पढ़े: यर्थाथ गीता के षष्ठोऽध्याय: के 11 से लेकर 20 तक श्लोक

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शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन:।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।११।

शुद्व भूमि में कुश, मृगछाल अथवा इससे भी उत्तरोत्तर बिछाकर अपने आसन को न अति ऊँचा, न नीचा, स्थिर स्थापित करे। शुद्ध भूमि का तात्पर्य उसे झाडऩे-बुहारने, सफाई करने से है। जमीन पर कुछ बिछा लेना चाहिए- चाहे मृगछाल हो या चटाई अथवा कोई भी वस्त्र, तख्त जो भी उपलब्ध हो। आसन हिलने-डुलनेवाला न हो। न जमीन से बहुत ऊँचा हो और न एकदम नीचा। पूज्य महाराज जी लगभग पाँच इंच ऊँचे आसन पर बैठते थे। एक बार भाविकों ने लगभग एक फीट ऊँचा संगमरमर का एक तख्त मँगा दिया। महाराज जी एक दिन तो बैठे, फिर बोले- नहीं हो! ऊँचे नहीं बैठे के चाही साधू को, अभिमान होइ जावा करत है। नीचेहू न बैठे के चाही, हीनता आवत है, अपने से घृणा आवत है। बस, उसको उठवाया और जंगल में एक बगीचा था, वहाँ रखवा दिया। वहाँ न कभी महाराज जाते थे और न अब ही कोई जाता है। यह था उन महापुरूष का क्रियात्मक शिक्षण। इसी प्रकार साधक के लिये भी बहुत ऊँचा आसन नहीं होना चाहिये, नहीं तो भजनपूर्ति बाद में होगी, अहंकार पहले चढ़ बैठेगा। इसके पश्चात् –

तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय:।
उपविश्यासने युञ्जयाद्योगमात्मविशुद्धये।।१२।।

उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए अन्त:करण की शुद्धि के लिये योगाभ्यास करे। अब बैठने का तरीका बताते हैं-
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।१३।।

शरीर, गर्दन और सिर को सीधा, अचल-स्थिर करके दृढ़ होकर बैठ जाय और अपने नासिका के अग्रभाग को देखकर अन्य दिशाओं को न देखता हुआ स्थिर होकर बैठे और-
प्रशान्तात्मा विगतभीब्र्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन: संयम्य मगिात्तो युक्त आसीत मत्पर:।।१४।।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्राय: लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य हैं, किन्तु महापुरूषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का वास्तविक अर्थ है- ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी। ब्रह्म का आचरण है नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया, जिसे करनेवाले यान्ति ब्रह्म सनातनम् सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। इसे करते समय स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् – बाहर के स्पर्श, मन और सभी इन्द्रियों के स्पर्श बाहर ही त्यागकर चित्त को ब्रह्म-चिन्तन में, श्वास-प्रश्वास में, ध्यान में लगाना है। मन ब्रह्म में लगा है तो बाह्या स्मरण कौन करे? यदि बाह्या स्मरण होता है तो अभी मन लगा कहाँ? विकार शरीर में नहीं, मन की तरंगों में रहते हैं। मन ब्रह्माचरण में लगा है तो जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम तक स्वाभाविक हो जाता है। अत: ब्रह्म के आचरण में स्थित रहकर) भयरहित और अच्छी प्रकार शान्त अन्त:करणवाला मन को संयत रखते हुए, मुझमें लगे हुए चित्त से युक्त मेरे परायण होकर स्थित हो। ऐसा करने का परिणाम क्या होगा?-
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस:।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।१५।।

इस प्रकार अपने आपको निरन्तर उसी चिन्तन में लगाता हुआ संयत मनवाला योगी मेरे में स्थितिरूपी पराकाष्ठावाली शान्ति को प्राप्त होता है। इसलिये अपने को निरन्तर कर्म में लगाएँ। यहाँ यह प्रश्र पूर्णप्राय है। अगले दो श£ोकों में वे बताते हैं कि परमानन्दवाली शान्ति के लिये शारीरिक संयम, युक्ताहार-विहार भी आवश्यक हैं-
नात्यश्रतस्तु योगोडस्ति न चैकान्तमनश्रत:।
न चाति स्वप्रशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।16।।

अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खानेवाले का सिद्ध होता है, न अत्यन्त सोनेवाले का और न अत्यन्त जागनेवाले का ही सिद्ध होता है। तब किसका सिद्ध होता है?-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्रावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।17।।

दु:खों का नाश करनेवाला यह योग उचित आहार-विहार, कर्मो में उपयुक्त चेष्टा और संतुलित शयन-जागरण करनेवाले का ही पूर्ण होता है। अधिक भोजन करने से आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेरेंगे, तब साधना नहीं होगी। भोजन छोड़ देने से इन्द्रियाँ क्षीण हो जायेंगी, अचल-स्थिर बैठने की क्षमता नहीं रहेगी। पूज्य महाराज कहते थे कि खुराक से डेढ़-दो रोटी कम खाना चाहिये। विहार अर्थात् साधन के अनुकूल विचरण, कुछ परिश्रम भी करते रहना चाहिये। विहार अर्थात साधन के अनुकूल विचरण, कुछ परिश्रम भी करते रहना चाहिये, कोई कार्य ढूँढ़ लेना चाहिये अन्यथा रक्त संचार शिथिल पड़ जायेगा, रोग घेर लेंगे। आयु सोना और जागना, आहार और अभ्याय से घटता-बढ़ता है। महाराज जी कहते थे – योगी को चार घंटे सोना चाहिये और अनवरत चिन्तन में लगे रहना चाहिये। हठ करके न सोनेवाले शीघ्र पागल हो जाते हैं। कर्मों में उपयुक्त चेष्टा भी हो अर्थात नियत कर्म आराधना के अनुरूप निरन्तर प्रयत्नशील हो। बाह्य विषयों का स्मरण न कर सदैव उसी से लगे रहनेवाले का ही योग सिद्ध होता है। साथ ही-
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।।
नि: स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।18।।

इस प्रकार योग के अभ्यास से विशेष रूप से वश में किया हुआ चित्त जिस जिस काल में परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है, विलीन-सा हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हुआ पुरूष योगमुक्त कहा जाता है। अब विशेष जीते हुए चित्त के लक्षण क्या हैं?-
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन:।।19।।

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक चलायमान नहीं होता, लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता, यही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की दी गयी है। दीपक तो उदाहरण मात्र है। आजकल दीपक का प्रचलन शिथिल पड़ रहा है। अगरबत्ती ही जलाने पर धुआँ सीधे ऊपर जाता है, यदि वायु में वेग न हो। यह योगी के जीते हुए चित्त का एक उदाहरण मात्र है। अभी चित्त भले ही जीता गया है, निरोध हो गया है, किन्तु अभी चित्त है। जब निरूद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, तब कौन-सी विभूति मिलती है? देखें-
यत्रोपरमते चित्तं निरूद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।20।।

जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरूद्ध हुआ चित्त भी उपराम हो जाता है, विलीन हो जाता है, मिट जाता है, उस अवस्था में आत्मना अपने आत्मा के द्वारा आत्मानम् परमात्मा परमात्मा को देखता हुआ आत्मनि एवं – अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। देखता तो परमात्मा को है लेकिन सन्तुष्ट अपने ही आत्मा से होता है। क्योंकि प्राप्तिकाल में तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है, किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपने ही आत्मा को उन शाश्वत ईश्वरीय विभूतियों से ओतप्रोत पाता है। ब्रह्म अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है, तो इध्र आत्मा भी अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है। है तो, किन्तु अचिन्त्य भी है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह आपके उपभोग के लिये नहीं है। चित्त का निरोध और निरूद्ध चित्त के विलयकाल में परमात्मा का साक्षात्कार होता है और दर्शन के ठीक दूसरे क्षण उन्हीं ईश्वरीय गुणधर्मों से युक्त अपने ही आत्मा को पाता है, इसलिये वह अपने ही आत्मा में सन्तुष्ट होता है। यही उसका स्वरूप है। यही पराकाठा है। इसी का पूरक अगला श्लोक देखें…