पढ़े: यर्थाथ गीता के दूसरे अध्याय के 71 से 72 तक श्लोक…

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विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि: स्पृह:।
निर्ममो निरहड्कार: स शान्तिमधिगच्छति।।71।।

जो पुरूष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ‘निर्मम:’ मैं और मेरे के भाव तथा अहंकार और स्पृहा से रहित हुआ बरतता है, वह उस परमशान्ति को प्राप्त होता है जिसके बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।

एषा ब्राहा्ी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्त विमुहा्रति।
स्थित्वास्यामन्तकालेडपि ब्राह्मनिर्वाणमृच्छति।।72।।

पार्थ! उपर्युक्त् स्थिति ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरूष की स्थिति है। समुद्रवत् उन महापुरूष में विषम नदियों की तरह समा जाते हैं। वे पूर्ण संयमी और प्रत्यक्षत: परमात्मदर्शी हैं। केवल ‘अहं ब्रह्मास्मि’ पढ़ लेने या रट लेने से यह स्थिति नहीं मिलती। साधन करके ही इस ब्रह्मा की स्थिति को पाया जाता है। ऐसा महापुरूष ब्रह्मानिष्ठा में स्थित रहते हुए शरीर के अन्तकाल में भी ब्रह्मानन्द को ही प्राप्त होता है।

निष्कर्ष : प्राय: कुछ लोग कहते हैं कि दूसरे अध्याय में गीता पूर्ण हो गयी; किन्तु यदि केवल कर्म का नाम मात्र लेने से कर्म पूरा हो जाता है, तब तो गीता का समापन माना जा सकता है। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यही बताया कि — अर्जुन! निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिसे जानकर तू संसार बन्धन से छूट जायेगा। कर्म करने में तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। निरन्तर करने के लिये तत्पर हो जा। इसके परिणाम में तू ‘परं दृष्टवा’ परमपुरूष का दर्शन कर स्थितिप्रज्ञ बनेगा, परमशान्ति पायेगा। किन्तु यह नहीं बताया कि ‘कर्म’ है क्या?

यह ‘सांख्ययोग’ नामक अध्याय नहीं है। यह नाम शास्त्रकार का नहीं, अपितु टीकाकारों की देन है। वे अपनी बुद्धि के अनुसार ही ग्रहण करते हैं तो आश्चर्य क्या है? इस अध्याय में कर्म की गरिमा, उसे करने में बरती जानेवाली सावधानी और स्थि​तप्रज्ञ के लक्षण बताकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में कर्म के प्रति उत्कण्ठा जागृत की है, उसे कुछ प्रश्न दिये हैं। आत्मा शाश्वत है, सनातन है, उसे जानकार तत्वदर्शी बनो। उसकी प्राप्ति के दो साधन हैं — ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग।

अपनी शक्ति को समझकर, हानि लाभ का स्वयं निर्णय लेकर कर्म में प्रवृत्त होना ज्ञानमार्ग है तथा इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ उसी कर्म में प्रवृत्त होना निष्काम कर्ममार्ग या भक्तिमार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास ने दोनों का चित्रण इस प्रकार किया है —

मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।
जनहि मोर बल निज बल ताहि। दुहु कहॅं काम क्रोध रिपु आही।।

मेरे दो प्रकार के भजनेवाले हैं— एक ज्ञानमार्गी, दूसरा भक्तिमार्गी। निष्काम कर्ममार्गी या भक्तिमार्गी शरणागत होकर मेरा आश्रम लेकर चलता है। ज्ञानयोगी अपनी शक्ति सामने रखकर, अपने हानि लाभ का विचार कर अपने भरोसे चलता है, जबकि दोनों के शत्रु एक ही हैं। ज्ञानमार्गी को काम, क्रोधादि शत्रुओं पर विजय पाना है और निष्काम कर्मयोगी को भी इन्हीं से युद्ध करना है। कामनाओं का त्याग दोनों करते हैं और दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म भी एक ही है। ‘इस कर्म के परिणाम में परमशान्ति को प्राप्त हो जाओगे।’ लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म है क्या? अब आपके भी समक्ष ‘कर्म’ एक प्रश्न है। अर्जुन के मन में भी कर्म के प्रति जिज्ञासा हुई। तीसरे अध्याय के आरम्भ में ही उसने कर्मविषयक प्रश्न प्रस्तुत किया। अत:—

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम द्वितीयोडध्याय:।।2।।

इस प्रकार श्रीमद्भगवदगीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘कर्म जिज्ञासा’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण होता है।

इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीताया: ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम द्वितीयोडध्याय:।।2।।

इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘कर्म जिज्ञासा’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण होता है।