पढ़े: यर्थाथ गीता के दूसरे अध्याय के 31 से 40 तक श्लोक…

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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोडन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।31।।

अर्जुन! स्वधर्म देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है; क्योंकि धर्मसंयुक्त युद्ध से बढ़कर अन्य कोई परमकल्याणकारी मार्ग क्षत्रिय के लिये नहीं है। अभी तक तो ‘आत्मा शाश्वत है’, ‘आत्मा सनातन है’, ‘वहीं एकमात्र धर्म है’ कहा गया है। अब यह स्वधर्म कैसा? धर्म तो एकमात्र आत्मा ही है। वह तो अचल स्थिर है तो धर्माचरण क्या? वस्तुत: इस आत्मपथ में प्रवृत होने की क्षमता हर व्यक्ति की अलग अलग होती है। स्वभाव से उत्पन्न इस क्षमता को स्वधर्म कहा गया है।

इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरूष ने स्वभाव की क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बांटा— शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात अल्पज्ञ होता है। घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता। वह प्रकृति के मायाजाल को काट नहीं पाता। इस अवस्था में महापुरूष की सेवा से उसके स्वभाव में सदगुण आते हैंं। वह वैश्व श्रेणी का साधक बन जाता है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसका व शनै:शनै: संग्रह और गोपालन अर्थात इन्द्रियों की सुरक्षा करने में सक्षम हो जाता है। काम, क्रोध इत्यादि से इन्द्रियों की हिंसा होती है तथा विवेक, वैराग्य से इनकी सुरक्षा होती है, किन्तु प्रकृति को निर्बीज करने की क्षमता उसमें नहीं होती। क्रमश: उन्नति करते—करते साधक के अन्त:करण में तीनों गुणों को काटने की क्षमता अर्थात क्षत्रियत्व आ जाता है। इसी स्तर पर प्रकृति और उसके विकारों नाश करने की क्षमता आ जाती है, इसलिये युद्ध यहीं से आरम्भ होता है। क्रमश: साधन करके साधक ब्राह्मणत्व की श्रेणी में बदल जाता है। इस समय मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, धारावाही चिन्तन, सरलता, अनुभव, ज्ञान इत्यादि लक्षण साधक में स्वाभाविक प्रवाहित होते है। इन्हीं के अनुष्ठान से चलकर क्रमश: वह ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है, जहां वह ब्राह्मण भी नहीं रह जाता।

विदेह राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चाक्रायण, उषस्ति, कहोल, आरूणि, उद्दालक और गार्गी के प्रश्नों का समाधान करते हुए बताया कि आत्मसाक्षात्कार का पूर्णतया सम्पादन करनेवाला ही ब्राह्मण होता है। यह आत्मा ही लोक, परलोक और समस्त प्राणियों को भीतर से नियमित करता है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, तारागण, अन्तरिक्ष, आकाश एवं प्रत्येक क्षण इस आत्मा के ही प्रशासन में हैं। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। आत्मा अक्षर है, इससे भिन्न सब नाशवान है। जो कोई इसी लोक में इस अक्षर को न जानकर हवन करता है, तप करता है, हजारों वर्षों तक यज्ञ करता है, उसका यह सब कर्म नाशवान है। जो कोई भी इस अक्षर को जाने बिना इस लोक से मरकर जाता है वह दयनीय है, कृपण है और जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है।

अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहीं। प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्या? प्राय: लोग इसका आशय समाज में जन्मना उत्पन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातियों से लेते हैं। इन्हें ही चार वर्ण मान लिया जाता है। किन्तु नहीं, शास्त्रकार ने स्वयं बताया है कि ​क्षत्रिय क्या है, वर्ण क्या है? यहां उन्होंने केवल क्षत्रिय का नाम लिया और आगे अठारहवें अध्याय तक इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया कि वस्तुत: ये वर्ण हैं क्या और कैसे इनमें परिवर्तन होता हैं?

श्रीकृष्ण ने कहा, ‘चातुर्वण्र्यं मया सृष्टम’, चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को बांटा? श्रीकृष्ण कहते हैं — नहीं, ‘गुणकर्मविभागश:।‘ गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बांटा। अब यह देखना है कि वह कर्म क्या है, जिसे बांटा गया? गुण परिवर्तनशील हैं। साधना की उचित प्रक्रिया द्वारा तामसी से राजसी और राजसी से सात्विक गुणों से प्रवेश मिलता जाता है। अन्तत: ब्राह्मण स्वभाव बन जाता है। उस समय ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएं उस साधक में रहती हैं। वर्ण सम्बन्धी प्रश्न यहां से आरम्भ होकर अठारहवें अध्याय में जाकर पूर्ण होता है।

श्रीकृष्ण की मान्यता — ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्व नुष्ठितात।‘ स्वभाव से उत्पन्न इस धर्म में प्रवृत्त होने की क्षमता जिस स्तर की हो, भले ही वह गुणरहित शूद्र श्रेणी की हो, तब भी परमकल्याण करती है; क्योंकि आप क्रमश: वहीं से उत्थान करते हैं। उससे ऊपरवालों की नकल करके साधक नष्ट हो जाता है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था, इसलिये श्रीकृृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! अपने स्वभाव से उत्पन्न इस युद्ध में प्रवृत्त होने की अपनी क्षमता को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य क्षत्रिय के लिये नहीं है। इसी पर प्रकाश डालते हुए पुन: योगेश्वर कहते हैं—

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।।32।।
पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर अचूक लक्ष्यवेधी अर्जुन! स्वत: प्राप्त स्वर्ग के खुले हुए द्वाररूपी इस युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं। क्षत्रिय श्रेणी के साधक में तीनों गुणों को काट देने की क्षमता रहती है। उसके लिये स्वर्ग का द्वार खुला है, क्योंकि उसमें दैवी सम्पद् पूर्णत: अर्जित रहती है, स्वर में विचरने की उसमें क्षमता रहती है। यही खुला हुआ स्वर्ग का द्वार है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय ही पाते हैं; क्योंकि उनमें ही इस संघर्ष की क्षमता है।

दुनिया में लड़ाइयां होती हैं। विश्व सिमटकर लड़ता है, प्रत्येक जाति लड़ती है; किन्तु शाश्वत विजय जीतनेवाले को भी नहीं मिलती। ये तो बदले हैं। जो जिसको जितना दबाता है, कालान्तर में उसे भी उतना ही दबना पड़ता है। यह कैसी विजय है, जिसमें इन्द्रियों को सुखानेवाला शोक बना ही रहता है, अन्त में शरीर भी नष्ट हो जाता है? वास्तविक संघर्ष तो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का है, जिसमें एक बार विजय हो जाने पर प्रकृति का सदा के लिये निरोध और परमपुरूष परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यह ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है।

अथ चेत्वमिमं धर्म्यं सड़ग्रामं न करिष्यसि।
तत: स्वधर्मंं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।33।।

और यदि तू इस ‘धर्मयुक्त संग्राम’ अर्थात शाश्वत सनातन परमर्ध परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाला धर्मयुद्ध नहीं करेगा तो स्वधर्म अर्थात स्वभाव से उत्पन्न संघर्ष करने की क्षमता, क्रिया में प्रवृत्त होने की क्षमता को खोकर पाप अर्थात आवागमन और अपकीर्ति को प्राप्त होगा। अपकीर्ति पर प्रकाश डालते हैं —

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेडव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।34।।

सब लोग बहुत काल तक तेरी अपकीर्ति का कथन करेंगे। आज भी पदच्युत होनेवाले महात्माओं में विश्वामित्र, पराशर, निमि, श्रृड़गी इत्यादि की गणना होती है। बहुत से साधक अपने धर्म पर विचार करते हैं, सोचते हैं कि लोग हमें क्या कहेंगे? ऐसा भाव भी साधना में सहायक होता है। इससे साधना में लगे रहने की प्रेरणा मिलती है। कुछ दूरी तक यह भाव भी साथ देता है। माननीय पुरूषों के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर होती है।

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा:।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।।35।।

जिन महारथियों की निगाह में तू बहुत माननीय होकर अब तुच्छता को प्राप्त होगा, वे महारभी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे। महारथी कौन? इस पर पर महान परिश्रम से आगे बढ़नेवाले साधक महारभी हैं। इसी प्रकार इतने ही परिश्रम से अविद्या की ओर खींचनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोहादि भी महारथी हैं। जो तुझे बहुत सम्मान देते थे कि साधक प्रशंसनीय है, तुम उनकी निगाह से गिर जाओगे। इतना ही नहीं, बल्कि—

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता:।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम्।।36।।

वैरी लोग तेरे पराक्रम की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचनों को कहेंगे। एक दोष आता है तो चारों ओर से निन्दा और बुराइयों की झड़ी लग जाती है। न कहने योग्य वचन भी कहे जाते हैं। इससे बड़ा दुख क्या होगा? अत:—

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:।।37।।

इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे— स्वर में विचरने की क्षमता रहेगी। श्वास के बाहर प्रकृति में विचरने की धाराएं निरूद्ध हो जायेंगी। परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली दैवी सम्पद् हृदय में पूर्णत: प्र​वाहित रहेगी अथवा इस संघर्ष में जीतने पर महामहिम स्थिति को प्राप्त करोगे। इसलिये अर्जुन! युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो।

प्राय: लोग इस श्लोक के अर्थ में समझते हैं कि इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग जाओगे और जीतोगे तो पृथ्वी का भोग भोगोगे; किन्तु आपको स्मरण होगा, अर्जुन कह चुका है— “भगवन्! पृथ्वी ही नहीं अपितु त्रैलोक्य के साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन अर्थात इन्द्रपद प्राप्त होने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे शोक को दूर कर सके। यदि इतना ही मिलना है, तो गोविन्द! मैं युद्ध कदापि नहीं करूंगा।” यदि इतने पर भी श्रीकृष्ण कहते कि— अर्जुन! लड़ो। जीतोगे तो पृथ्वी पा जाओगे, हारोगे तो स्वर्ग के नागरिक बन जाओगे, तो श्रीकृष्ण देते ही क्या हैं? अर्जुन इससे आगे का सत्य, श्रेय की कामनावाला शिष्य था, जिसे सद्गुरूदेव श्रीकृष्ण ने बताया कि क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के इस संघर्ष में यदि शरीर का समय पूरा हो जाता है और लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके तो स्वर्ग प्राप्त करोगे अर्थात स्वर में ही विचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे, दैवी सम्पद् हृदय में ढल जायेगी और इस शरीर के रहते रहते संघर्ष में सफल हो जाते हो तो “महीम्” सबसे महान ब्रह्म की महिमा का उपभोग करोगे, महामहिम की स्थिति प्राप्त कर लोगे। जीतोगे तो सर्वस्व: क्योंकि महामहिमत्व को पाओगे और हारोगे तो देवत्व — दोनों हाथों में लड्डू रहेंगे। लाभ में भी लाभ और हानि में भी लाभ ही है। पुन: इसी पर बल देते हैं—

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।38।।

इस प्रकार सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। अर्थात् सुख में सर्वस्व और दु:ख में भी देवत्व है। लाभ में महीम की स्थिति अर्थात् सर्वस्व और हानि में देवत्व है। जय में महामहिम स्थिति और पराज्य में भी दैवी सम्पद् पर अधिकार है। इस प्रकार अपने लाभ हानि को भली प्रकार स्वयं समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। लड़ने में ही दोनों वस्तुएं हैं। लड़ोगे तो पाप अर्थात आवागमन को प्राप्त नहीं होओगे। अत: तू युद्ध के लिये तैयार हो।

एषा तेडभिहिता साड़खये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृगु।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।39।।

पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी है। कौन सी बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में इतना ही है कि अपनी हस्ती को देखकर लाभ—हानि का भली प्रकार विचार करके कि जीतेंगे तो महामहिम स्थिति और हारेंगे तो देवत्व, जय में सर्वस्व और पराजय में भी देवत्व — दोनों तरह लाभ है। युद्ध नहीं करेंगे तो सभी हमें बुरा कहेंगे, भय से उपराम हुआ मानेंगे, अपकीर्ति होगी। इस प्रकार अपने अस्तित्व को सामने रखकर स्वयं विचार कर युद्ध में अग्रसर होना ही ज्ञानयोग है।

प्राय: लोगों में भ्रान्ति है कि ज्ञानमार्ग में कर्म नहीं करना पड़ता। वे कहते हैं कि ज्ञानमार्ग में कर्म नहीं है। मैं तो ‘शुद्ध हूं’, ‘चैतन्य हूं’, ‘अहं ब्राह्मस्मि।’, ‘गुण ही गुण बरतते है।’ ऐसा मानकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार यह ज्ञानयोग नहीं है। ज्ञानयोग में भी वही ‘कर्म’ करना है, जो निष्काम कर्मयोग में किया जाता है। दोनों में केवल बुद्धि का, दृष्टिकोण का अन्तर है। ज्ञानमार्गी अपनी स्थिति समझकर अपने पर निर्भर होकर कर्म करता है, जबकि निष्काम कर्मयोगी इष्ट के आश्रित होकर कर्म करता है। करना दोनों मार्गों में है और वह कर्म भी एक ही है, जिसे दोनों मार्गों में किया जाना है। केवल कर्म करने के दृष्टिकोण दो हैं।

अर्जुन! इसी बुद्धि को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश करेगा। यहां श्रीकृष्ण ने कर्म का नाम पहली बार लिया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म है क्या? अब कर्म न बताकर पहले कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं।

नेहाभिक्रमनाशोडस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।40।।

इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नहीं होता। सीमित फलरूपी दोष नहीं है। इसलिये इस निष्काम कर्म का, इस कर्म से सम्पादित धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म मृत्युरूपी महान भय से उद्धार कर देता है। धर्म परिवर्तित नहीं होता है। आप इस कर्म को समझें और इस पर दो कदम चल भर दे, बीज भर डाल दें, तो अर्जुन! बीज का नाश नहीं होता। प्रकृति में कोई क्षमता नहीं, ऐसा कोई अस्त्र नहीं कि उस सत्य को मिटा दे। प्रकृति केवल आवरण डाल सकती है, कुछ देर तक सकती है; किन्तु साधन के आरम्भ को मिटा नहीं सकती।

आगे ​श्रीकृष्ण ने बताया कि सभी पापियों से भी बड़ा पापी ही क्यों न हो, ज्ञानरूपी नौका द्वारा नि:सन्देह पार हो जायेगा। ठीक उसी बात को यहां कहते हैं कि अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का बीजारोपण भर कर दें तो उस बीच का कभी नाश नहीं होता। विपरीत फलरूपी दोष भी इसमें नहीं होता कि आपको स्वर्ग, ऋद्धियों या सिद्धियों तक पहुंचा कर छोड़ दे। आप यह साधन भले छोड़ दें; किन्तु यह साधन आपका उद्धार कर​के ही छोड़ेगा। इस निष्काम कर्मयोग का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु के महान भय से उद्धार कर देता है। ‘अनेकजनमसंसिद्धस्तो याति परां गतिम्।’ कर्म का यह बीजारोपण अनेक जन्मों के पश्चात वहीं खड़ा कर देगा, जहां परमधाम है, परमगति है। इसी क्रम में आगे कहते हैं…