कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योनि: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।११।।

योगीजन केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं। जब कर्म ब्रहा्र में विलीन हो चुके तो क्या अब भी आत्मा अशुद्ध ही है? नहीं, वे सर्वभूतात्मभूतात्मा हो चुके हैं। सम्पूर्ण प्राणियों में वे अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं। उन समस्त आत्माओं की शुद्धि के लिये, आप सबका मार्गदर्शन करने के लिये वे कर्म में बरतते हैं। शरीर, मन, बुद्धि तथा केवल इन्द्रियों से वह कर्म करता है, स्वरूप से वह कुछ भी नहीं करता, स्थिर है। बाहर से वह सक्रिय दिखायी देता है, किन्तु भीतर उमसें असीम शान्ति है। रस्सी जल चुकी, मात्र ऐंठन (आकार) शेष है, जिससे बँध नहीं सकता।

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युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्रोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।१२।।

योगयुक्त अर्थात योग के परिणाम को प्राप्त पुरूष, जो सब प्राणियों के आत्मा के मूल परमात्मा में स्थित हैं, ऐसा योगी कर्म के फल को त्यागकर (कर्मों का फल परमात्मा उससे भिन्न नहीं है, इसलिये अब कर्मफल को त्यागकर) नैष्टिकीम् शान्तिम् आप्रोति शान्ति की अन्तिम अवस्था को प्राप्त होता है, जिसके आगे कोई शान्ति शेष नहीं है, जिसके पश्चात वह कभी अशान्त नहीं होगा। किन्तु अयुक्त पुरूष, जो योगी के परिणाम से युक्त नहीं हैं, अभी रास्ते में है ऐसा पुरूष फल में आसक्त हुआ। उसका आसक्त होना आवश्यक है। इसलिये फ में आसक्त होने पर भी कामकारेण निबध्यते- कामना करके बँध जाता है अर्थात पूर्तिपर्यन्त कामनाएँ जागृत होती हैं, अत: साधक को पूर्तिपर्यन्त सावधान रहना चाहिये। महाराज जी कहा करें- हो! तनिकौ हम अलग, भगवान अलग हैं तो माया कामयाब हो सकती है। कल की प्राप्ति होनी हो किन्तु आज तो वह अज्ञानी ही है। अत: पूर्तिपर्यन्त साधक को असावधान नहीं होना चाहिये। इसी पर आगे देखें-
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।।

जो सम्पूर्ण रूप से स्ववश है, जो शरीर, मन, बुद्धि और प्रकृति से परे स्वयं में स्थित है, ऐसा वशी पुरूष नि:सन्देह न कुछ करता है न कराता है। पीछेवालों से कराना भी उसकी आन्तरिक शान्ति का स्पर्श नहीं कर पाता। ऐसा स्वरूपस्थ शब्दादि विषयों को उपलब्ध करानेवाले नौ द्वारों (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र, एक मुख, उपस्थ एवं पायु) वाले शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्या”कर स्वरूपानन्द में ही स्थित रहता है। यथार्थत: वह न कुछ करता है और न कराता है।
इसी को पुन: श्रीकृष्ण दूसरे शब्दों में कहते हैं कि वह प्रभु न करता है, न कराता है। सद्”ुरू, भ”वान, प्रभु, स्वरूपस्थ महापुरूष, युक्त इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं। अल” से कोई भ”वान कुछ करने नहीं आता। वह जब करता है तो इन्हीं स्वरूपस्थ इष्ट के माध्यम से कराता है। महापुरूष के लिये शरीर एक मकान मात्र है। अत: परमात्मा का करना और महापुरूष का करना एक ही बात है, क्योंकि वह उनके द्वारा है। वस्तुत: वह पुरूष करते हुए भी कुछ नहीं करता। इसी पर अगला श£ोक देखें-
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयो”ं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

वह प्रभु न तो भूतप्राणियों के कत्र्तापन को, न कर्मों को और न कर्मफलों का संयोग ही बैठाता है, बल्कि स्वभाव में स्थित प्रकृति के दबाव के अनुसार ही सभी बरतते हैं। जैसी जिसकी प्रकृति, सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी है, उसी स्तर से वह बरतता है। प्रकृति तो लम्बी-चौड़ी है, लेकिन आपके ऊपर उतना ही प्रभाव डाल पाती है जितना आपका स्वभाव विकृत अथवा विकसित है।
प्राय: लोग कहते हैं कि करने करानेवाले तो भगवान हैं, हम तो यन्त्रमात्र हैं। हमसे वे भला करावें अथवा बुरा। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि न वह प्रभु स्वयं करता है, न कराता है और न वह जुगाड़ ही बैठाता है। लोग अपने स्वभाव में स्थित प्रकृति के अनुरूप बरतते हैं। स्वत: कार्य करते हैं। वे अपने आदत से मजबूर होकर करते हैं, भगवान नहीं करते। तब लोग कहते क्यों हैं कि भगवान करते हैं? इस पर योगेश्वर बताते हैं-
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:।।१५।।

जिसे अभी प्रभु कहा, उसी को यहाँ विभु कहा गया है, क्योंकि वह सम्पूर्ण वैभव से संयुक्त है। प्रभुता एवं वैभव से संयुक्त वह परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के पुण्यकर्मों को ही ग्रहण करता है, फिर भी लोग कहते क्यों हैं? इसलिये कि अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है। उन्हें अभी साक्षात्कारसहित ज्ञान तो हुआ नहीं, वे अभी जन्तु हैं। मोहवश वे कुछ भी कह सकते हैं। ज्ञान से क्या होता है? इसे स्पस्ट करते हैं…
ज्ञानने तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन:।
तेषामादित्यवज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।।१६।।

जिसके अन्त:करण का वह अज्ञान (जिसने ज्ञान को ढँक रखा था) आत्मसाक्षात्कार द्वारा नष्ट हो गया है और इस प्रकार जिसने ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस परमतत्व परमात्मा को प्रकाशित करता है। तो क्या परमात्मा किसी अन्धकार का नाम है? नहीं, वह तो परम प्रकास रूप दिन राती। परम प्रकाशरूप है। है तो, किनतु हमारे उपभोग के लिये तो नहीं है, दिखायी तो नहीं देता? जब ज्ञान द्वारा अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उसका वह ज्ञान सूर्य के सदृश परमात्मा को अपने से प्रवाहित कर लेता है। फिर उस पुरूष के लिये कहीं अन्धकार नहीं रह जाता। उस ज्ञान का स्वरूप क्या है?-
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:।।१७।।

जब उस परमतत्व परमात्मा के अनुरूप बुद्धि हो, तत्त्व के अनुरूप प्रवाहित मन हो, परमतत्व परमात्मा में एकीभाव से उसकी रहनी हो और उसी के परायण हो, इसी का नाम ज्ञान है। ज्ञान कोई बकवास या बहस नहीं है। इस ज्ञान द्वारा पापरहित हुआ पुरूष पुनरागमनरहित परम”ति को प्राप्त होता है। परम”ति को प्राप्त, पूर्ण जानकारी से युक्त पुरूष ही पण्डित कहलाते हैं। आगे देखें-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राहा्रणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्रवपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।।१८।।

ज्ञान के द्वारा जिनका पाप शमन हो चुका है, जो अपुनरावर्ती परम”ति को प्राप्त हैं, ऐसे ज्ञानीजन विद्या विनयुक्त ब्राहा्रण तथा चाण्डाल में, गाय और कुत्ते में तथा हाथी में समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्या विनययुक्त ब्राहा्रण न तो कोई विशेषता रखता है और न चाण्डाल कोई हीनता रखता है। नगाय धर्म है, न कुत्ता अधर्म और न हाथी विशालता ही रखता है। ऐसे पण्डित, ज्ञाताजन समदर्शी और समवर्ती होते हैं। उनकी दृष्टि चमड़ी पर नहीं रहती, बल्कि आत्मा पर पड़ती है। अन्तर केवल इतना है, विद्या विनयसम्पन्न स्वरूप के समीप है और शेष कुछ पीछे हैं। कोई एक मंजिल आगे है, तो कोई पड़ाव पर। शरीर तो वस्त्र है। उनकी दृष्टि वस्त्र को महत्व नहीं देती अपितु उनके हृदय में स्थित आत्मा पर पड़ती है, इसलिये वे कोई भेद नहीं रखते।
श्रीकृष्ण ने पर्याप्त गा-सेवा की थी। उन्हें गाय के प्रति गारवपूर्ण शब्द कहना चाहिये था, किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। श्रीकृष्ण ने गाय को धर्म में कोई स्थान नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना माना कि अन्य जीवात्माओं की तरह उसमें भी आत्मा है। गाय का आर्थिक महत्व जो भी हो, उसका धार्मिक वैशिष्ट्य परवर्ती लोगा की देन है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि अविवकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में वे उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। वे कुछ पाते नहीं, नष्ट हो जाते हैं। जबकि निष्काम कर्मयो” में अर्जुन! निर्धारित क्रिया एक ही है- यज्ञ की प्रक्रिया आराधना। गाय, कुत्ता, हाथी, पीपल, नदी का धार्मिक महत्व इन अनन्त शाखावालों की देन है। यदि इनका कोई धार्मिक महत्त्व होता तो श्रीकृष्ण अवश्य कहते। हाँ, मन्दिर, मस्जिद इत्यादि पूजा के स्थल आरम्भिक काल में अवश्य है। वहाँ प्रेरणादायक सामूहिक उपदेश हैं तो उनकी उपयोगाता अवश्य है, वे धर्मोपदेश केन्द्र हैं।
अपुनरावृत्तिवाला ऐसा महापुरूष उस विद्या-विनयसम्पन्न ब्राहा्रण, चाण्डाल, कुत्ता, हाथी और गाय सब पर समान दृष्टिवाला होता है, क्योंकि उसकी दृष्टि हृदयस्थित आत्म-स्वरूप पर पड़ती है। ऐसे महापुरूष को परमगति में क्या मिला है और कैसे? इस पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं-
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रहा्र तस्माद्ब्रहा्रणि ते स्थिता:।।१९।।

उन पुरूषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। मन के समत्व का संसार जीतने से क्या सम्बन्ध? संसार मिट ही गया, तो वह पुरूष रहा कहाँ? श्रीकृष्ण कहते हैं, निर्दोषं हि समं ब्रहा्र वह ब्रहा्र निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया। तस्मात ब्रहा्रणि ते स्थिता: इसलिये वह ब्रहा्र में स्थित हो जाता है। इसी का नाम अपुनरावर्ती परमगति है। यह कब मिलती है? जब संसाररूपी शत्रु जीतने में आ जाय। संसार कब जीतने में आता है? जब मन का निरोध हो जाय, समत्व में प्रवेश पा जाय। जब वह ब्रहा्र मे स्थित हो जाता है ब्रहा्रविद् का लक्षण क्या है? उसकी रहनी स्पष्ट करते हैं-
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्म्रविद्ब्रहा्रणि स्थित:।।२०।।

उसका कोई प्रिय अप्रिय होता नहींं। इसलिये जिसे लोग प्रिय समझते हैं, उसे पाकर वह हर्षित नहीं होता और जिसे लोग अप्रिय समझते हैं, उसे पाकर वह उद्वेगवान् नहीं होता है। ऐसा स्थिरबुद्धि, असम्मूढ: संशयरहित, ब्रह्म्रवित ब्रहा्र से संयुक्त ब्रह्म्रवेत्ता ब्रह्म्रणि स्थित: परात्पर ब्रह्म में सदैव स्थित है।