पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।१७।।

अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का धाता अर्थात धारण करनेवाला पिता, अर्थात पालन करनेवाला, माता अर्थात उत्पन्न करनेवाला, पितामह: अर्थात मूल उद्गम हूं, जिसमें सभी प्रवेश पात हैं और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात अहं आकार इति ओंकार:- वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है। सोऽहं, तत्वमसि इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य स्वरूप मैं ही हूं। ऋक् अर्थात सम्पूर्ण प्रार्थना, साम अर्थात समत्व दिलानेवाली प्रक्रिया, यजु: अर्थात यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूं। योग-अनुष्ठान के उक्त तीनो आवश्यक अंग मुझसे होते हैं।

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गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।१८।।

हे अर्जुन! गति: अर्थात प्राप्त होने योग्य परमगति, भर्ता – भरण पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, साक्षी अर्थात द्रष्टा-रूप में स्थित सबको जाननेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, अकारण प्रेेमी मित्र, उत्पत्ति और प्रलय अर्थात शुभाशुभ संस्कारों का विलय तथा अविनाशी कारण मैं ही हूं। अर्थात अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है, वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूं।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।१९।।

मैं सूर्यरूप से तपता हूं, वर्षा को आकर्षित करता हूं और उसे बरसाता हूं। मृत्यु से परे अमृत-तत्व तथा मृत्यु, सत और असत सब कुछ मैं ही हूं। अर्थात जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूं। अर्थात जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूं। कभी-कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं-
त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्चन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।२०।।

आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजु: अर्थात प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात चन्द्रमा के क्षीण प्रकार को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरूष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनको पुनर्जनम होता है, जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं, किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरूष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात वह भोग भी मैं ही देता हूं।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मत्र्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते।।२१।।

वे उस विशाल स्वर्ग को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक अर्थात जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार त्रयीधर्मम् प्रार्थना, समत्व एवं यजन की तीनों विधियों से एक ही यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले मेरी शरण हुए भी कामनावाले पुरूष बारम्बार जाने-आने को अर्थात पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं किन्तु उनका मूल नाश कभी नहीं होता, क्योंकि इस पथ में बीज का नाश नहीं है। किन्तु जो कसी प्रकार की कामना नहीं करते, उन्हें क्या मिलता?
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।२२।।

अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं, पर्युपासते लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैें। उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरूषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं अर्थात उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूं। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं-
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।।२३।।

कौन्तेय! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, क्योंकि वहाँ देवता नाम की कोई वस्तु तो होती नहीं, किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि से रहित है।
यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के प्रकरण को लिया है। सर्वप्रथम अध्याय सात के बीसवें से तेईसवें श£ोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन! कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि पुरूष अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और जहाँ पूजा करते हैं, वहाँ देवता नाम की सक्षम सत्ता तो है ही नहीं। पीपल, पत्थर, भूत, भवानी अथवा अन्यत्र जहाँ उनकी श्रद्धा झुक जाती है, वहाँ कोई देवता नहीं है। मैं ही सर्वत्र हूं। उस स्थान पर मैं ही खड़ा होकर उनकी देवश्रद्धा को उन स्थानों पर स्थिर करता हूं। मैं ही फल का विधान करता हूं, फल देता हूं। फल निश्चित मिलता है, किन्तु उनका फल नाशवान है। आज है तो कल भोगने में आ जायेगा, नष्ट हो जायेगा, जबकि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। अत: वे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण हो गया है, वही अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।
प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुन: दुहराते हैं कि अर्जुन! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे मुझे ही पूजते हैं, किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्र उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही पूजते हैं और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है?