पढ़े: यर्थाथ गीता के सप्तमोऽध्याय के 01 से लेकर 06 तक श्लोक

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गत अध्यायों में गीता के मुख्य-मुख्य प्राय: सभी प्रश्र पूर्ण हो गये हैं। निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग, कर्म तथा यज्ञ का स्वरूप और उसकी विधि, योग का वास्तविक स्वरूप और उसका परिणाम तथा अवतार, वर्णसंकर, सनातन, आत्मस्थित महापुरूश के लिये भी लोकहितार्थ कर्म करने पर बल, युद्ध इत्यादि पर विशद चर्चा की गयी। अगले अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इन्हीं से सन्दर्भित अनेक पूरक प्रश्रों को लिया है, जिनका समाधान तथा अनुष्ठान आराधना में सहायक सिद्ध होगा। छठें अध्याय के अन्तिम श्लोक में योगेश्वर ने यह कहकर प्रश्र का स्वयं बीजारोपण कर दिया कि जो योगी मद्गतेनान्तरात्मना – मुझमें अच्छी प्रकार स्थित अन्त: करणवाला है, उसे मैं अतिशय श्रेष्ठ योगी मानता हूं। परमात्मा में अच्छी प्रकार स्थिति क्या है? बहुत से योगी परमात्मा को प्राप्त तो होते हैं फिर भी कहीं कोई कमी उन्हें खटकती है। लेशमात्र भी कसर न रह जाय, ऐसी अवस्था कब आयेगी? सम्पूर्णता से परमात्मा की जानकारी कब आयेगी? कब होती है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

श्रीभवानुवाच
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृगु।।१।।

पार्थ! तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला, बाहरी नहीं अपितु मदाश्रय: मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ मुझको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात लेशमात्र भी संशय न रज जाय, विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर पुन: बल देते हैं-
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिंद वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।२।।

मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित ज्ञान को सम्पूर्णता से कहूंगा। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस अमृत-तत्व की प्राप्ति के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। परमतत्व परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। महापुरूष को एक साथ सर्वत्र कार्य करने की जो क्षमता मिलती है, वह विज्ञान है। कैसे वह प्रभु एक साथ सबके हृदय में कार्य करता है? किस प्रकार वह उठाता, बैठाता और प्रकृति के द्वन्द्व से निकालकर स्वरूप तक की दूरी तय करा लेता है। उसकी इस कार्य-प्रणाली का नाम विज्ञान है। इस विज्ञानसहित ज्ञान को सम्पूर्णता से कहूंगा, जिसे जानकर संसार में और कुछ भी जानने योग्य नहीं रह जायेगा। जाननेवालों की संख्या बहुत कम है-
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।३।।

हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियों में भी कोई विरला ही पुरूष मुझे तत्व के साथ जानता है। अब समग्र तत्त्व है कहाँ? एक स्थान पर पिण्डरूप में है अथवा सर्वत्र व्याप्त है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।४।।

अर्जुन! भूमि, जल, अग्रि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार-ऐसे यह आठ प्रकार के भेदोंवाली मेरी प्रकृति है। यह अष्टधा मूल प्रकृति है।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।५।।

इयम् अर्थात यह आठ प्रकारोंवाली तो मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात जड़ प्रकृति है। महाबाहु अर्जुन! इससे दूसरी को जीवरूप परा अर्थात चेतन प्रकृति जान, जिसने सम्पूर्ण जगत धारण किया हुआ है। वह है जीवात्मा। जीवात्मा भी प्रकृति के सम्बन्ध में रहने के कारण प्रकृति ही है।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।।६।।

अर्जुन! ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत एतद्योनीनि – इन महाप्रकृतियों से, परा और अपरा प्रकृतियों से ही उत्पन्न होनेवाले हैं। यही दोनों एकमात्र योनि हैं। मैं सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति तथा प्रयल रूप हँू अर्थात मूल कारण हूँ। जगत् की उत्पत्ति मुझसे है और विलय भी मुझमें है। जब तक प्रकृति विद्यमान है, तब तक मैं ही उसकी उत्पत्ति हूं और जब कोई महापुरूष प्रकृति का पार पा लेता है, तब मैं ही महाप्रलय भी हूं, जो अनुभव में आता है।
सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के प्रश्र को मानव समाज के कौतूहल से देखा है। विश्व के अनेक शास्त्रों में इसे किसी न किसी तरह समझाने का प्रयास चला आ रहा है। कोई कहता है कि प्रलय में संसार डूब जाता है, तो किसी के अनुसार सूर्य इतना नीचे आ जाता है कि पृथ्वी जल जाती है। कोई इसी को कयामत कहता है कि इसी दिन सबका फैसला सुनाया जाता है, तो कोई नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय की गणना में व्यस्त है। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार प्रकृति अनादि है। परिवर्तन होते रहे हैं, किन्तु यह नष्ट कभी नहीं हुई।
भारतीय धर्मग्रन्थों के अनुसार मनु ने प्रलय देखा था। इसके साथ ग्यारह ऋषियों ने मत्स्य की सींग में नाव बाँधकर हिमालय के एक उत्तुंग शिखर की शरण ली थी। लीलाकार श्रीकृष्ण के उपदेशों एवं जीवन में सम्बन्धित उनके समकालीन शास्त्र भागवत में मृकण्डु मुनि के पुत्र मार्कण्डेय जी द्वारा प्रलय का आँखों देखा हाल प्रस्तुत है। वे हिमालय के उत्तर में पुष्पभद्रा नदी के किनारे रहते थे।
भागवत के द्वादश स्कन्ध के आठवें और नौवें अध्याय के अनुसार शौनकादि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि मार्कण्डेय जी ने महाप्रलय में वट के पत्ते पर भगवान बालमुकुन्द के दर्शन किये थे, किन्तु वे तो हमारे ही वंश के थे, हमसे कुछ ही समय पूर्व हुए थे। उनके जन्म के बाद न कोई प्रलय हुआ और न सृष्टि ही डूबी। सब कुछ यथावत है, तब उन्होंने कैसा प्रय देखा?
सूत जी ने बताया कि मार्कण्डेय जी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर नर नारायण ने उन्हें दर्शन दिया। मार्कण्डेय जी ने कहा कि मैं आपकी वह माया देखना चाहता हूं, जिससे प्रेरित होकर यह आत्मा अनन्त योनियों में भ्रमण करता है। भगवान ने स्वीकार किया। एक दिन जब मुनि अपने आश्रम में भगवान के चिन्तन में तन्मय हो रहे थे, तब उन्हें दिखायी पड़ा कि चारों और से समुद्र उमड़कर उनके ऊपर आ रहा है। उसमें मगर छलाँगे लगा रहे थे। उनकी चपेट में ऋषि मार्कण्डेय भी आ रहे थे। वे इधर उधर बचने के लिये भाग रहे थे। आकाश, सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, स्वर्ग, ज्योतिर्मण्डल सभी उस समुद्र में डूब गये। इतने में मार्कण्डेय जी को बरगद का पेड़ और उसके पत्ते पर एक शिशु दिखायी दिया। श्वास के साथ मार्कण्डेय जी भी उस शिशु के उदर में चले गये और अपना आश्रम, सूर्यमण्डलसहित सृष्टि को जीवित पाया और पुन: श्वास के साथ उस शिशु के उदर से वे बाहर आ गये। नेत्र खुलने पर मार्कण्डेय जी ने अपने को उसी आश्रम में अपने ही आसन पर पाया।
स्पष्ट है कि करोड़ों वर्ष के भजन के पश्चात् उन मुनि ने ईश्वरीय दृश्य को अपने हृदय से देखा, अनुभव में देखा। बाहर सब कुछ ज्यों-का-त्यों था। अत: प्रलय योगी के हृदय में ईश्वर से मिलनेवाली अनुभूति है। भजन के पूर्तिकाल में योगी के हृदय में संसार का प्रवाह मिटकर अव्यक्त परमात्मा ही शेष बचता है, यही प्रलय है। बाहर प्रलय नहीं होता। महाप्रलय शरीर रहते ही अद्वैत की अनिर्वचनीय स्थित है। यह क्रियात्मक है। केवल बुद्धि से निर्णय लेनेवाले भ्रम का ही सृजन करते हैं, चाहे हम हों या आप।