करें तो कर्म हो जाय? वहाँ भी यज्ञ की उत्पत्ति को बताया, उसकी विशेषताओं का वर्णन किया, किन्तु यज्ञ नहीं बताया, जिससे कर्म को समझा जा सके। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि कर्म क्या है? अब कहते हैं अर्जुन! कर्म क्या है, अकर्म क्या है? इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हैं, उसे भली प्रकार समझ लेना चाहिये।