पढ़े: यर्थाथ गीता के दूसरे अध्याय के 21 से 30 तक श्लोक…

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वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरूष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।21।।
पार्थिव शरीर को रथ बनाकर ब्रहा्ररूपी लक्ष्य पर अचूक निशाना लगानेवाला पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरूष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यक्त जानता है, वह पुरूष कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है? अविनाशी का विनाश असम्भव है। अजन्मा जन्म नहीं लेता। अत: शरीर के लिये शोक नहीं करना चाहिये। इसी को उदाहरण से स्पष्ट करते हैं—

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहणाति नरोडपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।22।।

जैसे मनुष्य ‘जीर्णानि वासांसि’ जीर्ण शीर्ण पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही यह जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को धारण करता है। जीर्ण होने पर ही नया शरीर धारण करना है तो शिशु क्यों मर जाते हैं? यह वस्त्र तो और विकसित होना चाहिये। वस्तुत: यह शरीर संस्कारों पर आधारित है। जब संस्कार जीर्ण होते हैं तो शरीर छूट जाता है। यदि संस्कार दो दिन का है तो दूसरे दिन ही शरीर जीर्ण हो गया। इसके बाद मनुष्य एक श्वास भी अधिक नहीं जीता। संस्कार ही शरीर है। आत्मा संस्कारों के अनुसार नया शरीर धारण कर लेता है। ‘अथ खलु क्रतुमय: पुरूषो यथा क्रतुरस्मिंल्लोके पुरूषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति।’ अर्थात यह पुरूष निश्चय ही संकल्पमय है। इस लोक में पुरूष जैसा निश्चयवाला होता है, वैसा ही यहां से मरकर जाने पर होता है। अपने संकल्प से बनाये हुए शरीरों में पुरूष उत्पन्न होता है। इस प्रकार मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है। आत्मा नहीं मरता। पुन: इसकी अजरता—अमरता पर बल देते हैं —

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूत:।।23।।

अर्जुन! इस आत्मा को शस्त्रादि नहीं काटते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और न वायु इसे सुखा ही सकता है।

अच्छेद्योडयमदाहाोडयमक्लेद्योडशोष्य एव च।
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोडयं सनातन:।।24।।

यह आत्मा अच्छेद्य है— इसे छेदा नहीं जा सकता, यह अदाहृा्र है — इसे जलाया नहीं जा सकता, यह अक्लेद्य है। इसे गीला नहीं किया जा सकता? आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा नि:सन्देह अशोष्य, सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है।

अर्जुन ने कहा कि कुलधर्म सनातन है, ऐसा युद्ध करने से सनातन धर्म नष्ट हो जायेगा; किन्तु श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान माना और आत्मा को ही सनातन बताया। आप कौन हैं? सनातन धर्म के अनुयायी। सनातन कौन है? आत्मा। यदि आप आत्मपर्यन्त दूरी तय करानेवाली विधि विशेष से अवगत नहीं हैं तो आप सनातन धर्म नहीं जानते। इसका कुपरिमाण साम्प्रदायिकता में फंसे धर्मभीरू लोगों को भोगना पड़ रहा है। मध्यकालीन भारत में बाहर से आनेवाले मुसलमान मात्र बारह हजार थे, आज अट्ठाइस करोड़ हैं। बाहर हजार से बढ़कर लाखों हो जाते, अधिक से अधिक करोड़ के लगभग हो जाते और कितने हो जाते? यह अट्ठाइस करोड़ से भी आगे बढ़ रहे हैं। सब हिन्दू ही तो हैं। आपके सगे भाई हैं, जो छूने और खाने से नष्ट हो गये। वे नष्ट नहीं हुए बल्कि उनका सनातन अपरिवर्तनशील धर्म नष्ट हो गया।

जब मैटर क्षेत्र में पैदा होनेवाली कोई वस्तु इस सनातन का स्पर्श नहीं कर सकती, तो छूने खाने से सनातन धर्म नष्ट कैसे हो सकता है? यह धर्म नहीं, एक कुरीति परिस्थिति थी, जिससे भारत में साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा, देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता की आज भी समस्या बनी हुई है।

इन कुरीतियों के कथानक इतिहास में भरे पड़े हैं। हमीरपुर जिले में पचास साठ परिवार कुलीन क्षत्रिय थे। आज वे सब मुसलमान हैं। न उन पर तोप का हमला हुआ, न तलवार का हुआ, क्या? अर्धरात्रि में दो—एक मौलवी उस गांव के एकमात्र कुएं के समीप छिप गये कि कर्मकाण्डी ब्राहा्रण सबसे पहले यहां स्नान करने आयेगा। जहां वे आये तो उन्हें पकड़ लिया, उनका मुंह बन्द कर दिया। उनके सामने उन्होंने कुएं से पानी निकाला, मुंह लगाकर पिया और बचा हुआ पानी कुएं में डाल दिया। रोटी का एक टुकड़ा भी डाल दिया। पण्डितजी देखते ही रह गये, विवश थे। तत्पश्चात पण्डितजी को भी साथ लेकर वे चले गये। अपने घर में उन्हें बंद कर दिया।

दूसरे दिन उन्होंने हाथ जोड़कर पण्डितजी से भोजन के लिये निवेदन किया तो वे बिगड़ पड़े — “अरे, तुम यवन हो मैं ब्राह्मण, भला कैसे खा सकता हूं?” उन्होंने कहा — “महाराज! हमें आप जैसे विचारवान लोगों की बड़ी आवश्यकता है। क्षमा करें।” पण्डितजी को छोड़ दिया गया।

पण्डितजी अपने गांव आये। देखा, लोग कुएं का प्रयोग पूर्ववत कर रहे थे। वे अनशन करने लगे। लोगों ने कारण पूछा तो बोले यवन इस कुएं की जगत पर चढ़ गये थे। मेरे सामने उन्होंने इस कुएं को जूठा किया और इसमें रोटी का टुकड़ा भी डाल दिया। गांव के लोग स्तब्ध रह गये। पूछा — “अब क्या होगा?” पण्डित जी ने बताया— “अब क्या? धर्म तो नष्ट हो गया।”

उस समय लोग शिक्षित नहीं थे। स्त्रियों और शूद्रों से पढ़ने का अधिकार न जाने कब से छीन लिया गया था। वैश्व धनोपार्जन ही अपना धर्म मान बैठे थे। क्षत्रिय चारणों के प्रशस्ति गायन में खोये थे कि अन्नदाता की तलवार चमकी तो बिजली कौंधने लगी, दिल्ली का तख्त डगमगाने लगा। सम्मान वैसे ही प्राप्त है तो पढ़ें क्यों? धर्म से उन्हें क्या लेना देना? धर्म केवल ब्राहा्रणों की वस्तु बनकर रह गया था। वे ही धर्मसूत्रों के र​चयिता, वे ही उसके व्याख्याकार और वही उसके झूठ सच के निर्णायक थे, जबकि प्राचीनकाल में स्त्रियों, शूद्रों, वैश्यों, क्षत्रियों और ब्राहा्रणों को, सबको वेद पढ़ने का अधिकार था। प्रत्येक वर्ग के ऋषियों ने वैदिक मन्त्रों की रचना की है, शास्त्रार्थ निर्णय में भाग लिया। प्राचीन राजाओं ने धर्म के नाम पर आडम्बर फैलानेवालों को दण्ड दिया, धर्मपरायणों का समादर किया था। किन्तु मध्यकालीन भारत में सनातन धर्म की यथार्थ जानकारी न रखने से उपयुक्र्त गांव के निवासी भेड़ की तरह एक कोने में खड़े होते गये कि धर्म नष्ट हो गया। कई लोगों ने अप्रिय शब्द को सुनकर आत्महत्या कर ली; किन्तु सब कहां तक प्राणान्त करते। अटूट श्रद्धा के पश्चात भी विवश होकर अन्य हल खोजना पड़ा। आज भी वे बांस गाड़कर, मूसल रखकर हिन्दुओं की तरह विवाह करते हैं, बाद में एक मौलवी निकाह पढ़ाकर चला जाता है। सब के सब शुद्ध हिन्दू हैं, सब के सब मुसलमान बन गये।

हुआ क्या था? पानी पिया था, अनजाने में मुसलमानों का छुआ खा लिया था। ​इसलिये धर्म नष्ट हो गया। धर्म तो हो गया छुईमुई। यह एक पौधा होता है। आप छू दें तो उसकी पत्तियां संकुचित हो जाती हैं और हाथ हटाते ही पुन: वि​कसित हो जाती हैं। यह पौधा हाथ हटाने पर विकसित हो जाता है; किन्तु धर्म तो ऐसा मुरझाया कि कभी विकसित नहीं होगा। वे मर गये, सदा के लिये उनके राम, कृष्ण और परमात्मा मर गये। जो शाश्वत थे, वे मर गये। वास्तव में वह शाश्वत के नाम पर कोई कुरीति थी, जिसे लोग धर्म मान बैठे ​थे।

धर्म की शरण हम क्यों जाते हैं? क्योंकि हम मरणधर्मा हैं और धर्म कोई ठोस चीज है, जिसकी शरण जाकर हम भी अमर हो जाए। हम तो मारने से मरेंगे और यह धर्म केवल छूने और खाने से मर जायेगा, तो हमारी क्या रक्षा करेगा? धर्म तो आपकी रक्षा करता है, आपसे शक्तिशाली है। आप तलवार से मरेंगे और धर्म? वह छूने से नष्ट हो गया। कैसा है आपका धर्म? कुरीतियां नष्ट होती हैं, न कि सनातन। सनातन तो ऐसी ठोस वस्तु है जिसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता। खानपान तो दूर, प्रकृति में उत्पन्न कोई वस्तु उसका स्पर्श भी नहीं कर पाती तो वह सनातन नष्ट कैसे हो गया?

ऐसी ही कतिपय कुरीतियां अर्जुनकाल में भी थीं। उनका शिकार अर्जुन भी था। उसने विलाप करते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि कुलधर्म सनातन है। युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जायेगा। कुलधर्म नष्ट होने से हम अनन्तकाल तक नरक में चले जायेंगे। किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा — “तुझे यह अज्ञान कहां से उत्पन्न हो गया?” सिद्ध है कि वह कोई कुरीति थी, तभी तो श्रीकृष्ण ने उसका निराकरण किया और बताया कि आत्मा ही सनातन है। यदि आप आत्मिक पथ नहीं जानते तो सनातन धर्म में आपका अभी तक प्रवेश नहीं हुआ है।

जब यह सनातन शाश्वत आत्मा सबके अन्दर व्याप्त है तो खोजा किसे जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं—

अव्यक्तोडयमचिन्त्योडयमविकार्योडयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।25।।

यह आत्मा अव्यक्त अर्थात इन्द्रियों का विषय नहीं है। इन्द्रियों के द्वारा इसे समझा नहीं जा सकता। जब त​क इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, तब तक आत्मा है तो किन्तु उसे समझा नहीं जा सकता। वह अचिन्त्य है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह शाश्वत है तो; किन्तु हमारे दर्शन, उपभोग और प्रवेश के लिये नहीं है। अत: चित्त का निरोध करें।

पीछे श्रीकृष्ण बता आये हैं कि असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का तीनों काल में अभाव नहीं है। वह सत् है आत्मा। आत्मा ही अपरिवर्तनशील, शाश्वत, सनातन और अव्यक्त है। तत्वदर्शियों ने आत्मा को इन विशेष गुणधर्मों से युक्त देखा। न दस भाषाओं के ज्ञाता ने देखा, न किसी समृद्धिशाली ने देखा, बल्कि तत्वदर्शियों ने देखा। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि तत्व है परमात्मा। मन के निरोधकाल में साधक उसका दर्शन और उससे प्रवेश पाता है। प्राप्तिकाल में भगवान मिलते हैं और दूसरे ही क्षण वह अपनी आत्मा को ईश्वरीय गुणधर्मों से विभूषित देखता है। वह देखता है कि आत्मा ही सत्य, सनातन और परिपूर्ण है। यह आत्मा अचिन्त्य है। यह विकाररहित अर्थात न बदलनेवाला कहा जाता है। अत: अर्जुन! आत्मा को ऐसा जानकर तू शोक करने योग्य नहीं है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों में विरोधाभास दिखाते हैं, जो सामान्य तर्क है।

अत चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचि​तुमर्हसि।।26।।

यदि तू इसे सदैव जन्मनेवाला और सदा मरनेवाला माने तब भी तुझे शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि —

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्यादपरिहार्येडर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।27।।

ऐसा मान लेने पर भी जन्मनेवाले की निश्चित मृत्यु और मरनेवाले का निश्चित जन्म सिद्ध होता है। इसलिये भी तू बिना उपायवाले इस विषय में शोक करने लायक नहीं है। जिसका कोई इलाज नहीं, उसके लिये शोक करना एक अन्य दुख को आमन्त्रित करना है।

अव्यक्ता​दीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।28।।

अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले बिना शरीरवाले और मरने के बाद भी बिना शरीरवाले हैं। जन्म के पूर्व और मृत्यु के पश्चात भी दिखायी नहीं पड़ते, केवल जन्म मृत्यु के बीच में ही शरीर धारण किये हुए दिखायी देते हैं। अत: इस परिवर्तन के लिय व्य​र्थ की चिन्ता क्यों करते हो? इस आत्मा को देखता कौन है? इस पर कहते हैं—

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य:।
आश्चर्यवच्चैनमन्य: श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित।।29।।

पहले श्रीकृष्ण ने कहा था कि इस आत्मा को तत्वदर्शियों ने देखा है, अब तत्वदर्शन की दुर्भलता पर प्रकाश डालते हैं कि कोई विरला महापुरूष ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है। सुनता नहीं प्रत्यक्ष देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरूष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्व को कहता है। जिसने देखा है, वहीं यथार्थ कह सकता है। दूसरा कोई विरला साधक इसे आश्चर्य की भांति सुनता है। सब सुनते भी नहीं; क्योंकि यह अधिकारी के लिये ही है। हे अर्जुन! कोई तो सुनरकर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते; क्योंकि साधन पार नहीं लगता। आप लाख ज्ञान की बातें सुनें, समझें बाल की खाल निकालकर समझें, लालायित भी रहें; किन्तु मोह बड़ा प्रबल है, थोड़ी देर बाद ही आप अपनी सांसारिक व्यवस्थाओं में लिप्त मिलेंगे।

अन्त में श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं—
देही नित्यमवध्योडयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भू​तानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।30।।

अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदैव अवध्य है, अकाट्य है। इसलिये सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये तू शोक करने योग्य नहीं है।

‘आत्मा ही सनातन है’ — इस तथ्य का प्रतिपादन करके, इसका प्रभुतासहित वर्णन करके यह प्रश्न यहीं पूरा हो जाता है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि इसकी प्राप्ति कैसे हो? सम्पूर्ण गीता में इसके लिये दो ही मार्ग हैं— पहला निष्काम कर्मयोग और दूसरा ज्ञानयोग। दोनों मार्गों में किया जाने वाला कर्म एक ही है। उस कर्म की अनिवार्यता पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञानयोग के विषय में कहते हैं।