पढ़े: यर्थाथ गीता के दूसरे अध्याय के 51 से 60 तक श्लोक…

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कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण:।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम्।।51।।


बुद्धियोग से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्म और मृत्यु के बन्धन से छूट जाते हैं। वे निर्दोष अमृतमय परमपद को प्राप्त होते हैं।

यहां तीन बुद्धियों का चित्रण है। सांख्य बुद्धि में दो फल हैं— स्वर्ग और श्रेय कर्मयोग में प्रवृत्त बुद्धि का एक ही फल है। जन्म मृत्यु से मुक्ति, निर्मल अविनाशी पद की प्राप्ति। बस ये दो ही योगक्रिया हैं। इसके अतिरिक्त बुद्धि अविवेकजन्य है, अनन्त शाखाओंवाली है, जिसका फल कर्मभोग के लिये बारम्बार जन्म मृत्यु है।
अर्जुन की दृष्टि त्रिलोकी के साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन तक ही सीमित थी। इतने त​क के लिये भी वह युद्ध में प्रवृत्त नहीं हो रहा था। यहां श्रीकृष्ण उसे नवीन तथ्य उद्घाटित करते हैं कि आसक्तिरहित कर्म द्वारा अनामय पद प्राप्त होता है। निष्काम कर्मयोग परमपद को दिलाता है, जहां मृत्यु का प्रवेश नहीं है। इस कर्म में प्रवृत्ति कब होगी?

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिव्र्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।52।।


जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को पूर्णत: पार कर लेगी, लेशमात्र भी मोह न रह जाय— न पुत्र में, न धन में, न प्रतिष्ठा में— इन सबसे लगाव टूट जायेगा, उस समय जो सुनने योग्य है उसे तू सुन सकेगा और सुने हुए के अनुसार वैराग्य को प्राप्त हो सकेगा अर्थात उसे आचरण में ढाल सकेगा। अभी तो जो सुनने लायक है, उसे न तो तू सुन पाया है और आचरण का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। इसी योग्यता पर पुन: प्रकाश डालते हैं—

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।53।।


अनेक प्रकार के वेदवाक्यों को सुनकर विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मस्वरूप में समाधिस्थ होकर अचल स्थिर ठहर जायेगा, तब तू समत्व योग को प्राप्त होगा। पूर्ण सम स्थिति को प्राप्त करेगा, जिसे ‘अनामय परमपद’ कहते हैं। यही योग की पराकाष्ठा है और यही अप्राप्य की प्राप्ति है। वेदों से तो शिक्षा ही मिलती है; किन्तु श्रीकृष्ण कहते है, ‘श्रु​तिविप्रतिपन्ना’ श्रुतियों के अनेक सिद्धान्तों को सुनने से बुद्धि विचलित हो जाती है। सिद्धान्त तो अनेको सुने, लेकिन जो सुनने योग्य है लोग उससे दूर ही रहते हैं।

यह विचलित बुद्धि जिस समय समाधि में स्थिर हो जायेगी, तब तू योग की पराकाष्ठा अमृत पद को प्राप्त करेगा। इस पर अर्जुन की उत्कण्ठा स्वाभाविक है कि वे महापुरूष कैसे होते हैं जो अनामय परमपद में स्थित हैं, समाधि में जिनकी बुद्धि स्थिर है, उसने प्रश्न किया—

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केवल।
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।54।।


‘समाधीयते चित्तं यस्मिन् स आत्मा एव समाधि:’ जिससे चित्त का समाधान किया जाय, वह आत्मा ही समाधि है। अनादि तत्तव में जो समत्व प्राप्त कर ले, उसे समाधिस्थ कहते हैं। अर्जुन ने पूछा — केशव! समाधिस्थ स्थिरबुद्धिवाले महापुरूष के क्या लक्षण हैं? स्थितप्रज्ञ पुरूष कैसे बोलता है? वह कैसे बैठता है? वह कैसे चलता है? चार प्रश्न अर्जुन ने किये। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए कहा—

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थि​तप्रज्ञस्तदोच्यते।।55।।


पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है, तब वह आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट हुआ स्थिरबुद्धिवाला कहा जाता है। कामानाओं के त्याग पर ही आत्मा का दिग्दर्शन होता है। ऐसा आत्माराम, आत्मतृप्त महापुरूष ही स्थितप्रज्ञ है।

दु:खष्वनुद्विग्रमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतराभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरूच्यते।।56।।


दैहिक, दैविक तथा भौतिक दु:खों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर हो गयी है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुंचा हुआ मुनि स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। उसके अन्य लक्षण बताते हैं—

य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।57।।


जो पुरूष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त होकर न तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। शुभ वह है जो परमात्मस्वरूप में लगाता है, अशुभ वह है जो प्रकृति की ओर ले जानेवाला होता है। स्थितिप्रज्ञ पुरूष अनुकूल परिस्थितियों से न प्रसन्न होता है और न प्रतिकूल परिस्थितियों से द्वेष करता है; क्योंकि प्रा​प्त होने योग्य वस्तु न उससे भिन्न है और न पतित करनेवाले विकार ही उसके लिय हैं अर्थात अब साधन से उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं रहा।

यदा संहरते चायं कूर्मोडग्डानीव सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।58।।


जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, ठीक वैसे ही यह पुरूष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है। खतरे को देखते ही कछुआ जिस प्रकार अपने सिर और पैर समेट लेता है, ठीक इसी प्रकार जो पुरूष विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर हृदय देश में निरोध कर लेता है, उस काल में उस पुरूष की बुद्धि स्थिर होती है। किन्तु यह तो एक दृष्टान्त मात्र है। खतरे का एहसास मिटते ही कछुआ तो अपने अंगों को पुन: फैला देता है, क्या इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ महापुरूष भी विषयों में रस लेने लगता है? इस पर कहते हैं—

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।
रसवर्जं रसोडप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।5
9।।


इन्दियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करनेवाले पुरूषों के विषय तो निवृत हो जाते हैं। क्योंकि वे ग्रहण ही नहीं करते, किन्तु उनका राग निवृत्त नहीं होता, आसक्ति लगी रहती है। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से समेटनेवाले निष्कामकर्मी का राग भी ‘परं दृष्ट्वा’— परमतत्व परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाता है।
महापुरूष कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों में नहीं फैलाता। एक बार जब इन्द्रियां सिमट गयीं तो संस्कार ही मिट जाते हैं; पुन: वे नहीं निकलते। निष्काम कर्मयोग के आचरण द्वारा परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ उस पुरूष का विषयों से राग भी निवृत्त हो जाता है। प्राय: चिन्तन पथ हठ करते हैं। हठ से इन्द्रियों को रोककर वे विषय से तो निवृत्त हो जाते हैं। किन्तु मन में उनका चिन्तन, राग लगा रहता है। यह आसक्ति ‘परं दृष्ट्वा’ परमात्मा का साक्षात्कार करने के बाद ही निवृत्त होती हैं, इसके पूर्व नहीं।

‘पूज्य महाराज जी’ इस सम्बन्ध में अपनी एक घटना बताया करते थे। गृहत्याग से पूर्व उन्हें तीन बार आकाशवाणी हुई थी। हमने पूछा — ‘महाराज जी! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, हम लोगों को तो नहीं हुई?’ तब इस पर महाराज जी ने कहा— ‘हो! ई शंका मोहूं के भई रही।’ अर्थात यह सन्देश मुझे भी हुआ था। तब अनुभव में आया कि मैं सात जन्म से लगातार साधु हूं। चार जन्म तो केवल साधुओं सा वेश बनाये, तिलक लगाये, कहीं विभूति पोते, कहीं कमण्डल लिये विचरण कर रहा हूं। योगक्रिया की ​जानकारी नहीं थी। लेकिन पिछले तीन जन्म से बढ़िया साधु हूं, जैसा होना चाहिये। मुझमें योगक्रिया जागृत थी। पिदले जन्म में पार लग चला था, निवृत्ति हो चली थी; किनतु दो इच्छाएं रह गयी थीं— एक स्त्री और दूसरी गांजा। अन्तर्मन में इच्छाएं थीं, किन्तु बाहर से हमने शरीर को दृढ़ रखा। मन में वासना लगी थी इसलिये जन्म लेना पड़ा। जन्म लेते ही भगवान ने थोड़े ही समय में सब दिखा सुनाकर निवृत्ति दिला दी, तो तीन चटकना दिया और साधु बना दिया।

ठीक यही बात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करने वाले पुरूष का साक्षात्कार कर लेने पर वह विषयों के राग से भी निवृत्त हो जाता है। अत: जब तक साक्षात्कार न हो, कर्म करना है।

उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभू पद प्रीति सरित सो बही।।
इन्दियों को विषयों से समेटना कठिन है। इस पर प्रकाश डालते हैं—

यततो ह्रापि कौन्तेय पुरूषस्य विपश्चित:।
इन्द्रियाणि प्रमा​थीनि हरन्ति प्रसभं मन:।।60।।


कौन्तेय! प्रयत्न करनेवाले मेधावी पुरूष की प्रमथनशील इन्द्रियां उसके मन को बलात् हर लेती हैं, विचलित कर देती हैं। इसलिये…