पढ़े: यर्थाथ गीता के 5वें अध्याय के 01 से लेकर 06 तक श्लोक…

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अध्याय तीन में अर्जुन ने प्रश्र रखा कि- भगवन्! जब ज्ञानयोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो आप मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानयोग कुछ सरल प्रतीत हुआ लगता है, क्योंकि ज्ञानयोग में हारने पर देवत्व और विजय में महामहिम स्थिति, दोनों ही दशाओं में लाभ ही लाभ प्रतीत हुआ। अब तक अर्जुन ने भली प्रकार समझ लिया है कि दोनों ही मार्गों में कर्म तो करना ही पड़ेगा (योगेश्वर उसे संशयरहित होकर तत्वदर्शी महापुरूष की शरण लेेने के लिये भी प्रेरित करते हैं, क्योंकि समझने के लिये वही एक स्थान है।) अत: दोनों मार्गों में से एक चुनने से पूर्व उसने निवेदन किया-

अर्जन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।।

हे श्रीकृष्ण! आप कभी संन्यास-माध्यम से किये जानेवाले कर्म की और कभी निष्काम-दृष्टि से किये जानेवाले कर्म की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से एक, जो भली प्रकार आपका निश्चय किया हुआ हो, जो परमकल्याणकारी हो उसे मेरे लिये कहिये। कहीं जाने के लिये आपको दो मार्ग बताये जायँ तो आप सुविधाजनक मार्ग अवश्य पूछेंगे। यदि नहीं पूछते तो आप जानेवाले नहीं हैं। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा-
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

अर्जुन! संन्यास-माध्यम से किया जानेवाला कर्म अर्थात् ज्ञानमार्ग से किया जानेवाला कर्म और कर्मयोग: निष्काम भावना से किया जानेवाला कर्म – ये दोनों ही परमश्रेय को दिलानेवाले हैं, परन्तु इन दोनों मार्गों में संन्यास अथवा ज्ञानदृष्टि से किये जानेवाले कर्म की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है। प्रश्र स्वाभाविक है कि श्रेष्ठ क्यों है?
ज्ञेय: स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निद्र्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।३।।

महाबाहु अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की आकांक्षा करता है वह सदैव संन्यासी ही समझने योग्य है। चाहे वह ज्ञानमार्ग से या निष्काम कर्मयोग से ही क्यों न हो। राग, द्वैषादि द्वन्द्वों से रहित वह पुरूष सुखपूर्वक भवबन्धन से मुक्त हो जाता है।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

निष्काम कर्मयोग तथा ज्ञानयोग इन दोनों को वही अलग-अलग बताते हैं जिनकी समझ इस पथ में अभी बहुत हल्की है, न कि पूर्णज्ञाता पण्डित लोग, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरूष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। दोनों का फ एक है, इसलिये दोनों एक ही समान हैं।
यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।।

जहाँ सांख्य-दृष्टि से कर्म करनेवाला पहुँचता है, वहीं निष्काम-माध्यम से कर्म करने वाला भी पहँुचता है। इसलिये जो दोनों को फल की दृष्टि से एक देखता है, वही यथार्थ जाननेवाला है। जब दोनों एक ही स्थान पर पहँुचते हैं तो निष्काम कर्मयोग विशेष क्यों? श्रीकृष्ण बताते हैं-
सन्न्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत:।
योगयुक्तो मुनिब्र्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।६।।

अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना सन्न्यास: संन्यास अर्थात सर्वस्व का न्यास प्राप्त होना दु:खप्रद है। जब योग का आचरण प्रारम्भ ही नहीं किया तो असम्भव-सा है। इसलिये भगवत्स्वरूप का मनन करनेवाला मुनि, जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ मौन हैं, निष्काम कर्मयोग का आचरण करके परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
स्पष्ट है कि ज्ञानयोग से निष्काम कर्मयोग का ही आचरण करना पड़ेगा, क्योंकि क्रिया दोनों में एक ही है- वहीं यज्ञ की क्रिया, जिसका शुद्ध अर्थ है आराधना। दोनों मार्गों में अन्तर केवल कत्र्ता के दृष्टिकोण का है। एक अपनी शक्ति को समझकर हानि-लाभ देखते हुए इसी कर्म में प्रवृत्त होता है और दूसरा निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर इसी क्रिया में प्रवृत्त होता है। उदाहरणार्थ, एक प्राइवेट पढ़ता है दूसरा नॉमिनेट। दोनों का पाठयक्रम एक है, परीक्षा एक है, परीक्षक-निरीक्षक दोनों में एक ही है। ठीक इसी प्रकार दोनों के सद्गुरू तत्वदर्शी हैं और डिग्री एक ही है। केवल दोनों के पढऩे का दृष्टिकोण भिन्न है। हाँ, संस्थागत छात्र को सुविधाएँ अधिक रहती है।