Marudhar Desk: कोरोना काल में अचानक लॉकडाउन लगाकर लाखों मजदूरों को मझदार में छोड़ने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान मजदूरों के साथ बैठकर भोजन कर रहे थे। इससे पहले पीएम मोदी ने काशी विश्वनाथ धाम परियोजना के काम में लगे मजदूरों पर उनके कार्य के लिए आभार व्यक्त करने के लिए गुलाब की पंखुड़िया बरसाई। ये दो अलग-अलग तस्वीरें दो साल के अंतराल में देखने को मिली है। लेकिन एक तस्वीर बयां करती है इन मजदूरों का दर्द, जब मजदूर मजबूर था और राजा नमस्ते ट्रम्प कार्यक्रम में व्यस्त था। एक तस्वीर अब की है जब चुनाव सिर पर है, तब राजा को मजदूरों की याद आई है और इतना ही नही खाने की पंगत होने के बावजूद भी फकीरी नज़र आई है।भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को सामने आया। इसके बाद 26 मार्च तक यह संख्या 700 पहुंच चुकी थी जबकि 16 की मौत हो चुकी थी। इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे वैश्विक महामारी घोषित कर चुका था। मोदी सरकार ने 25 मार्च से 14 अप्रैल तक देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया। जैसा कि स्पष्ट था कि पहले से ही लॉकडाउन का फैसला कुछ राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर ले चुकी थीं। इसी के बाद मोदी सरकार द्वारा केंद्रीय स्तर पर लॉकडाउन का फैसला लिया गया। सभी ने देखा, 22 मार्च के एक दिन के ‘जनता कर्फ्यू’ को मोदी, भाजपा व मोदी भक्तों ने किस तरह जश्न के माहौल में बदल दिया था। तब, एक तरफ ‘जनता कर्फ्यू’ के जरिये लोगों को घरों में रहने व फिर शाम को ‘थाली, ताली या घन्टी’ बजाकर उन लोगों को ‘सम्मान’ देने की बात की गई, जो डॉक्टर व नर्स मास्क, ग्लव्स व अन्य निजी सुरक्षा उपकरणों की घोर कमी की स्थिति में इस वक्त इलाज कर रहे हैं। इस महामारी के दौर में कई ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिन्हें देखकर दिल मुंह को आ गया। एक ऐसी ही तस्वीर थी जब मजदूर मजबूर था और मजबूरी में अपने काम-धंधे छोड़कर घरों की तरफ बढ रहा था। खाली हाथ, मायूस चेहरे, निराशा, खाली पेट और मीलों की दूरी …. न रहने को कोई ठिकाना, न वापिस घरों को लौटने के लिए कोई साधन, बस एक आस, एक उम्मीद..मन में लिए पैदल ही चल दिए। इस दौरान न जाने कितने मजदूरों की पैदल चलते हुए तो कितनों की भूख से तो न जाने कितने मजदूरों की जान हादसों में चली गई। कोरोना की पहली लहर में जब लॉकडाउन लगा उस समय किसी को कुछ समझ नही आ रहा था क्या करें..क्या नहीं। काम धंधों पर ताले लटक गए थे, खाने के लाले पडने लगे तो मजदूर मजबूरन पलायन करने लगा। उस समय मोदी सरकार को इन मजदूरों की याद नही आई, सड़कों पर गिरती इनकी लाशें मोदी सरकार को नही दिखाई दी। इस अयोजनाबद्ध व यकायक हुए लॉकडाउन की घोषणा में साफ था कि मजदूर-मेहनतकश जनता को ही इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। भारत में कुल कामगार आबादी की 20 प्रतिशत आबादी प्रवासी श्रमिकों की है। विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश आदि से अन्य राज्यों में दिहाड़ी करने वाले ये मजदूर, इस लॉकडाउन की स्थिति में सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों को पैदल जाते देखे गए। इनके सामने भुखमरी का संकट पैदा हो गया। इसीलिए कई, यह भी कहते हुए देखे गए कि इससे पहले उन्हें कोरोना मारे, भूख उन्हें पहले खत्म कर देगी। वहीं दूसरी ओर शहरों में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों, रोज कमाने व खाने वाले लोगों के लिए भी यह लॉकडाउन भयानक विपदा साबित हुआ। जब मजदूर पैदल चलते दम तोड़ रहे थे, तब देश के मुखिया राजा सत्ता संभालने में व्यस्त थे। इन दो अलग अलग तस्वीरों को देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि सत्ता के लिए श्रमिकों के साथ बैठकर भोजन करने वाले प्रधानमंत्री संकट के समय इन्हीं मजदूरों को दो जून की रोटी के लिए तरसने को मजबूर कर दिया था।