अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्वेनातश्चयवन्ति ते।।२४।।

सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूं और स्वामी भी मैं ही हूं, परन्तु वे मुझे तत्व से भली प्रकार नहीं जानते, इसलिय च्यवन्ति गिरते हैं। अर्थात वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?-

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यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रता:।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।।

अर्जुन! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता है। वह मेरा साक्षात स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है-
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्रामि प्रयतात्मन:।।२६।।

भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूं अर्थात स्वीकार करता हूं। इसलिये-
यत्करोषि यदश्रासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यति कौन्तेय तत्कुरूष्व मदर्पणम्।।२७।।

अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लँगा।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।२८।।

इस प्रकार सर्वस्व के न्यास संन्यास योग से युक्त हुआ तू शुभाशुभ फलदाता कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर मुझे प्रापत होगा। उपर्युक्त तीन श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने क्रमबद्ध साधन और उसके परिणाम का चित्रण किया है- पहले पत्र-पुष्प, फल-जल का पूर्ण श्रद्धा से अर्पण, दूसरे समर्पित होकर कर्म का आचरण और तीसरे पूर्ण समर्पण के साथ सर्वस्व का त्याग। इनके द्वारा कर्मबन्धन से विमुक्त हो जायेगा। मुक्ति से मिलेगा क्या? तो बताया, मुझे प्राप्त होगा। यहाँ मुक्ति और प्राप्ति एक दूसरे के पूरक हैं। आपकी प्राप्ति ही मुक्ति है, तो उससे लाभ? इस पर कहते हैं-
समोऽहं सर्वभूतेषु न म द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजनित तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।२९।।

मैं सब भूतों से सम हूं। सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है और न अप्रिय हैं, किन्तु जो अनन्य भक्त है, वह मुझमें है और मैं उसमें हूं। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूं। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। तब तो बहुत भाग्यशाली लोग ही भजन करते होंगे? भजन करने का अधिकार किसे है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।।३०।।

यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से अर्थात मेरे सिवाय किसी अन्य वस्तु या देवता को न भजकर केवल मुझे ही निरनतर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है। अभी वह साधु हुआ नहीं है किन्तु उसके हो जाने में सन्देह भी नहीं है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। अत: भजन आप भी कर सकते हैं बशर्ते कि आप मनुष्य हों, क्योंकि मनुष्य ही यथार्थ निश्चयवाला है। गीता पापियों का उद्वार करती है और वह पथिक-
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।।३१।।

इस भजन के प्रभाव से वह दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाता है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। कौन्तेय! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यदि एक जन्म में पार नहीं लगा तो अगले जनमों में भी वही साधन करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त होता है। अत: सदाचारी, दुराचारी सभी को भजन करने का अधिकार है। इतना ही नहीं, अपितु-