एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।
जा बस जीव परा भवकूपा।।

प्रकृति के दो भेद विद्या और अविद्या हैं। इनमें अविद्या दुष्ट है, दु:खरूप है जिससे विवश जीव भवकूप में पड़ा है, जिससे प्रेरित होकर जीव काल, कर्म, स्वभाव और गुण के घेरे में आ जाता है। दूसरी है विद्यामाया, जिसे श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं रचता हूं। गोस्वामी जी के अनुसार प्रभु रचते हैं-

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एक रचइ जग गुन बस जाकें।
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।

यह जगत की रचना करती है, जिसके आश्रित गुण हैं। कलयाणकारी गुण एकमात्र ईश्वर में है। प्रकृति में गुण हैं ही नहीं, वह तो नश्वर है, लेकिन विद्या में प्रभु ही प्रेरक बनकर करते हैं।
इस प्रकार कल्प दो प्रकार के हैं। एक तो वस्तु का, शरीर और काल का परिवर्तन कल्प है। यह परिवर्तन प्रकृति ही मेरे आभास से करती है। किन्तु इससे महान कल्प जो आत्मा को निर्मल स्वरूप प्रदान करता है, उसका श्रंगार महापुरूष करते हैं। वे अचेत भूतों को सचेत करते हैं। भजन का आदि ही इस कल्प का आरम्भ है और भजन की पराकाष्ठा कल्प का अन्त है। जब यह कल्प भवरोग से पूर्ण नीरोग बनाकर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश दिला देता है, उस प्रवेशकाल में योगी मेरी रहनी और मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। प्राप्ति के पश्चात् महापुष की रहनी ही उसकी प्रकृति है।
धर्मग्रन्थों में कथानक मिलते हैं कि चारों युग बीतने पर ही कल्प पूर्ण होता है, महाप्रलय होता है। प्राय: लोग इसे यथार्थ नहीं समझते। युग का अर्थ है दो। आप अलग हैं, आराध्य अलग है तब तक युगधर्म रहेंगे। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में इसकी चर्चा की है। जब तापसी गुण कार्य करते हैं, रजोगुण अल्प मात्रा में है, चारों और वैर-विरोध है, ऐसा व्यक्ति कलियुगीन है। वह भजन नहीं कर पाता, किन्तु साधन प्रारम्भ होने पर युग परितर्वतन हो जाता है। रजोगुण बढऩे लगता है, तमोगुण क्षीण हो चलता है, कुछ सत्त्वगुण भी स्वभाव में आ जाते हैं, हर्ष और भय की दुविधा लगी रहती है तो वही साधक द्वापर की अवस्था में आ जाता है। क्रमश: सत्त्वगुण का बाहुल्य होने पर रजोगुण स्वल्प रह जाता है, आराधना-कर्म में रति हो जाती है, ऐसे त्रेतायुग में त्याग की स्थितिवाला साधक अनेकों यज्ञ करता है। यज्ञानां जपयजोऽस्मि – यज्ञ- श्रेणीवाला जप, जिसका उतार-चढ़ाव श्वास प्रश्वास पर है, उसे करने की क्षमता रहती है। जब मात्र सत्त्वगुण शेष रहा, विषमता खो गयी, समता आ गयी, यह कृतयुग अर्थात कृतार्थ युग अथवा सत्ययुग का प्रभाव है। उस समय सब योगी विज्ञानी होते हैं, ईश्वर से मिलनेवाले होते हैं, स्वभाविक ध्यान पकडऩे की उनमें क्षमता रहती है।
विवेकीजन युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मन में समझते हैं। मन के निरोध के लिये अधर्म का परित्याग कर धर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। निरूद्ध मन का भी विलय हो जाने पर युगों के साथ-साथ कलप का भी अन्त हो जाता है। पूर्णता में प्रवेश दिलाकर कल्प भी शान्त हो जाता है। यही प्रलय है, जब प्रकृति पुरूष में विलीन हो जाती है। इसके पश्चात महापुरूष की जो रहनी है वही उसकी प्रकृति है, उसका स्वभाव है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। मुझ ईश्वरों के ईश्वर को भी तुच्छ समझते हैं, साधारण मनुष्य मानते हैं। प्रत्येक महापुरूष के साथ यह विडम्बना रही है कि तत्कालीन समाज ने उनकी उपेक्षा की, उनका डटकर विरोध हुआ। श्रीकृष्ण भी इसके अपवाद नहीं थे। वे कहते हैं-मैं परमभाव में स्थित हँू, किन्तु शरीर मेरा भी मनुष्य का ही है, अत: मूढ़ पुरूष मुझे तुच्छ कहकर, मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ आशावाले हैं, व्यर्थ कर्मवाले हैं, व्यर्थ ज्ञानवाले हैं कि कुछ भी करें और कह दें कि हम तो कामना नहीं करते, हो गये निष्काम कर्मयोगी। वे आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं परख पाते, किन्तु दैवी सम्पद् को प्राप्त जन अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मेरे गुणों का निरन्तर चिन्तन करते हैं।
अनन्य उपासना अर्थात यज्ञार्थ कर्म के दो ही मार्ग हैं। पहला है ज्ञानमार्ग अर्थात अपने भरोसे, अपनी शक्ति को समझकर उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होना और दूसरी विधि स्वामी सेवक भावना की है, जिसमें सद्गुरू के प्रति समर्पित होकर वही कर्म किया जाता है। इन्हीं दो दृष्टियों से लोग मुझ उपासते हैं, किन्तु उनके द्वारा जो पार लगता है वह यज्ञ, वह हवन, वह कत्र्ता, श्रद्धा और औषधि-जिससे भवरोग की चिकित्सा होत है, मैं ही हूं। अन्त में जो गति प्राप्त होती है, वह गति भी मैं ही हूं।