लापरवाही कहीं बन जाये ना हार का सबब: डॉ घनश्याम व्यास

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मरूधर बुलेटिन न्यूज डेस्क। कोरोना का संक्रमण गहराता जा रहा है। प्रतिदिन नये पाॅजिटिव केशेज बढते जा रहे हैं। गंभीर केशेज का स्पष्ट उपचार नहीं वैक्सीन कब तक आम जनता तक पहुंचेगी पता नहीं। ऐसे में सावधानी और बचाव रखना ही महत्वपूर्ण कदम है। बाजार, सार्वजनिक स्थानों व वाहनों में यात्रा कम से कम करनी चाहिए। साथ ही परिस्थितियों वश जाना पड़े तो सावधानियां रखनी हैं। लोकडाउन हटने के बाद केशेज बढ़ना परिचायक है कि कहीं न कहीं हम असावधान होते जा रहे हैं। स्पष्ट है कि लोकडाउन स्थाई हल नहीं है और ना ही निरंतर रखा जा सकता है। अकस्मात उत्पन्न होने वाले खतरे को टालने के लिए आवश्यक कदम था। लोकडाउन के समय में देश ने बहुत कुछ खोया है। विकास रूक गया। लोगों के रोजगार छिन गये और लम्बा चलता तो हम बहुत अधिक पिछड़ जाते। लोकडाउन लगाना भी मजबूरी थी। तो लोकडाउन हटाना आवश्यकता। हमने लोकडाउन हटाने को खतरा कम होना समझ लिया। जबकि ऐसा है नहीं। लोकडाउन हटने के बाद सावधानी अधिक रखने की आवश्यकता है। जब सरकारी प्रतिबंध हट गया तो हमारी, आम जनता की जिम्मेदारी बन जाती है। अपने स्तर पर व्याधि के प्रसार को रोकना। समस्त नागरिक अपने नागरिक धर्म का पालन करें। सावधानी रखें तो निश्चित तौर पर संक्रमण रूक सकता है। लेकिन हो रहा है इसके विपरीत, बाजार, सार्वजनिक स्थानों पर वैसे ही लोग इकट्ठे होते हैं और तो और धरना प्रदर्शन, सामूहिक ज्ञापन आदि कार्यक्रम भी होने लगे हैं। ऐसे में प्रशासन भी करे तो क्या करे। संविधान प्रदत्त अधिकारों को रोक भी नहीं सकता। सारांश है कि यह तो हमारा ही दायित्व बन जाता है कि इन स्थितियों से परहेज करें। प्रशासन की दिक्कतें भी नहीं बढें और जनजीवन प्रभावित भी नहीं हो। जितना हमारे वश में है। इस संक्रमण से बचें और दूसरों को बचायें। एक उदाहरण लेते हैं। होस्पिटल का, होस्पिटल स्थान ऐसा है, जहां जाना मजबूरी बन जाता है, जाना ही पड़ता है। जहां भीड़ भाड़ मिलनी संभावित है। यद्यपि बीमारी पर किसी का वश नहीं, कभी भी किसी को भी हो सकती है। परंतु कुछ अवांछित परिस्थितियां टाली जा सकती है। जिससे होस्पिटल जाना ही नहीं पङे। इसके लिए कुछ एहतियात रख सकते हैं। इन दूसरी जोखिमों के प्रति लापरवाह होंगे तो बीमारियों के इलाज के लिए होस्पिटल जाना पङेगा और होस्पिटल की भीड़ में संक्रमण का खतरा तो है ही। अर्थात जिस संक्रमण से अति सावधानी बरतने की जरूरत हैं, स्वास्थ्य से जुड़े तथ्यों का ध्यान नहीं रखने पर उसी संक्रमण के संपर्क का माध्यम उत्पन्न हो सकता है। परिस्थितियों को हल्के में नहीं लें। जरूरत है स्वास्थ्य की जोखिमों को समझने की। ऐसे संकट काल में यदि डेंगू जैसी बिमारियां हमारी नजर अंदाजी और एहतियात नहीं बरतने के कारण होती हैं। तो एक तरफ उसका उपचार करवाना दुष्कर हो जाता है। वहीं यदि किसी को दोनों संक्रमण एक साथ हो तो जीवन पर संकट आ जाता है। हमारी लापरवाही, असावधानी और गंभीर स्थितियां उत्पन्न कर सकती है। ऐसा नहीं हो कि इनका बङा प्रभाव हो और जीत की तरफ बढती हुई बाजी हार जायें।