अध्याय छ: तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग का क्रमबद्ध विश£ेषण किया, जिसका शुद्ध अर्थ है यज्ञ की प्रक्रिया। यज्ञ उस परम में प्रवेश दिला देनेवाली आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है, जिसमें चराचर जगत् हवन-सामग्री के रूप में है। मन के निरोध और निरूद्ध मन के भी विलयकाल में वह अमृत-तत्व विदित हो जाता है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उसको पान करनेवाला ज्ञानी है और वह सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। उस मिलन का नाम ही योग है। उस यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म कहलाता है। सातवें अध्याय में उन्होंने बताया कि इस कर्म को करनेवाले व्याप्त ब्रह्म, सम्पूर्ण कर्म, सम्पूर्ण अध्यात्म, सम्पूर्ण अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं। आठवें अध्याय में उन्होंने कहा कि यही परमगति है, यही परमधाम है।
प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वयं चर्चा की कि योगयुक्त पुरूष का ऐश्वर्य कैसा है? सबसें व्याप्त रहने पर भी वह कैसे निर्लेप है? करते हुए भी वह कैसे अकत्र्ता है? उस पुरूष के स्वभाव एवं प्रभाव पर प्रकाश डाला, योग को आचरण में ढालने पर आनेवाले देवतादिक विघ्नों से सतर्क किया और उस पुरूष की शरण होने पर बल दिया।

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श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा अर्जुन! असूया रहित तेरे लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहँूगा अर्थात प्राप्ति के पश्चात महापुरूष की रहनी के साथ कहँूगा कि कैसे वह महापुरूष सर्वत्र एक साथ कर्म करता है, कैसे वह जागृति प्रदान करता हे, रथी बनकर आत्मा के साथ कैसे सदैव रहता है? यत् ज्ञात्वा – जिसे साक्षात जानकार तू दु:खरूपी संसार से मुक्त हो जायेगा। वह ज्ञान कैसा है? इस पर कहते हैं-
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धम्र्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।२।।

विज्ञान से संयुक्त यह ज्ञान सभी विद्याओं का राज हैँ विद्या का अर्थ भाषा-ज्ञान अथवा शिक्षा नहीं हैं। विद्याा हि का ब्रह्मगति प्रदाया। सा विद्या या विमुक्तये। विद्या उसे कहते हैं कि जिसके पास आये, उसे उठाकर ब्रह्म-पथ पर चलाते हुए मोक्ष प्रदान कर दे। यदि रास्ते में ऋद्धियों-सिद्धियों अथवा प्रकृति में कहीं उलक्ष गया तो सिद्ध है कि अविद्या सफल हो गयी। वह विद्या नहीं है। यह राजविद्या ऐसी है, जो निश्चित कलयाण करनेवाली है। यह सभी गोपनीयों का राजा है। अविद्या और विद्या के अवगुण्ठन का अनावरण होने पर योगयुक्ता के पश्चात ही इससे मिलन होता है। यह अति पवित्र, उत्तम और प्रत्यक्ष फलवाला है। यह अन्धविश्वास नहीं है कि इस जन्म में साधन करो, फल कभी दूसरे जन्म में मिलेगा। यह परमधर्म परमात्मा से संयुक्त है। विज्ञानसहित यह ज्ञान करने में सरल और अविनाशी है।
अध्याय दो में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! इस योग में बीज का नाश नहीं होता। इसका थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान भय से उद्धार कर देता है। छठें अध्याय में अर्जुन ने पूछा-भगवन्! शिथिल प्रयत्नवाला साधक नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? श्रीकृष्ण्या ने बताया- अर्जुन! पहले तो कर्म समझना आवश्यक है और समझने के बाद थोड़ा भी साधन पार लग गया तो उसका किसी जन्म में कभी विनाश नहीं होता, बल्कि उस थोड़े से अभ्यास के प्रभाव से हर जन्म में वही करता है। अनेक जन्मों के परिणाम में वहीं पहँुच जाता है, जिसका नाम परमगति अर्थात परमात्मा है। उसी को योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ भी कहते हैं कि यह साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है, परन्तु इसके लिये श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
अश्रद्दधाना: पुरूषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवत्र्मनि।।३।।

परंतप अर्जुन! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरूष मुझे न प्राप्त होकर संसार-क्षेत्र में भ्रमण करता ही रहता है। अत: श्रद्धा अनिवार्य है। क्या आप संसार से परे हैं? इस पर कहते हैं-
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:।।४।।

मुझ अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत व्याप्त है अर्थात मैं जिस स्वरूप में स्थित हँू, वह सर्वत्र व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थान पाये हैं किनतु में उनमें स्थित नहीं हूँ, क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप में स्थित हँू। महापुरूष जिस अव्यक्त स्वरूप में स्थित हैं, वहीं से बात करते हैं। इसी क्रम में आगे कहते हैं-
न च मत्स्थानि भूतानि पश्च मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।।५।।

वस्तुत: सब भूत भी मुझमें स्थित नहीं हैं क्योंकि वे मरणधर्मा हें, प्रकृति के आश्रित हैं, किन्तु मेरी योगमाया के ऐश्वर्य को देख कि जीवधारियों को उत्पन्न और पोषण करनेवाला मेरा आत्मा भूतों में स्थित नहीं है। मैं आत्मास्वरूप हँू, इसलिये मैं उन भूतों में स्थित नहीं हँू। यही योग का प्रभाव है। इसको स्पष्ट करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण दृष्टान्त देते हैं-