यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।

जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान। ठीक इसी प्रकार मैं आकाशवत् निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन नहीं कर पाते। प्रश्र पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता है? इस पर कहते हैं-

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सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।७।।

अर्जुन! कल्प के विलयकाल में सब भूत प्राणी मेरी प्रकृति अर्थात मेरे स्वभाव को प्राप्त होते हैं और कल्प के आदि में मैं उनको बार-बार विसृजामि – विशेष रूप से सृजन करता हँू। थे तो वे पहले से किन्तु विकृत थे, उन्हीं को रचता हँू, सजाता हँू। जो अचेत हैं उन्हें जागृत करता हूँ, कल्प के लिये प्रेरित करता हँू। कल्प का तात्पर्य है उत्थानोन्मुख परिवर्तन। आसुरी सम्पद् से निकलकर जैसे-जैसे पुरूष दैवी सम्पद् में प्रवेश पाता है, यहीं से कल्प का आरम्भ है और जब ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है, वहाँ कल्प का क्षय है। अपना कर्म पूरा करके कल्प भी विलीन हो जाता है, वहीं कल्प का क्षय है। अपना कर्म पूरा करके कल्प भी विलीन हो जाता है। भजन का आरम्भ कल्प का आदि है और भजन की पराकाष्ठा, जहाँ लक्ष्य विदित होता है, कल्प का अन्त है। जब यह क्षर आत्मा योनियों के कारणभूत राग-द्वेषादि से मुक्ति पाकर अपने शाश्वत स्वरूप में स्थिर हो जाय, इसी का श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह मेरी प्रकृति को प्राप्त होता है।
जो महापुरूष प्रकृति का विलय करके स्वरूप में प्रवेश पा गया, उसकी प्रकृति कैसी? क्या उसमें प्रकृति शेष ही है? नहीं, अध्याय ३/३३ में योगेश्वर श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि सभी प्राणी अपनी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। जैसा उनके ऊपर प्रकृति के गुणों का दबाव है, वैसा करते हैं और ज्ञानवानपि प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जानकारीवाला ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के सदृश चेष्टा करता है। वह पीछेवालों के कल्याण के लिय करता है। पूर्णज्ञानी तत्वस्थित महापुरूष की रहनी ही उसकी प्रकृति है। वह अपने इसी स्वभाव में बरतता है। कल्प के क्षय में लोग महापुरूष की इसी रहनी को प्राप्त होते हैं। महापुरूष के इसी कृतित्व पर पुन: प्रकाश डालते हैं-
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन:।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।।८।।

भूतसमुदाय को मैं बारम्बार विसृजामि विशेष रूप से सजाता हँू। उन्हें अपने स्वरूप की ओर बढऩे के लिये प्रेरित करता हँू। तब तो आप इस कर्म से बँधे हैं?-
न च मां तानि कर्माणि निबध्रन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।।९।।

अध्याय ४/९ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि महापुरूष की कार्य-प्रणाली अलौकिक है। अध्याय ९/४ में बताया – मैं अव्यक्त रूप से करता हँू। यहाँ भी वही कहते हैं- धनंजय! जिन कर्मों को मैं अदृश्य रूप से करता हँू, उनमें मेरी आसक्ति नहीं है। उदासीन के सदृश स्थित रहनेवाले मुझ परमात्म स्वरूप को वे कर्म नहीं बाँधते, क्योंकि कर्म के परिणाम में जो लक्ष्य मिलता है उसमें मैं स्थित हँू, इसलिये उन्हें करने के लिये मैं विवश नहीं हँू।
यह तो स्वभाव के साथ जुड़ी प्रकृति के कार्यो का प्रश्र था, महापुरूष की रहनी थी, उनकी रचना थी। अब मेरे अध्यास से जो माया रचती है, वह क्या है? वह भी एक कल्प है-
मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।१०।।

अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में अर्थात मेरी उपस्थिति में सर्वत्र व्याप्त मेरे अध्यास से यह माया चराचर सहित जगत का रचती है, जो क्षुद्र कल्प है और इसी कारण से यह संसार आवागमन के चक्र में घूमता रहता है। प्रकृति का यह क्षुद्र कल्प जिसमें काल का परिवर्तन है, मेरे अध्यास से प्रकृति ही करती है, मैं नहीं करता, किन्तु सातवें श£ोक में निर्दिष्ट कल्प आराधना का संचार एवं पूर्तिपर्यन्त मार्गदर्शनवाला कल्प महापुरूष स्वयं करते हैं। एक स्थान पर वे स्वयं कत्र्ता हैं, जहाँ वे विशेष रूप से सृजन करते हैं। यहाँ कत्र्ता प्रकृति है, जो केवल मेरे अध्यास से यह क्षणिक परिवर्तन करती हैं, जिसमें शरीरों का परितर्वतन, काल-परिवर्तन, युग-परिवर्तन इत्यादि आते हैं। ऐसा व्याप्त प्रभाव होने पर भी मूढ़लोग मुझ नहीं जानते। तथा-