पढ़े: यर्थाथ गीता के षष्ठोऽध्याय: के 01 से लेकर 10 तक श्लोक

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संसार में धर्म के नाम पर रीति-रिवाज, पूजा-पद्धतियाँ, स प्रदायों का बाहुल्य होने पर कुरीतियों का शमन करके एक ईश्वर की स्थापना एवं उसकी प्राप्ति की प्रक्रिया को प्रशस्त करने के लिये किसी महापुरूष का आविर्भाव होता है। क्रियाओं को छोड़कर बैठ जाने और ज्ञानी कहलाने की रूढि़ कृष्णकाल में अत्यनत व्यापक थी। इसलिये इस अध्याय के प्रार भ में ही योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रश्र को चौथी बार स्वयं उठाया कि ज्ञानयोग तथा निष्काम कर्मयोग दोनों के अनुसार कर्म करना ही होगा।

अध्याय दो में उनहेांने कहा-अर्जुन! क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कोई रास्ता नहीं है। इस युद्ध में हारोगे तो भी देवत्व है और जीतने पर महामहिम स्थिति है ही- ऐसा समझकर युद्ध कर। अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि। यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में ऐसा नहीं है कि हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें। ज्ञानयोग में केवल अपने हानि लाभ का स्वयं निश्चय करके, अपनी शक्ति समझकर कर्म में प्रवृत्त होना है, जबकि प्रेरक महापुरूष ही हैं। ज्ञानयोग में युद्ध करना अनिवार्य है।
अध्याय तीन में अर्जुन ने प्रश्र किया-भगवन्! निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानयोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो मुझे घोर कर्मों में क्यों लगाते हैं? अर्जुन को निष्काम कर्मयोग कठिन प्रतीत हुआ। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि दोनों निष्ठाएँ मेरे द्वारा कही गयी हैं, किन्तु किसी भी पथ के अनुसार कर्म को त्यागकर चलने का विधान नहीं है। न तो ऐसो ही है कि कर्म को न आर भ करने से कोई परम नैष्क र्य की सिद्धि पा ले और न आर भ की हुई क्रिया को त्याग देने से कोई उस परमसिद्धि को पाता है। दोनों मार्गों में नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया को करना ही होगा।
अब अर्जुन ने भली प्रकार समझ लिया कि ज्ञानमार्ग अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, दोनों दृष्टियों में कर्म करना ही है, फिर भी पाँचवें अध्याय में उसने प्रश्र किया कि फल की दृष्टि से कौन श्रेष्ठ है? कौन सुविधाजनक है?
श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! दोनों ही परमश्रेय को देनेवाले हैं। एक ही स्थान पर दोनों पहुँचाते हैं, फिर भी सां य की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है, क्योंकि निष्काम कर्म का आचरण किये बिना कोई संन्यासी नहीं हो सकता। दोनों में कर्म एक ही है। अत: स्पष्ट है कि वह निर्धारित कर्म किये बिना कोई संन्यासी नहीं हो सकता और न कोई योगी ही हो सकता है। केवल इस पर चलनेवाले पथिकों को दो दृष्टियाँ हैं, जो पीछे बतायी गयी हैं।
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्रिर्न चाक्रिय:।।१।।

श्रीकृष्ण महाराज बोले- अर्जुन! कर्मफल के आश्रय से रहित होकर अर्थात कर्म करते समय किसी प्रकार की कामना न रखते हुए जो कार्यम् कर्म करने योग्य प्रक्रिया विशेष को करता है वही संन्यासी है, वहीं येागी है। केवल अग्रि को त्यागनेवाला तथा केवल क्रिया को त्यागनेवाला न संन्यासी है न योगी। क्रियाएँ बहुत सी हैं। उनमें से कार्यम् कर्म करने योग्य क्रिया, नियत कर्म निर्धारित की हुई कोई क्रिया विशेष है। वह है यज्ञ की प्रक्रिया। जिसका शुद्ध अर्थ है आराधना, जो आराध्य देव में प्रवेश दिला देनेवाली विधि विशेष है। उसको कार्यरूप देना कर्म है। जो उसे करता है वही संन्यासी है, वही योगी होता है। केवल अग्रि को त्यागनेवाला कि हम अग्रि नहीं छूते, या कर्म त्यागनेवाला कि मेरे लिए कर्म है ही नहीं, मैं तो आत्मज्ञानी हूँ। केवल ऐसा कह और कर्म आर भ ही न करे, करने योग्य क्रिया विशेष न करे तो वह संन्यासी है न योगी। इस पर और देखें-
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।२।।

अर्जुन! जिसे संन्यास ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग जान, क्योंकि संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरूष न योगी होता है और न ही संन्यासी होता है अर्थात् कामनाओं का त्याग दोनों ही मार्गियों के लिये आवश्यक है। तब तो सरल है कि कह दें कि हम संकल्प नहीं करते और हो गये योगी संन्यासी। श्रीकृष्ण्या कहते हैं, ऐसा कदापि नहीं है-
आरूरूक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते।।३।।

योग पर आरूढ़ होने की इच्छावाले मननशील पुरूष के लिये योग की प्राप्ति में कर्म करना ही कारण है और योग का अनुष्ठान करते-करते जब वह परिणाम देने की अवस्था में आ जाय, उस योगारूढ़ता में शम: कारणम उच्यते- स पूर्ण संकल्पों का अभाव कारण है। इससे पहले संकल्प पिण्ड नहीं छोड़ते। और-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।४।।

जिस काल में पुरूष न तो इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होता है और न कर्मों में ही आसक्त है (योग की परिपक्वावस्था में पहुँच जाने पर आगे कर्म करके ढँूढ़े किसे? अत: नियत कर्म आराधना की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसलिये वह कर्मों में भी आसक्त नहीं है) उस काल में सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी सर्वसंकल्पों का अभाव है। वही संन्यास है, वही योगारूढ़ता है। रास्ते में संन्यास नाम की कोई वस्तु नहीं है। इस योगारूढ़ता से लाभ क्या है?-
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।५।।

अर्जुन! मनुष्य को चाहिये कि अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने आत्मा को अधोगति में न पहँुचावे, क्योंकि यह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और यही अपना शत्रु भी है। कब यह शत्रु होता है और कब मित्र? इस पर कहत हैं…
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।५।।

अर्जुन! मनुष्य को चाहिये कि अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने आत्मा को अधोगति में न पहँुचावे, क्योंकि यह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और यही अपना शत्रु भी है। कब यह शत्रु होता है और कब मित्र? इस पर कहत हैं।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।६।।

जिस पुरूष द्वारा मन और इनिद्रयोंसहित शरीर जीता हुआ है, उसके लिये उसी का आत्मा मित्र है और जिसके द्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह स्वयं शत्रुता में बरतता है।
इन दो श£ाकों में श्रीकृष्ण एक ही बात कहते हैं कि अपने द्वारा अपने आत्मा का उद्धार करें, उसे अधोगति में न पहुँचावें, क्योंकि आत्मा ही मित्र है। सृष्टि में न दूसरा कोई शत्रु है, न मित्र। किस प्रकार? जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती हुई हैं, उसके लिये उसी का आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतता है, परमकल्याण करनेवाला होता है और जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयी हैं, उसके लिये उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता हैं, अनन्त योनियों और यातनाओं की ओर ले जाता है। प्राय: लोग कहते हैं – मैं तो आत्मा हूँ। गीता में लिखा है न इसे शस्त्र काट सकता है, न अग्रि जला सकती है, न वायु सुख सकता है। यह नित्य है, अमृतस्वरूप है, न बदलनेवाला है, शाश्वत है और वह आत्मा अधोगति में भी जाता है। आत्मा का उद्धार भी होता है, जिसके लिये कार्यम् कर्म करने योग्य प्रक्रिया विशेष करके ही उपलब्धि बतायी गयी है। अब अनुकूल आत्मा के लक्षण देखें-
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।
शीतोष्णसुखदु: खेषु तथा मानापमानयो:।।७।।

सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख और मान-अपमान में जिसके अन्त:करण की वृत्तियाँ भली प्रकार शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरूष में परमात्मा सदैव स्थित है, कभी विलग नहीं होता। जितात्मा अर्थात जिसने मनसहित इन्द्रियों को जीत लिया है, वृत्ति परमशान्ति में प्रवाहित हो गयी है। आगे कहते हैं…
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय:।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचन:।।८।।

जिसका अन्त:करण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति अचल, स्थिर और विकाररहित है, जिसने इन्द्रियों को विशेष रूप से जीत लिया है, जिसकी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण एक समान हैं- ऐसा योगी युक्त कहा जाता है। युक्त का अर्थ है योग से संयुक्त। यह योग की पराकाष्ठा है, जिसे योगेश्वर पाँचवें अध्याय में श£ोक सात से बारह तक चित्रित कर आये हैं। परमतत्व परमात्मा का साक्षात्कार और उसके साथ होनेवाली जानकारी ज्ञान है। एक इंच भी इष्ट से दूरी है, जानने की इच्छा बनी है, तब तक वह अज्ञानी है। वह प्रेरक कैसे सर्वव्याप्त है? कैसे प्रेरणा देता है? कैसे अनेक आत्माओं का एक साथ पथ प्रदर्शन करता है? कैसे वह भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञाता है? उस प्रेरक इष्ट की इस कार्य प्रणाली का ज्ञान ही विज्ञान है। जिस दिन से हृदय में इष्ट का आविर्भाव होता है, उसी दिन से वह निर्देश देने लगता है, किन्तु प्रार भ में साधन समझ नहीं पाता। पराकाष्ठाकाल में ही योगी उसकी आन्तरिक कार्य प्रणाली को पूर्णत: समझ पाता है। यही समझ विज्ञान है। योगारूढ़ अथवा युक्तपुरूष का अन्त:करण ज्ञान विज्ञान से तृप्त रहता है। इसी प्रकार योगयुक्त पुरूष की स्थिति का निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण पुन: कहते हैं-
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।९।।

प्राप्ति के पश्चात् महापुरूष समदर्शी और समवर्ती होते हैं। जैसे पिछले अध्याय में उन्होंने बताया कि जो पूर्णज्ञाता या पण्डित है, वह विद्या-विनयस पन्न ब्राह्मण में, चाण्डाल में, गाय-कुत्ता-हाथी में समान दृष्टिवाला होता है- उसी का पूरक यह श£ोक है। वह हृदय से सहायता करनेवाले सहृदय, मित्र, बैरी, उदासीन, द्वेषी, बन्धुगणों, धर्मात्मा तथा पापियों में भी समान दृष्टिवाला योगयुक्त पुरूष अतिश्रेष्ठ है। वह उनके कार्यों पर दृष्टि नहीं डालता बल्कि उनके भीतर आत्मा के संचार पर ही उसकी दृष्टि पड़ती है। इन सबमें वह केवल इतना ही अन्तर देखता है कि कोई कुछ नीचे की सीढ़ी पर खड़ा है, तो कोई निर्मलता के समीप, किनतु वह क्षमता सबमें है। यहाँ योगयुक्त के लक्षण पुन: दुहराये गये।
कोई येागयुक्त कैसे बनता है? वह कैसे यज्ञ करता है? यज्ञस्थली कैसे हो? आसन कैसा हो? उस समय कैसे बैठा जाय? कत्र्ता के द्वारा पालन किये जानेवाले नियम, आहार-विहार, सोने-जागने का संयम तथा कर्म पर कैसी चेष्टा हो? इत्यादि बिन्दुओं पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अगले पाँच श£ोकों में प्रकाश डाला है, जिससे आप भी उस यज्ञ को स पन्न कर सकें।
अध्याय तीन में उन्होंने यज्ञ का नाम लिया और बताया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही वह नियत कर्म है। अध्याय चार में उन्होंने यज्ञ का स्वरूप विस्तार से बताया, जिसमें प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण अपान की गति रोककर मन का निरोध इत्यादि किया जाता है। सब मिलाकर यज्ञ का शुद्ध अर्थ है आराधना तथा उस आराध्य देव तक की दूरी तय करानेवाली प्रक्रिया, जिस पर पाँचवें अध्याय में भी कहा। किन्तु उसके लिये आसन, भूमि करने की विधि इत्यादि का चित्रण शेष था, उसी पर योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ प्रकाश डालते हैं-
योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थित:।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह:।।१०।।

चित्त को जीने में लगा हुआ योगी मन, इन्द्रियों और शरीर को वश में रखकर, वासना और संग्रहरहित होकर एकान्त स्थान में अकेला ही चित्त को योग क्रिया में लगावे। उसके लिये स्थान कैसा हो? आसन कैसा रहे?…