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Sunday, September 25, 2022
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पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के अंतिम श्लोक

इसी यक्ष को लोग त्रैविद्या: प्रार्थना, यजन और समत्व दिलानेवाली विधियों से सम्पादित करते हैं, किन्तु बदले में स्वर्ग की कामना करते...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के अंतिम श्लोक

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।जा बस जीव परा भवकूपा।।प्रकृति के दो भेद विद्या और अविद्या हैं। इनमें अविद्या दुष्ट है, दु:खरूप है जिससे...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के 32 से लेकर 34 तक...

मां हि पार्थ व्यपारित्य येऽपि स्यु: पापयोनम:।स्त्रियो वेश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।३२।।पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के 24 से लेकर 31 तक...

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।न तु मामभिजानन्ति तत्वेनातश्चयवन्ति ते।।२४।।सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के 17 से लेकर 23 तक...

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।१७।।अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का धाता अर्थात धारण करनेवाला पिता, अर्थात पालन करनेवाला,...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के 05 से लेकर 10 तक...

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे...

पढ़े: यर्थाथ गीता के नवमोऽध्याय के 01 से लेकर 05 तक...

अध्याय छ: तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग का क्रमबद्ध विश£ेषण किया, जिसका शुद्ध अर्थ है यज्ञ की प्रक्रिया। यज्ञ उस परम में...

पढ़े: यर्थाथ गीता के अथाष्टमोऽध्याय के 26 से लेकर अन्तिम तक...

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते।एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुन:।।२६।।उपर्युक्त शुक्ल और कृष्ण दोनों प्रकार की गतियाँ जगत में शाश्वत हैं अर्थात साधन का...

पढ़े: यर्थाथ गीता के अथाष्टमोऽध्याय के 21 से लेकर 25 तक...

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्।यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।२१।।उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है। उसी को...

पढ़े: यर्थाथ गीता के अथाष्टमोऽध्याय के 16 से लेकर 20 तक...

आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।१६।।अर्जुन! ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंगादि सभी लोक पुनरावर्ती हैं, जन्म लेने और मरने तथा पुन: पुन:...
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