मां की मजबूरी संक्रमण के बीच खेलता रहा बचपन कोरोना महामारी के भारत में प्रवेश करते हैं न जाने कितने परिवार उजड़ गए. ऐसा ही जख्म मिला नेपाल के एक गरीब परिवार को. अंदर तक झकझोर कर रख देने वाली यह घटना है  राजधानी जयपुर के जोबनेर की. एकढाबे पर काम करने वाले नेपाल के एक मामूली आदमी पर जब कोरोना जैसी महंगी बीमारी का हमला हुआ तब उसका हंसता खेलता परिवार जिसमें पति पत्नी और तीन छोटे बच्चे थे उसकी चपेट में आ गए. जब परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य की तबीयत बिगड़ी तब उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से बाद में और हालत बिगड़ने पर उसे जयपुर रैफर कर दिया गया. ऐसे में घर में अकेले रह गए तीन छोटे मासूम जिनकी देखभाल के लिए कोई नहीं बचा क्योंकि उनकी मजबूर मां अस्पताल में उनके पिता के साथ थी. इस समय जब जान पहचान वालों, ढाबे के मालिक वह मकान मालिक ने उनसे किनारा कर लिया था तब इस परिवार का मसीहा बनकर आए जयपुर के भामाशाह. जानकारी के मुताबिक जब जोबनेर व्यापार मंडल अध्यक्ष अमित जैन, जैन मंदिर अध्यक्ष मानक चंद जैन, पार्षद गौरव जैन और समाजसेवी सुभाष कुमावत को यह खबर पता चली तब उनका मन विचलित हो गया और उन्होंने अपने स्तर पर जयपुर अस्पताल में भर्ती कराया, हाथ खर्च के लिए आर्थिक मदद भी की.

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लेकिन सबसे बड़ी चुनौती से निपटना अभी बाकी था. भामाशाह ने बीमार पिता को उपचार के लिए अस्पताल में बेड तो मुहैया करा दिया, आर्थिक सहयोग भी दे दिया, परंतु उन तीनों मासूमों की मजबूर मां अपने पति की देखरेख के लिए अस्पताल में चली गई. आर यू एच एस के प्रांगण में कोरोना मरीजों के बीच तीन मासूमों को जिसने भी खेलता देखा उसका मन कई तरह के सवालों से भर गया

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जोबनेर के यह दयावान फिर दौड़े और बच्चों की देखभाल के लिए पहले उनके पड़ोसियों से गुहार लगाई फिर ढाबा मालिक से विनती की लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ, लंबी भागदौड़ के बाद आखिर तीनों बच्चों को जयपुर गांधीनगर शिशु ग्रह में भिजवाया गया. धन्य है ऐसे समाजसेवी जिनके कारण आज भी मानवता जिंदा है