पढ़े: यर्थाथ गीता के दूसरे अध्याय के 41 से 50 तक श्लोक…

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व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन।
बहुशाखा हाृनन्ताश्च बुद्धयोडव्यवसायिनाम्।।41।।

अर्जुन! इस निष्काम कर्मयोग में क्रियात्मिका बुद्धि एक ही है। क्रिया एक है और परिणाम एक ही है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्​पत्ति है। इस सम्पत्ति को प्रकृति के द्वन्द्व से शनै: शनै: अर्जित करना व्यवसाय है। यह व्यवसाय अथवा निश्चयात्मक क्रिया भी एक ही है। तब तो जो लोग बहुत सी क्रियाएं बताते हैं, क्या वे भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं — “हॉं, वे भजन नहीं करते। उन पुरूषों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं।”

या​मिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित:।
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:।।42।।

कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।43।।

पार्थ! वे “कामात्मान:” कामनओं से युक्त, “वेदवादरता:” वेद के वाक्यों में अनुरक्त, “स्वर्गपरा:” स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं कि इससे आगे कुछ है ही नहीं—ऐसा कहनेवाले अविवेकीजन जन्म मृत्युरूपी फल देनेवाली एवं भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत सी क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी में व्यक्त भी करते हैं अर्थात अविवेकियों की बुद्धि अनन्त भेदोंवाली होती है। वे फलवाले वाक्य में अनुरक्त रहते हैं, वेद के वाक्यों को ही प्रमाण मानते हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं। उनकी बुद्धि बहुत सी भेदोंवाली है, इसलिये अनन्त क्रियाओं की रचना कर लेते हैं। वे नाम तो परमतत्व परमात्मा का ही लेते हैं; किनतु उसकी ओट में अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। तो क्या अनन्त क्रियाएं कर्म नहीं हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं — नहीं, अनन्त क्रियाएं कर्म नहीं हैं। तो वह एक निश्चित क्रिया है क्या? श्रीकृष्ण अभी यह नहीं बताते। अभी तो केवल इतना कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे केवल विस्तार ही नहीं करते अपितु आलंकारिक शैली में उसे व्यक्त भी करते हैं। उसका प्रभाव क्या होता है?

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते।।44।।

उनकी वाणी की छाप जिन जिन के चित्त पर पड़ जाती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। उस वाणी द्वारा हरे हुए चित्तवालों के और भोग ऐश्वर्य में आसक्तिवाले पुरूषों के अन्त:करण में क्रियात्मिका बुद्धि नहीं रह जाती। इष्ट में समाधिस्थ करनेवाली निश्चयात्मक क्रिया उनमें नहीं होती।

ऐसे अविवेकियों की वाणी सुनता कौन है? भोग और ऐश्वर्य में आसक्तिवाले ही सुनते हैं, अधिकारी नहीं सुनता। ऐसे पुरूषों में सम और आदितत्व में प्रवेश दिलानेवाली निश्चयात्मक क्रिया से संयुक्त बुद्धि नहीं होती।

प्रश्न उठता है कि “वेदवादरता:” जो वेद के वचनों में अनुश्रक् है, क्या वे भी भूल करते है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं —

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निद्र्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।45।।

अर्जुल! “त्रैगुण्यविषया वेदा:” वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते हैं। इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। इसलिये “निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।” अर्जुन! तू तीनों गुणों से उपर उठ अर्थात वेदों के कार्यक्षेत्र से आगे बढ़। कैसे बढ़ा जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं — “निद्र्वन्द्व:” सुख दुख के द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्य वस्तु में स्थित ओर योगक्षेम को न चाहता हुआ आत्मपरायण हो। इस प्रकार उपर उठ। प्रश्न उठता है कि हम ही उठें या कोई वेदों से उपर उठा भी है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि आगे जो भी उठता है, ब्रह्रा हो जानता है और जो ब्रहा्र को जानता है, वह विप्र है।

यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेशु ब्राह्राणस्य विजानत:।।46।।

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय से जितना प्रयोजन रहता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रहता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदों से उपर उठता है वह ब्रह्म को जानता है, वही ब्राह्मण है। अर्थात तू वेदों से उपर उठ, ब्राह्मण बन।

अर्जुन क्षत्रिय था, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्राह्मण बन। ब्राह्मण, क्ष​त्रिय इत्यादि वर्ण स्वभाव की क्षमताओं के नाम हैं। यह कर्मप्रधान है, न कि जन्म से निर्धारित होनेवाली कोई ​रूढ़ि। जिसे गंगा की धारा प्राप्त है, उसे क्षुद्र जलाशय से क्या प्रयोजन? कोई उसमें शौच लेता है, तो कोई पशुओं को नहला देता है। इसके आगे कोई उपयोग नहीं है। इसी प्रकार ब्रह्म को साक्षात जाननेवाले उस विप्र महापुरूष का, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है। प्रयोजन रहता अवश्य है, वेद रहते हैं, क्योंकि पीछेवालों के लिये उनका उपयोग है। वहीं से चर्चा आरम्भ होगी। इसके उपरान्त योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियों का प्रतिपादन करते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेष कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड्गोडस्त्वकर्मणि।।47।।

कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। ऐसा समझ कि फल है ही नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। अब तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उनतालीसवें श्लोक में पहली बार कर्म का नाम लिया; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या और उसे करें कैसे? उस कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि —

  1. अर्जुन! इस कर्म द्वारा तू कर्मों के बन्धन से अच्छी प्रकार छूट जायेगा।
  2. अर्जुन! इसमें आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नहीं है। आरम्भ कर दे तो प्रकृति के पास कोई उपाय नहीं कि उसे नष्ट कर दे।
  3. अर्जुन! इसमें सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि स्वर्ग या ऋद्धियों सिद्धियों में फंसाकर खड़ा कर दे।
  4. अर्जुन! कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है। इस धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म मरण के भय से उद्धार करानेवाला होता है।
    किन्तु अभी तक उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? किया कैसे जाय? इसी अध्याय के इकतालीसवें श्लोक में उन्होंने बताया —
  5. अर्जुन! इसमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही है, क्रिया एक ही है। तो क्या बहुत सी क्रियावाले भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं — वे कर्म नहीं करते। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उन क्रियाओं को व्यक्त भी करते हैं।

उनके वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वे जन्म मृत्युरूपी अनन्त फल को प्राप्त होते हैं। अत: निश्चयात्मक क्रिया एक ही है; लेकिन यह नहीं बताया कि वह क्रिया कौन सी है?

सैतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा—अर्जुन! कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो अर्थात निरन्तर करने के लिये उसी में लीन होकर करें; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? प्राय: इस श्लोक का उद्धरण देकर लोग कहते हैं कि कुछ भी करो, केवल फल की कामना मन करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। किन्तु अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया ​ही नहीं कि वह कर्म है कौन सा, जिसे करें? यहां पर केवल कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि कर्म देता क्या है और कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियां क्या हैं? प्रश्न ज्यों का त्यों बना हुआ है, जिसे योगेश्वर आगे अध्याय तीन चार में स्पष्ट करेंगे।

पुन: इसी पर बल देते हैं —

योगस्थ: कुरू कर्माणि सड्ंग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।48।।

धनंजय! आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। कौन सा कर्म? कौन सा कर्म? निष्काम कर्म कर। “समत्वं योग उच्चते” — यह समत्व भाव ही योग कहलाता है। विषमता जिसमें न हो, ऐसा भाव समत्व कहलाता है। ऋद्धियां सिद्धियां विषम बनाती हैं, आसक्ति हमें विषम बनाती है, फल की इच्छा विषमता पैदा करती है, इसीलिये फल की वासना न हो; फिर भी कर्म करने में अश्रद्धा न हो। देखी सुनी सभी वस्तुओं में आसक्ति का त्याग करके, प्राप्ति और अप्राप्ति के विषय में न सोचकर केवल योग में स्थित रहते हुए कर्म कर। योग से चित्त चलायमान न हो।

योग एक पराकाष्ठा की स्थिति है और एक प्रारम्भ की स्थिति भी होती है। प्रारम्भ में भी हमारी दृष्टि लक्ष्य पर ही रहनी चाहिये। अत: योग पर दृष्टि रखते हुए कर्म का आचरण करना चाहिये। समत्व भाव अर्थात सिद्धि और असिद्धि में समभाव ही योग कहलाता है। जिसको सिद्धि और असिद्धि विचलित नहीं कर पाती, विषमता जिसमें पैदा नहीं होती, ऐसा भाव होने के कारण यह समत्व योग कहलाता है। यह इष्ट से समत्व दिलाता है, इसलिये इसे समत्व योग कहते हैं। कामनाओं का सर्वथा त्याग है, इसलिये इसे निष्काम कर्मयोग कहते हैं। कर्म करना है, इसलिये इसे कर्मयोग कहते हैं। परमात्मा से मेल कराता है, इसलिये इसका नाम योग अर्थात मेल है। इसमें बौद्धिक स्तर पर ध्यान रखना पड़ता है कि सिद्धि और असिद्धि में समभाव रहे, आसक्ति न हो, फल की वासना न आने पाये इसलिये यही निष्काम कर्मयोग बुद्धियोग भी कहा जाता है।

दूरेण हृा्रवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंचय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:।।49।।

धनंजय! “अवरं कर्म” — वासनावाले कर्म बुद्धियोग से अत्यन्त दूर हैं। फल की कामनावले कृपण हैंं। वे आत्मा के साथ उदारता नहीं बरतते, अत: समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर। जैसी कामना है वैसा मिल भी जाये तो उसे भोगने के लिये शरीर धारण करना पड़ेगा। आवागमन बना है तो कल्याण कैसा? साधक को तो मोक्ष की भी वासना नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि वासनाओं से मुक्त होना ही तो मोक्ष है। फल की प्राप्ति का चिन्तन करने से साधक का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है और फल प्राप्त होने पर वह उसी फल में उलझ जाता है। उसकी साधना समाप्त हो जाती है। आगे वह भजन क्यों करे? वहां से वह भटक जाता है। इसलिये समत्व बुद्धि से योग का आचरण करें।

ज्ञानमार्ग को भी श्रीकृष्ण ने बुद्धियोग कहा था कि अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी और यहां निष्काम कर्मयोग को भी बुद्धियोग कहा गया। वस्तुत: दोनों में बुद्धि का, दृष्टिकोण का ही अन्तर है। उसमें लाभ हानि का रिकार्ड रखकर उसे जांच कर चलना पड़ता है, इसमें बौद्धिक स्तर पर समत्व बनाये रखना पड़ता है इसलिये इसे समत्व बुद्धियोग भी कहा जाता है। इसलिय धनंजय! तू समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल की वासनावाले अत्यन्त कृपण हैं।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्।।50।।

समत्व बुद्धियुक्त पुरूष पुण्य पाप दोनों को ही इसी लोक में त्याग देता है, उनसे लिपायमान नहीं होता। इसलिये समत्व बुद्धियोग के लिये चेष्टा कर। “योग: कर्मसु कौशलम्” समत्व बुद्धि के साथ कर्मों का आचरण कौशल ही योग है अर्थात् कुशलतापूर्वक कर्म को सम्पादित करना ही योग है।

संसार में कर्म करने के दो दृष्टिकोण प्रचलित हैं। लोग कर्म करते हैं तो उसका फल भी अवश्य चाहते हैं या फल न मिले तो कर्म करना ही नहीं चाहते; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण इन कर्मों को बन्धनकारी बताते हुए “आराधना” को एकमात्र कर्म मानते हैं। इस अध्याय में उनहोंने कर्म का नाम मात्र लिया। अध्याय 3 के 9वें श्लोक में उसकी परिभाषा दी और चौथे अध्याय में कर्म के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण ने सांसारिक परम्परा से हटकर कर्म करने की कला बतायी कि कर्म तो करो, श्रद्धापूर्वक करो; किन्तु फल के अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दो। फल जायेगा कहां? यही कर्मों के करने का कौशल है। निष्काम साधक की समग्र शक्ति इस प्रकार कर्म में लगी रहती है। आराधना के लिये ही तो शरीर है। फिर भी जिज्ञासा स्वाभाविक है कि क्या सदैव कर्म ही करते रहना है या इसका कुछ परिणाम भी निकलेगा? इसे देखें…