यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशनित यद्यतयो वीतरागा:।
यदिच्छन्तो ब्रह्म चरन्ति
तत्ते पदं सङ्गहेण प्रवक्ष्ये।।११।।
वेदविद् अर्थात अविदित तत्त्व को प्रत्यक्ष जाननेवाले लोग जिस परमपद को अक्षरण- अक्षय कहते हैं, वीतराग महात्मा जिसमें प्रवेश के लिये यत्नशील रहते हैं, जिस परमपद को चाहनेवाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। जो हृदय में संग्रह करने योग्य है, धारण करने योग्य है उस पद को मैं तेरे लिये कहँगा। वह पद है क्या, कैसे पाया जाता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

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सर्दद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरूध्य च।
मूध्न्र्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।

सब इन्द्रियों के दरवाजों को रोककर अर्थात् वासनाओं से अलग रहकर, मन को हृदय में स्थित करके, प्राण अर्थात् अन्त:करण के व्यापार को मस्तिष्क में निरोधकर योग-धारण में स्थित होकर (योग को धारण किये रहना है, दूसरा तरीका नहीं है) –
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।१३।।

जो पुरूष ओम् इति – ओम इतना ही, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका जप तथा मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग कर जाता है, वह पुरूष परमगति को प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण एक योगेश्वर, परमतत्व में स्थित महापुरूष, सद्गुरू थे। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि ओम अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, तू इसका जप कर और ध्यान मेरा कर। प्राप्ति के हर महापुरूष का नाम वही होता है जिसे वह प्राप्त है, जिसमें वह विलय है इसलिये नाम ओम बताया और रूप अपना। योगेश्वर ने कृष्ण-कृष्ण जपने का निर्देश नहीं दिया लेकिन कालान्तर में भावुकों ने उनका भी नाम जपना आरम्भ कर दिया और अपनी श्रद्धा के अनुसार उसका फल भी पाते हैं, जैसा कि, मनुष्य की श्रद्धा जहाँ टिक जाती है वहाँ मैं ही उसकी श्रद्धा को पुष्ट करता तथा मैं ही फल का विधान भी करता हँू।
भगवान शिव ने राम शब्द के जपने पर बल दिया। रमन्ते योगिनो यस्मिन् स राम:। रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय। रा और म इन दो अक्षरों के अन्तराल में कबीर अपने मन को रोकने में सक्षम हो गये।
श्रीकृष्ण ओम् पर बल देते हैं। ओ अहं स ओम् अर्थात वह सत्ता मेरे भीतर है, कहीं बाहर न ढूँढऩे लगे। यह ओम भी उस परम सत्ता का परिचय देकर शान्त हो जाता है। वास्तव में उन प्रभु के अनन्त नाम है, किन्तु जब के लिये वही नाम सार्थक है जो छोटा हो, श्वास में ढल जाय और एक परमात्मा का ही बोध कराता हो। उससे भिन्न अनेक देवी-देवताओं की अविवेकपूर्ण कल्पना में उलझकर लक्ष्य से दृष्टि न हटा दें।
पूज्य महाराज जी कहा करते थे कि- मेरा रूप देखें और श्रद्धानुसार कोई भी दो-ढाई अक्षर का नाम – ऊँ, राम, शिव में से कोई एक लें, उसका चिन्तन करें और उसी के अर्थस्वरूप इष्ट के स्वरूप का ध्यान करें। ध्यान सद्गुरू का ही किया जाता है। आप राम, कृष्ण अथवा वीतराग विषयं वा चित्तम्। वीतराग महात्माओं अथवा यथाभिमतध्यानाद्वा। अभिमत अर्थात योग के अभिमत, अनुकूल किसी का भी स्वरूप पकड़ें, वे अनुभव में आपको मिलेंगे और आपके समकालीन किसी सद्गुरू की ओर बढ़ा देंगे, जिनके मार्गदर्शन से आप शनै:-शनै: प्रकृति के क्षेत्र से पार होते जायेंगे। मैं भी प्रारम्भ में एक देवता के चित्र का ध्यान करता था, किन्तु पूज्य महाराज जी के अनुभवी प्रवेश के साथ वह शान्त हो गया।
प्रारम्भिक साधक नाम तो जपते हैं, किन्तु महापुरूष के स्वरूप का ध्यान करने में हिचकते हैं। वे अपनी अर्जित मान्यताओं का पूर्वाग्रह छोड़ नहीं पाते। वे किसी अन्य देवता का ध्यान करते हैं, जिसका योगेश्वर श्रीकृष्ण ने निषेध किया है। अत: पूर्व समर्पण के साथ किसी अनुभवी महापुरूष की शरण लें। पुण्य-पुरूषार्थ सबल होते ही कुतर्कों का शमन और यथार्थ क्रिया में प्रवेश मिल जायेगा। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार इस प्रकार ऊँ के जप और परमात्मस्वरूप सद्गुरू के स्वरूप का निरन्तर स्मरण करने से मन का निरोध और विलय हो जाता है और उसी क्षण शरीर के सम्बन्ध का त्याग हो जाता है। केवल मरने से शरीर पीछा नहीं छोड़ता।
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:।।१४।।

मेरे अतिरिक्त और कोई चित्त में है ही नहीं। अन्य किसी का चिन्तन न करता हुआ अर्थात अनन्य चित्त से स्थिर हुआ जो अनवरत मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिये मैं सुलभ हँू। आपके सुलभ होने से क्या मिलेगा?-
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्रुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता।।१५।।

मुझे प्राप्त कर वे दु:खों के स्थानस्वरूप क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते, बल्कि परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं अर्थात मुझे प्राप्त होना अथवा परमसिद्धि को प्राप्त होना एक ही बात है। केवल भगवान ही ऐसे हैं, जिन्हें पाकर उस पुरूष का पुनर्जन्म नहीं होता। फिर पुनर्जन्म की सीमा कहाँ तक है?-