पढ़े: यर्थाथ गीता के 5वें अध्याय के 07 से लेकर 10 तक श्लोक…

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योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।७।।
विजितात्मा विशेष रूप से जीता हुआ है शरीर जिसका जितेन्द्रिय जीती हुई हैं इन्द्रियाँ जिसकी और विशुद्धात्मा विशेष रूप से शुद्ध है अन्त:करण जिसका, ऐसा पुरूष सर्वभूतात्मभूतात्मा स पूर्ण भूतप्राणियों के आत्मा के मूल उद्गम परमात्मा से एकीभाव हुआ योग से युक्त है। वह कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता। तो करता क्यों है? पीछेवालों में परमक्लयाणकारीबीज का संग्रह करने के लिये। लिप्त क्यों नहीं होता? क्योंकि स पूर्ण प्राणियों का जो मूल उद्गम हे, जिसका नाम परमतत्व है उस तत्त्व में वह स्थित वह स्थित हो गया। आगे कोई वस्तु नहीं जिसकी शोध करे। पीछेवाली वस्तुएँ छोटी पड़ गयीं तो भला आसक्ति किसमें करे? इसलिये वह कर्मों से आवृत्त नहीं होता। यह योगयुक्त की पराकाष्ठा का चित्रण है। पुन: योगयुक्त पुरूष की रहनी स्पष्ट करते हैं कि वह करते हुए भी उससे लिप्त क्यों नहीं होता?

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यंशृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्रन्गच्छन्स्वपंश्वसन्।।८।।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।९।।

परमत्त्व परमात्मा को साक्षात्कारसहित जाननेवाले योगयुक्त पुरूष की यह मन: स्थिति अर्थात अनुभूति है कि मैं किंचित् मात्र भी कुछ नहीं करता हँू। यह उसकी कल्पना नहीं, बल्कि यह स्थिति उसने कर्म करके पायी है। यथा युक्तो मन्येत अब प्राप्ति के पश्चात वह सब कुछ देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता, सँूघता, भोजन करता, गमन करता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्याग करता, ग्रहण करता, आँखों को खोलता और मींचता हुआ भी इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरतती हैं – ऐसी धारणावाला होता है। परमात्मा से बढ़कर कुछ है ही नहीं और जब उसमें वह स्थित ही है तो उससे बढ़कर किस सुख की कामना से वह किसका दर्शन, स्पर्श इत्यादि करेगा? यदि कोई श्रेष्ठ वसतु आगे होती तो आसक्ति अवश्य रहती। किन्तु प्राप्ति के बाद अब और आगे जायेगा कहाँ और पीछे त्यागेगा क्या? इसलिये योगयुक्त पुरूष लिप्त नहीं होता। इसी को एक उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं-
ब्रहा्रण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य:।
लिप्यते न स पानेन पद्मपन्नमिवा भसा।।१०।।

कमल कीचड़ में होता है। उसका पत्ता पानी के ऊपर तैरता है। लहरें रात दिन उसके ऊपर से गुजरती हैं, किन्तु आप पत्ते को देखें, सूखा मिलेगा। जल की एक बँूद भी उस पर टिक नहीं पाती। कीचड़ और जल में रहते हुए भी वह उनसे लिप्त नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, जो पुरूष सब कर्मों को परमात्मा में विलय करके (साक्षात्कार के साथ ही कर्मों का विलय होता है, इससे पूर्व नहीं), आसक्ति को त्याग करके (अब आगे कोई वस्तु नहीं अत: आसक्ति नहीं रहती, इसलिये आसक्ति त्यागकर) कर्म करता है, वह भी इसी प्रकार लिप्त नहीं होता। फिर वह करता क्यों है? आपलोगों के लिये, समाज के कल्याण साधन के लिये, पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिये। इसी पर बल देते हैं…