अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।।११।।

सम्पूर्ण भूतों के महान ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे मनुष्य शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हँू, किन्तु हँू मनुष्य-शरीरधारी, मूढ्लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरूष का शरीर ही तो दिखाई पड़ता है। कैसे वे समझें कि आप महान ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस:।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता:।।१२।।

वे वृथा आशा, वृथा कर्म, वृथा ज्ञान, विचेतस: विशेष रूप से अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के से मोहित होनेवाले स्वभाव को धारण किये होते हैं अर्थात आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं। असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते, किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं-
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता:।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।१३।।

परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर अनन्य मन से अर्थात मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल मुझमें श्रद्धा रखकर निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं-
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।१४।।

वे निरन्तर चिन्तन के व्रत में अचल रहते हुए मेरे नाम और गुणों का चिन्तन करते हैं, प्राप्ति के यत्न करते हैं और मुझे बारम्बार नमस्कार करते हुए सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। अविरल लगे रहते हैं। कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है य कीर्तिमान? कोई दूसरी उपासना नहीं वरन वही यज्ञ, जिसे विस्तार से बता आये हैं। उसी आराधना को यहाँ संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दुहरा रहे हैं-
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।१५।।

उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं, कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं, क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता हैं, किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- यज्ञ मैं करता हँू। यदि महापुरूष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा। उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहँुच सका है। वस्तुत: यज्ञकर्ता कौन है? इस पर योगेश्वर कहते हैं –
अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्रिरहं हुतम्।।१६।।

कत्र्ता मैं हँॅू। वस्तुत: कत्र्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित करनेवाला इष्ट ही है। कत्र्ता द्वारा जो पार लगता है, मेरी देन है। यज्ञ मैं हँू। यज्ञ आराधना की विधि विशेष है। पूर्तिकाल में या जिसका सृजन करता है, उस अमृत को पान करनेवाला पुरूष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। स्वधा मैं हँू अर्थात अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना, उन्हें तृप्त कर देना मेरी देन है। भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हँू। मुझे पाकर लोग इस रोग से निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्र मैं हँू। मन का श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी देन है। इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु आज्य भी मैं हँू। मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं। हवन अर्थात समर्पण भी मैं ही हँू।
यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार मैं हँू कह रहे हैं। इसका आशय मात्र इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता हँू तथा निरन्तर निर्णय देते हुए योगक्रिया को पूर्ण कराता हँू। इसी का नाम विज्ञान है। पूज्य महाराज जी कहा करते थे कि जब तक इष्टदेव रथी होकर श्वास-प्रश्वास पर रोकथाम न करने लगें, तब तक भजन आरम्भ ही नहीं होता। कोई लाख आँख मँूदे, भजन करे, शरीर को तपा डाले, लेकिन जब तक जिस परमात्मा की हमें चाह है वह, जिस सतह पर हम खड़े हैं उस स्तार पर उतरकर आत्मा से अभिन्न होकर जागृत नहीं हो जाता, तब तक सही मात्रा में भजन का स्वरूप समझ में नहीं आता। इसलिये महाराज जी कहते थे- मेरे स्वरूप को पकड़ो, मैं सब दँूगा। श्रीकृष्ण कहते हैं- सब मुझसे होता हैं।