(जालोर) आधुनिकता के दौर में ग्रामीण इलाकों में पहले की तरह अब खाने-पीने और सेहत से जुड़ी चीजों से परहेज किए जाने लगा है.उस दौर की जीवन शैली के बारे में कहा जाए तो तब लोग खानपान और सेहत का बड़ा ध्यान रखते थे ।अपने परिश्रम उनकी खास पहचान थी गांव में धान की पीसने के लिए खुद महिला हाथ चक्की चलाते और खुद भी लो ना कभी हाथों से ही तैयार किया जाता लेकिन अब बदलते दौर में ग्रामीण अंचलों में यह सब देखने को कम ही मिलता है धान बिजली से चलने वाली चक्की पर पूछा जा रहा है और दही जमाने से पहले ही कच्चे दूध से मशीनों के जरिए घी निकाला जा रहा है हालांकि कुछ ग्रामीण अभी भी पुरानी परंपराओं के अनुसार चल रहे हैं मगर अधिकतर लोग यह सब भूल चुके हैं अब तो गांव में मैं भी बिलोने की सांस पैसों से बिकने लगी है जबकि पहले यह घर कर मुक्त में सुलभ हो जाती थी शहरी क्षेत्र में तो ₹10 लीटर तक साथ भेजी जा रही है। ग्रामीण अंचलों में बाजरी ग्वार मूंग व मोठ समेत अन्य दान कई दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए एक किराना यानी की कोठारिया जैसे ओबरा का जाता है का उपयोग किया जाता था लेकिन बदलते दौर में लोग अब प्लास्टिक जैसे पात्र का उपयोग करते हैं पहले कीराणों में किसान नीम की डाली रख देते थे ताकि अनाज में कीड़े अनेक रूपों प्रकोप से बचा जा सके लेकिन अब नए नए उपकरण आने की वजह से अनाज में भी इतनी ताकत नहीं रह पातीक्षेत्र की बात करें तो महिलाएं बताती है कि हाथों में उन काटने के लिए पहले घरों में चरके थे हाथों से मिट्टी के खिलौने बनाने की कारीगरी भी क्षेत्र में जानी जाती थी मिट्टी से बना कोटलिया अनाज को सुरक्षित रखने में घी गुड़ शक्कर आदि रखने के लोग का पिंजरा सबसे सुरक्षित और उपयुक्त जगह होती थी लेकिन अब बदलते दौर में प्लास्टिक जैसी आने की वजह से उसमें इतना तो जा नहीं रहा है।