…तो इस कारण हर वर्ष भगवान जगन्नाथ बहन सुभ्रदा और भाई बलराम के साथ निकलते है नगर भ्रमण, जानिए क्या है मान्यता!

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मरूधर बुलेटिन न्यूज डेस्क। कोरोना संकट के बीच आज भगवान जगन्नाथ रथयात्रा पर निकल गए है। जानकारी के अनुसार बता दें कि देश की सर्वोच्च अदालत की सोशल डिस्टेंसिंग समेत तमाम गाइडलाइन्स के बीच रथयात्रा निकल रही है। लेकिन क्या आप जानते हो भगवान जगन्नाथ और उनकी रथयात्रा के पीछे क्या रहस्य छुपा है। आइए जानिए…

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बता दें कि भगवान जगन्नाथ हर वर्ष नगर भ्रमण के लिए अपने रथ पर सवार होकर निकलते है। इस वर्ष भी उनकी यात्रा निकली रही है, लेकिन कोरोना संकट के बीच कुछ नियम जारी किए गए है। जिसके तहत अधिक भीड़ पर रोक लगाई गई है। बता दें कि पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है, जो भगवान जगन्नाथ यानी श्रीकृष्ण को समर्पित है। हिन्दू धर्म में जगन्नाथ रथ यात्रा का एक बहुत बड़ा महत्व है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। हर वर्ष होने वाले रथयात्रा में मंदिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलराम और बहन सुभद्रा तीनों, तीन अलग-अलग भव्य और सजे हुए रथों में बैठ कर नगर की यात्रा को निकलते हैं।

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हिन्दू धर्म में मान्यताओं के अनुसार रथ यात्रा को निकालकर भगवान जगन्नाथ को प्रसिद्ध गुंडिचा माता मंदिर पहुँचाया जाता हैं। यहां भगवान कुछ दिनों के लिए आराम करते है। खास तैयारियों के बीच इंद्रद्युमन सरोवर से जल लाया जाता हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की वापसी की यात्रा शुरु होती है। इस यात्रा में सबसे आगे भगवान बालभद्र का बीच में बहन सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ रहता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से इस यात्रा में शामिल होता है और रथ का धक्का लगाता है तो उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसके अलावा जानकारी के अनुसार इस रथयात्रा का इतिहास ये बताता है कि एक दिन बहन सुभद्रा ने भ्राता जगन्नाथ से नगर देखने के साथ द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की तब प्रभू जगन्नाथ ने बहन की ईच्छा पूरे करते हुए रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। जिसके बाद से यहाँ हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं। इसके अलावा पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक ओर खास बात बता दें कि यहां भगवान जगन्नाथ के लिए 752 चूल्हों पर खाना बनता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई का दर्जा हासिल है। रथयात्रा के दौरान यहां के चूल्हे ठंडे हो जाते हैं। इस दौरान गुंडिचा मंदिर की रसोई में भगवान जगन्नाथ के लिए खाना बनता है।