Marudhar Desk: लंबी लड़ाई लड़ने के बाद अब देश का अन्नदाता घरों को लौटने लगा है। संघर्ष, जूनून, जज्बें और जमीन की इस लड़ाई में आखिरकार अन्नदाता ने फतेह कर ली है। संयुक्त किसान मोर्चा और सरकार के बीच पांच सूत्रीय मांग पत्र पर सहमति बनी जिसके बाद किसानों ने घर वापसी की राह पकड़ी। सभी के चेहरे खिले हैं, खुशी साफ तौर पर देखी जा सकती है। लेकिन इतनी बड़ी जीत के बाद भी न जान कितने परिवार ऐसे है जिनके चेहरों पर सिर्फ दर्द है, सिर्फ मायूसी है। अब किसी भी जीत के इनके लिए उतने मायने नही रह गए है जो इनके दर्द पर मरहम लगा सके। क्योंकि, ये वो परिवार हैं जिन्होने इस संघर्ष में अपनों को हमेशा के लिए खो दिया है। किसी का बुढ़ापे का सहारा छिन गया तो किसी के सर से साया उठ गया, तो किसी का जीवन भर साथ निभाने का वादा टूट गया। केंद्र सरकार भले ही हलधार की हठ के आगे झुक गई हो लेकिन उन परिवारों का क्या जिनके सीने में अपनों के जाने का दर्द है, लेकिन फिर भी सीने पर पत्थर रख के बैठे है। केंद्र सरकार ने भले ही तीनों विवादास्पद कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया हो और दोनों पक्षों के बीच की खींचतान कम होती दिख रही है, लेकिन पंजाब के दर्जनों परिवारों के लिए इस बात के अब कोई मायने नहीं रह गए हैं। ये वो परिवार हैं जिन्होंने किसान आंदोलन के दौरान अपनों को खोया है। ये वो परिवार हैं जिनके घर के सदस्य किसानों के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने तो गए, लेकिन अपने घर वापस ज़िंदा नहीं लौटे। इनमें से कई की कड़ाके की ठंड में सांसे रुक गई तो कई हादसों का शिकार हो गए। कई की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई तो कई ने हताश होकर खुद ही मौत को गले लगा लिया। इस आंदोलन में 700 से ज्यादा किसानों की मौत हुई है जिसमें 600 से ज्यादा पंजाब के किसान हैं। हालांकि, कृषि कानूनों की वापसी की खुशी सभी किसानों को है लेकिन पंजाब का गांव-गांव किसान आंदोलन के दौरान हुई इन मौतों के शोक में डूबा हुआ है। वहीं, हाल ही में केंद्र सरकार ने देश की संसद को ये बताया कि उसके पास दिल्ली और उसके आसपास हुए आंदोलनों के दौरान मारे गए किसानों की संख्या का कोई रिकॉर्ड नहीं है और इसलिए मारे गए लोगों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने का सवाल ही नहीं उठता। अब सवाल उठता है कि इन परिवारों का क्या होगा, क्या सरकार इनसे हाथ झाड़ लेगी या फिर इनको भी कोई आस, उम्मीद की किरण आने वाले समय में दिख सकती है ….