जयपुर|Deepika Jangir: यूरोपीय देश नीदरलैंड के बच्चों को सबसे खुशहाल के रूप में आंका गया है. मन में सवाल उठा कि आखिर वहां के मां-बाप के वे कौन से तरीके हैं या स्कूली सिस्टम में ऐसा क्या फर्क है कि हमारी मार-पिटाई, डांट-फटकार वाले सिस्टम से अलग जिंदगी वहां के बच्चे जी रहे हैं और ज्यादा खुशहाल हैं, बल्कि यूं कहें कि ज्यादा सफल भी हैं.

एक्सपर्ट इसका सीक्रेट बताते हैं… बच्चों के लिए स्पष्ट लिमिट यानी सीमाएं तय करें, प्रेम और संबंधों में वार्म्थ, कुछ अच्छा करने का मोटिवेशन, साथ ही उन्हें अपने भविष्य का रास्ता चुनने की आजादी दें. यही कुछ सीक्रेट्स हैं जो बच्चों की खुशहाली का रास्ता साफ करते हैं. बच्चों से खुलकर बात करें कि वे क्या करना चाहते हैं, क्या कमियां हैं, कैसे उन्हें दूर किया जा सकता है. डच लोग यानी नीदरलैंड के लोग अपने बच्चों से उन मुद्दों पर भी खुलकर बात करते हैं जिन पर एशियाई समाजों में बच्चों और पैरेंट्स के बीच एक दीवार जैसी खड़ी कर दी गई है.

बच्चों की ये रैंकिंग 41 अमीर देशों की स्टडी के आधार पर तैयार की गई. इसका पैमाना एकेडमिक और सोशल स्किल थी. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य समेत वे सारे पैमाने भी थे जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के लिए जरूरी हैं. नीदरलैंड के बाद डेनमार्क और नॉर्वे इस लिस्ट में दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं. 41 देशों की इस लिस्ट में सबसे नीचे मिले चिली, बुल्गारिया और अमेरिका. नीदरलैंड आर्थिक रूप से मजबूत देश है, सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी वहां सरकारें काफी जिम्मेदारियां उठाती हैं, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि सिर्फ पैसे से खुशहाली आती है. सिर्फ पैसे से बच्चों की खुशहाली तय होती तो अमेरिका इतना पीछे नहीं होता.

नीदरलैंड स्कूलों में गलाकाट प्रतियोगिता के माहौल की जगह स्किल लर्निंग के माहौल पर जोर देने वाला देश है. मां-बाप के लिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि स्कूल के स्कोर कोई आखिरी पैमाना नहीं हो सकते हैं बच्चों को आंकने के लिए. इसकी बजाय बच्चों में लर्निंग और जिज्ञासा के माहौल को बढ़ाने पर जोर दें. इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर नॉर्वे है. नॉर्वे अपने स्कूलों में टूगैदरनेस को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है. मतलब अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रगति में मदद करने की आदत. इसके लिए परिवारों का सामुदायिक बेहतरी के कामों में योगदान देने को वहां के समाज में काफी सराहा जाता है.