मां हि पार्थ व्यपारित्य येऽपि स्यु: पापयोनम:।
स्त्रियो वेश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।३२।।

पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। अत: यह गीता मनुष्यमात्र के लिये हैं, चाहे वह कुछ भी करता हो, कहीं भी पैदा हुआ हो। सबके लिये यह एक समान कल्याण का उपदेश करती है। गीता सार्वभौम है।
पापयोनि- अध्याय १६/७-२१ में आसुरी वृत्ति के लक्षणों के अन्तर्गत भगवान ने बताया कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भ से ययन करते हैं, वे नरों में अधम हैं। यज्ञ है नहीं किन्तु नाम दे रखा है और दम्भ से यजन करता है वह क्रूरकर्मी और पापाचारी है। जो मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं वही पापी है। वैश्य और शूद्र भगवत्पथ की सीढिय़ाँ हैं। स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, कभी हीनता की भावना समाज में रही है, इसीलिये श्रीकृष्ण ने इनका नाम लिया। योग-प्रक्रिया में स्त्री और पुरूष दोनों का समान ही प्रवेश है।

bb 4

किं पुनब्र्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।।३३।।

फिर तो ब्राह्मण तथा राजर्षि क्षत्रिय श्रेणीप्राप्त भक्तों के लिये कहना ही क्या है? ब्राह्मण एक अवस्था-विशेष है, जिसमें ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ विद्यमान हैं। शान्ति, आर्जव, अनुभवी उपलब्धि, ध्यान और इष्ट के निर्देशन पर जिसमें चलने की क्षमता है, वही ब्राह्मण की अवस्था है। राजर्षि क्षत्रिय में ऋद्धियों-सिद्धियों का संचार, शौर्य, स्वामीभाव, पीछे न हटने का स्वभाव रहता है। इस योगस्तर पर पहँुचे हुए योगी तो पार होते ही हैं, उनके लिये क्या कहना है? अत: अर्जुन! तू सुखरहित, क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर। इस नश्वर शरीर के ममत्व, पोषण में समय नष्ट न कर।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यहाँ चौथी बार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की चर्चा की। अध्याय दो में उन्होंने कहा कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याण का कोई रास्ता नहीं है। अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि स्वधर्म में निधन भी श्रेयतर है। अध्याय चार में उन्होंने संक्षेप में बताया कि चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार जातियों में बाँटा? बोले, नहीं गुणकर्म विभागश: गुण के पैमाने से कर्म को चार श्रेणियों में रखा। श्रीकृष्ण के अनुसार, कर्म एकमात्र यज्ञ की प्रक्रिया है। अत: इस यज्ञ को करनेवाले चार प्रकार के हैं। प्रवेशकाल में वह यज्ञकत्र्ता शूद्र है, अल्पज्ञ है। कुछ करने की क्षमता आयी, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह शूद्र है, अल्पज्ञ है। कुछ करने की क्षमता आयी, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह हुआ तो वही यज्ञकत्र्ता वैश्य बन गया। इससे उन्नत होने पर प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता आ जाने पर वही साधन क्षत्रिय श्रेणी का है और जब इसी साधक के स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली योग्यताएँ ढल जाती हैं तो वही ब्राह्मण है। वैश्व एवं शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय और ब्राह्मण श्रेणी के साधक प्राप्ति के अधिक समीप हैं। शूद्र और वैश्य भी उसी ब्रह्म में प्रवेश पाकर शान्त होंगे, फिर इसके आगे की अवस्थावालों के लिये तो कहना ही क्या है। उनके लिये तो निश्चित ही है।
गीता, जिसका विस्तार वेद और अन्य उपनिषद जिनमें ब्रह्मविदुषी महिलाओं के आख्यान भरे पड़ हैं, तथाकथित धर्मभीरू, रूढि़वादी वेदाध्ययन के अधिकार-अनधिकार की व्यवस्था देने में माथापच्ची करते रहे लेकिन योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट उद्घोष है कि यज्ञार्थ कर्म की निर्धारित क्रिया में स्त्री-पुरूष सभी प्रवेश ले सकते हैं। अब वे भजन की धारणा पर प्रोत्साहन देते हैं-
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।।३४।।

अर्जुन! मेरे में ही मनवाला हो। सिवाय मेरे दूसरे भाव में न आने पायें। मेरा अनन्य भक्त हो, अनवरत चिन्तन में लग। श्रद्धासहित मेरा ही निरन्तर पूजन कर और मेरे को ही नमस्कार कर। इस प्रकार मेरी शरण हुआ, आत्मा को मुझमें एकीभाव से स्थित कर तू मुझे ही प्राप्त होगा अर्थात मेरे साथ एकता प्राप्त करेगा।
निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में श्रीकृष्ण ने कहा-अर्जुन! तुझ दोषरहित भक्त के लिय मैं इस ज्ञान को विज्ञानसहित कहूंगा, जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। इसे जानकर तू संसार-बंधन से छूट जायेगा। यह ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओं का राजा है। विद्या वह है जो परमब्रह्म में प्रवेश दिलाये। यह ज्ञान उसका भी राजा है अर्थात निश्चित कल्याण करनेवाला है। यह सम्पूर्ण गोपनीयों का भी राजा है, गोपनीय वस्तु को भी प्रत्यक्ष करनेवाला है। यह प्रत्यक्ष फलवाला, साधन करने में सुगम और अविनाशी है। इसका थोड़ा भी साधन आप से पार लग जाय तो इसका कभी नाश नहीं होता वरन इसके प्रभाव से वह परमश्रेय तक पहूंच जाता है, किन्तु इसमें एक शर्त है। श्रद्धाविहीन पुरूष परमगति को प्राप्त न होकर संसार चक्र में भटकता है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग के ऐश्वर्य पर भी प्रकाश डाला। दु:ख के संयोग का वियोग ही योग है अर्थात जो संसार के संयोग वियोग से सर्वथा रहित है, उसका नाम योग है। परमतत्व परमात्मा के मिलन का नाम योग है। परमात्मा की प्राप्ति ही योग की पराकाष्ठा है। जो इसमें प्रवेश पा गया, उस योगी के प्रभाव को देख कि सम्पूर्ण भूतों का स्वामी और जीवधारियों का पोषण करनेवाला होने पर भी मेरा आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं हैं। मैं आत्मस्वरूप में स्थित हूं। वहीं हूं। जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरनेवाला वायु आकाश में ही स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं लेकिन मैं उनमें लिप्त नहीं हूं।
अर्जुन! कल्प के आदि में मैं भूतों को विशेष प्रकार से रचता हूं, सजाता हूं और कल्प के पूर्तिकाल में सम्पूर्ण भूत मेरी प्रकृति को अर्थात योगारूढ़ महापुरूष की रहनी को, उनके अव्यक्त भाव को प्राप्त होते हैं। यद्यपि महापुरूष प्रकृति से परे हैं, किन्तु प्राप्ति के पश्चात स्वीााव अर्थात स्वयं में स्थित रहते हुए लोकसंग्रह के लिए जो कार्य करता है, वह उसकी एक रहनी है। इसी रहनी के कार्य-कलाप को उस महापुरूष की प्रकृति कहकर सम्बोधित किया गया है।
एक रचयिता तो मैं हूं, जो भूतों का कल्प के लिये प्रेरित करता हूं और दूसरी रचयिता त्रिगुणमयी प्रकृति है, जो मेरे अध्यास से चराचरसहित भूतों को रचती है। यह भी एक कल्प है, जिसमें शरीर-परिवर्तन, स्वभाव-परिवर्तन और और काल-परिवर्तन निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी यही कहते हैं-