आशा सहयोगिनीयों ने अपनी मांगों को लेकर विधायक रामलाल शर्मा को सौपा ज्ञापन

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मरूधर बुलेटिन न्यूज डेस्क। प्रदेश में आशा सहयोगिनी अपनी मांगों को लेकर लगातार धरना प्रदर्शन कर रही हैं। चौमू में गोविंदगढ़ ब्लाक की आशा सहयोगिनीयों ने अपनी मांगों को लेकर चौमूं विधायक कार्यालय पहुंची। जहां विधायक रामलाल शर्मा को अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा। आशा सहयोगिनियो ने अपनी तीन मांगों को लेकर विधायक को ज्ञापन सौंपा। तो वही विधायक रामलाल शर्मा ने भी सरकार पर संवेदनहीन होने का आरोप लगाया है। विधायक ने कहा कि सरकार का संवेदनशील और जबाबदेह होने का दावा करती है, लेकिन यह दावा फेल होता नजर आ रहा है। जिस तरह से आशा सहयोगिनी को सरकार ना तो कोई जवाब दे रही है और ना ही संवेदनशीलता का परिचय दे रही है। अब सरकार अपनी हठधर्मिता पर अड़ी है। आशा सहयोगिनीयों पर जबरन नौकरी ज्वाइन कराने का दबाव बनाया जा रहा है, तो वही नौकरी से हटाने का डर दिखाकर मानसिक प्रताडऩा देने का काम सरकार कर रही है। सरकार को आशा सहयोगिनी के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है। विधायक रामलाल शर्मा ने भी सरकार से मांग की है कि आशा सहयोगीनीयों की मांगों पर सरकार को विचार करना चाहिए। वहीं उपखंड़ में औचिक निरीक्षण पर पहुंचे जयपुर जिला कलेक्टर से भी आशा सहयोगिनी की एक टीम ने उपखण्ड कार्यालय पर मुलाकात की और अपनी पीड़ा बताते हुए ज्ञापन सौंपा। वहीं जिला कलेक्टर नेहरा ने आशा सहयोगिनियों को आश्वस्त करते हुए पुन: काम पर लौटने की बात कही है। अब ऐसे में देखना यह होगा कि विधायक रामलाल शर्मा व जिला कलेक्टर नेहरा आशा सहयोगिनियों के मामले को लेकर सरकार को मनवाने में कामयाब होते हैं या फिर आशा सहयोगिनियों की पीड़ा सरकार नजर अंदाज कर देंगी।

महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकार की नजर में आशा सहयोगिनी नकारा कैसे….
जनता मंच पर योजनाओं की सौगात देना, जरूरत पडऩे पर विपक्ष की बातें करना एक नेता को शोभा देता है। लेकिन बात जब स्वाभिमान से जीने की या फिर बात परिवार के लालन पालन की हो और राज्य का मुखिया जनता को आंख दिखाएं तो वह फिर सरकार आमजन की ना होकर खुद कर्ज सरकार कहलाती है। महज ढाई हजार रुपए की पगार में पूरे महिने काम करने वाली महिला जब अपनी ही सरकार से वेतन बढ़ाने की मांग करे और अनसुनी होने पर विरोध करे तो उसे सता के उपयोग में बंधी बना लेना उस आजादी की तोहिन है, जिस आजादी के लिए हजारों क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है। मंच पर महिला सशक्तिकरण की बातें करना और धरातल पर उन्हें उत्पीडऩ देना, सरकार की दोहरी नीति को दर्शाता है। सरकार को चाहिए कि उनकी मांग सुनते हुए कम से कम आश्वासन देते हुए उस पर कार्य करे। सब को ज्ञात है कि ऐशो आराम से जिंदगी बिताने वाले जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तों की चिंता पर सरकार ने बिना कहे सुनवाई कर ली और दिहाड़ी मजदूरी से भी आधी तनख्वाह पर काम करने वाली आशा सहयोगिनियों सरकार को नकारा नजर आ रही है।