अजोडपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोडपि सन।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स भवा यात्ममायया।।६।।

मैं विनाशरहित, पुन: जन्मरहित और समस्त प्राणियों के स्वर में संचारित होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके आत्ममाया से प्रकट होता हूं। एक माया तो अविद्या है जो प्रकृति में ही विश्वास दिलाती है, नीच एवं अधम योनियों का कारण बनती है। दूसरी माया है आत्ममाया, जो आत्मा में प्रवेश दिलाती है, स्वरूप के जन्म का कारण बनती है। इसी को योगमाया भी कहते हैं। जिससे हम विलग हैं उस शाश्वत स्वरूप से यह जोड़ती है, मिलन कराती है। उस आत्मिक प्रक्रिया द्वारा मैं अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अधीन करके ही प्रकट होता हूं।
प्राय: लोग कहते हैं कि भगवान का अवतार होगा तो दर्शन कर लेंगे। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता कि कोई दूसरा देख सके। स्वरूप का जन्म पिण्डरूप में नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं- योग-साधना द्वारा, आत्ममाया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को स्ववश करके मैं क्रमश: प्रकट होता हूं। लेकिन किन परिस्थितियों में?-

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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अ युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजा यहम।।7।।

हे अर्जुन! जब-जब परमधर्म परमात्मा के लिये हृदय ग्लानि से भर जाता है, जब अधर्म की वृद्धि से भाविक पार पाते नहीं देखता, तब मैं आत्मा को रचने लगता हूँ। ऐसी ही ग्लानि मनु को हुई थ
हृदयँ बहुत दुख लाग, जनम गयउ हरिभगति बिनु।।
जब आपका हृदय अनुराग से पूरित हो जाय, उस शाश्वत-धर्म के लिए च्गदगद गिरा नयन बह नीरा। की स्थिति आ जाय, जब प्रयत्न करके भी अनुरागी अधर्म का पार नहीं पाता- ऐसी परिस्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूं। अर्थात भगवान का आविर्भाव केवल अनुरागी के लिये है- सो केवल भगतन हित लागी। अवतार किसी भाग्यवान साधक के अन्तराल में होता है। आप प्रकट होकर करते क्या हैं?
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय स भवामि युगे युगे।।८।

अर्जुन! साधूना परित्राणाय – परमसाध्य एकमात्र परमात्मा है, जिसे साथ लेने पर कुछ भी साधना शेष नहीं रह जाता। उस साध्य में प्रवेश दिलानेवाले विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि दैवी स पद को निर्विध्र प्रवाहित करने के लिये तथा च्दुष्कृतामज् जिनसे दूषित कार्यरूप लेते हैं उन काम, क्रोध, राग, द्वेषादि विजातीय प्रवृत्तियों को समूल नष्ट करने के लिये तथा धर्म को भली प्रकार स्थिर करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
युग का तात्पर्य सत्ययुग, त्रेता या द्वापर नहीं, युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों के स्वभाव पर है। युगधर्म सदैव रहते हैं। मानस में संकेत है-
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
युगधर्म सभी के हृदय में नित्य होते रहते हैं। अविद्या से नहीं बल्कि विद्या से, राममाया की प्रेरणा से हृदय में होते हैं। जिसे प्रस्तुत श्लोक में आत्ममाया कहा गया है, वही है राममाया। हृदय में राम की स्थिति दिला देनेवाली राम से प्रेरित है वह विद्या। कैसे समझा जाय कि अब कौन सा युग कार्य कर रहा है, तो सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। जब हृदय में शुद्ध सत्तवगुण ही कार्यरत हो, राजस तथा तामस दोनों गुण शान्त हो जायँ, विषमताएँ समाप्त हो गयी हो, जिसका किसी से द्वेष न हो, विज्ञान हो अर्थात इष्ट से निर्देशन लेने और उस पर टिकने की क्षमता हो, मन में प्रसन्नता का पूर्ण संचार हो- जब ऐसी योग्यता आ जाय तो सतयुग में प्रवेश मिल गया। इसी प्रकार दो अन्य युगों का वर्णन किया और अन्त में-
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
तामसी गुण भरपूर हो, किंचित राजसी गुण भी उसमें हो, चारों और वैर और विरोध हो तो ऐससा व्यक्ति कलियुगीन है। जब तामसी गुण कार्य करता है तो मनुष्य में आलस्य, निद्रा, प्रमाद का बाहुल्य होता है। वह कत्र्तव्य जानते जानते हुए भी उसमें प्रवृत्त नहीं हो सकता, निषिद्ध कर्म जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं हो सकता। इस प्रकार युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मनुष्यों की आन्तरिक योग्यता पर निर्भर है। किसी ने इन्हीं योग्यताओं को चार युग कहा है, तो कोई इन्हें ही चार वर्ण का नाम देता है, तो कोई इन्हें ही अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट चार श्रेणी के साधक कहकर स बोधित करता है। प्रत्येक युग में इष्ट साथ देते हैं। हाँ, उच्चश्रेणी में अनुकूलता की भरपूरता प्रतीत होती है, निम्र युगों में सहयोग क्षीण प्रतीत होता है। संक्षेप में, श्रीकृष्ण कहते हैं- साध्य वस्तु दिलानेवाले विवेक, वैराग्य इत्यादि को निर्विघ्र प्रवाहित करने के लिये तथा दूषण के कारक काम, क्रोध, राग द्वेष इत्यादि का पूर्ण विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा में स्थिर रखने के लिये मैं युग-युग में अर्थात हर परिस्थिति, हर श्रेणी में प्रकट होता हँू-बशर्ते कि ग्लानि हो। जब तक इष्ट समर्थन न दें, तब तक आप समझ ही नहीं सकंगे कि विकारों का विनाश हुआ अथवा अभी कितना शेष है? प्रवेश से पराकाष्ठापर्यन्त इष्ट हर श्रेणी में हर योग्यता के साथ रहते हैं। उनका प्राकट्य अनुरागी के हृदय में होता है। भगवान प्रकट होते हैं, तब तो सभी दर्शन करते होंगे? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं,
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वत:
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोडर्जुन।।९।।

अर्जुन! मेरा वह जन्म अर्थात् ग्लानि के साथ स्वरूप की रचना तथा मेरा कर्म अर्थात दुष्कृतियों के कारणों का विनाश, साध्य वस्तु को दिलानेवाली क्षमताओं का निर्दोष संचार, धर्म की स्थिरता, यह कर्म और जन्म दिव्य अर्थात अलौकिक है, लौकिक नहीं है। इन चर्मचक्षुओं से उसे देखा नहीं जा सकता, मन और बुद्धि से उसे मापा नहीं जा सकता। जब इतना गूढ़ है तो उसे देखता कौन है? केवल यो वेत्ति तत्वत: जिसने परम तत्व परमात्मा का तत्त्वत: तत्व से साक्षात कर लिया है, वह तत्वदर्शी है। उनसे ही पूछने का विधान है। वही मेरे इस जन्म और कर्म को देखता है और मेरा साक्षात् करके वह पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है।
जब तत्वदर्शी ही भगवान का जन्म और कार्य देख पाता है तो लोग लाखों की संख्या में भीड़ लगाये क्यों खड़े हैं कि कहीं अवतार होगा तो दर्शन करेंगे? क्या आप तत्वदर्शी हैं? महात्मा वेष में आज भी विविध तरीकों से, मुख्यत: महात्मा वेष की आड़ में बहुत से लोग प्रचार करते फिरते है कि वे अवतार हैं या उनके दलाल प्रचार कर देते हैं। लोग भेड़ की तरह अवतार को देखने टूट पड़ते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल तत्त्वदर्शी ही देख पता है। अब तत्वदर्शी किसे कहते है?
अध्याय २ में सत्-असत् का निर्णय देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया-अर्जुन! असत वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत का तीनों कालों में कभी अभाव नहीं है। तो क्या आप ऐसा कहते हैं? उन्होंने बताया- नहीं तत्वदर्शियों ने इसे देखा। न किसी भाषाविद ने देखा, न किसी समृद्धिशाली ने देखा। यहाँ पुन: बल देते हैं कि मेरा आविर्भाव तो होता है लेकिन उसे तत्वदर्शी ही देख पाता है। तत्वदर्शी एक प्रश्र है। ऐसा कुछ नहीं कि पाँच तत्व हैं, पचीस तत्व हैं- इनकी गणना सीख ली और हो गये तत्वदर्शी। श्रीकृष्ण ने आगे बतया कि आत्मा ही परमतत्व है। आत्मा परम से संयुक्त होकर परमात्मा हो जाता है। आत्मसाक्षात्कार करने वाला ही इस आविर्भाव को समझ पाता है। सिद्ध है कि अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है। आर भ में उसे वह समझ नहीं पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्यागकर पुनर्जनम को प्राप्त नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा जन्म दिव्य है, इसे देखनेवाला मुझे प्राप्त होता है, तो लोगों ने उनकी मूर्ति बना ली, पूजा करने लगे। आकाश में कहीं उनके निवास की कल्पना कर ली। ऐसा कुछ नहीं है। उन महापुरूष का आशय केवल इतना है कि यदि आप निर्धारित कर्म करें तो पायेंगे कि आप भी दिव्य हैं। आप जो हो सकते हैं, वह मैं हो गया हूँ। मैं आपकी स भावना हूं, आपका ही भविष्य हूं। अपने भीतर आप जिस दिन ऐसी पूर्णता पा लेंगे तो आप भी वही होंगे जो श्रीकृष्ण हैं। जो श्रीकृष्ण का स्वरूप है, वही आपका भी हो सकता है। अवतार कहीं बाहर नहीं होता। हाँ, यदि अनुरागपूरित हृदय हो तो आपके भीतर भी अवतार की अनुभूति स भव है। वे आपको प्रोत्साहित करते हैं कि बहुत से लोग इस मार्ग पर चलकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं-
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।१०।।

राग और विराग, दोनों से परे वीतराग तथा इसी प्रकार भय-अभय, क्रोध-अक्रोध दोनों से परे, अनन्य भाव से अर्थात अहंककाररहित मेरी शरण हुए बहुत से लोग ज्ञान तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। अब ऐसा होने लगा हो-ऐसी बात नहीं है, यह विधान सदैव रहा है। बहुत से पुरूष इसी प्रकार से मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। किस प्रकार? जिन जिन का हृदय अधर्म की वृद्धि देखकर परमात्मा के लिये ग्लानि से भर गया, उस स्थिति में मैं अपने स्वरूप को रचता हूँ।