कला पर भारी पड़ गया कोरोना का दंश, दाने-दाने के लिए मोहताज हो गया भोपा समाज

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मरूधर बुलेटिन न्यूज डेस्क। 2010 में एक फिल्म आई थी पीपली लाइव, उसका गाना बहुत मशहूर हुआ था “सखी सैंया तो खूब ही कमात है महंगाई डायन खाए जात है”। लेकिन अपनी कला से विश्व में अपनी अलग पहचान बनाने वाले भोपा समाज पर कोरोना की मार कुछ ऐसी पड़ी की अब महंगाई का तो इनके सामने सवाल ही नहीं रहा। क्योंकि उनकी कमाई ही बंद हो गई। रावण हत्थे के माध्यम से विश्व में अपनी पहचान बनाने वाला भोपा समाज आज कोरोना काल में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। भोपा समाज के लोग अपने परिवार का पालन करने के लिए गोगाजी महाराज, पाबूजी महाराज की फड़ का वाचन व विश्व प्रसिद्ध भोपा-भोपी संगीत गायन तथा जागरण करके अपनी रोजी-रोटी कमाते थे। लेकिन जैसे ही देश में लॉकडाउन लगा। इस समाज की मुसीबतें बढऩी शुरू हो गई। अपनी कला से रोजी-रोटी कमाने वाली भोपा समाज के लोग आज जीवन यापन करने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

क्योंकि कोरोना महामारी के बाद जागरण बंद हो गए हैं। भोपा परिवार की महिलाएं व बच्चे कस्बे में रावण हत्थे के माध्यम से अपनी कला प्रस्तुत कर अनाज व रोटी का इंतजाम कर लेते थे। जिससे परिवार का गुजर-बसर आसानी से चल रहा था। लेकिन कोरोना के बाद यह परिवार अपनी झुग्गी झोपड़ियों में कैद होकर रह गए है। शहर में इनका घर-घर जाना बंद हो गया। जिसके चलते अब इनके परिवार पालने में इनको परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इन भोपा परिवारों का कहना है कि या तो हमें सरकार जागरण लगाने की अनुमति दें या फिर हमारे लिए रोजगार की कोई व्यवस्था करें ताकि हम हमारे परिवार को पाल सकें। रावण हत्थे की धुन पर अपनी सुरीली आवाज से सभी का मन मोह लेने वाले भोपा समाज पहले ही आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी कला को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस पर अब इस कोरोना की मार ने कोड में खाज वाला काम किया है। पहले जहां भोपा समाज की संस्कृति भोपा समाज के लोगों को सुनने वाले लोग हर गांव हर कस्बे हर शहर में मिल जाते थे। लेकिन टीवी और अब मोबाइल में इनकी कला को भारी नुकसान पहुंचाया है। पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी कला को आगे बढ़ाने वाले भोपा समाज आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है यदि इनकी सरकार मदद नहीं करती है तो शायद आने वाले समय में यह संस्कृति विलुप्त हो जाएगी। कोरोना के चलते इन लोगों के हालात बहुत खराब हो गए है। कई परिवार की स्थिति इतनी नाजूक हो गई कि भीख मांग कर गुजारा करना पड़ रहा है।