सातवें अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि पुण्यकर्म को करनेवाले योगी सम्पूर्ण पापों से छूटकर उस व्याप्त ब्रह्म को जानते हैं अर्थात कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो व्याप्त ब्रह्म की जानकारी दिलाता है। उस कर्म को करनेवाले व्याप्त ब्रह्म को, सम्पूर्ण कर्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं। अत: कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो इन सबसे परिचय कराता है। वे अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं। उनकी जानकारी कभी विस्मृत नहीं होती है।

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इस पर अर्जुन ने इस अध्याय के प्रारम्भ में ही उन्हीं शब्दों को दुहराते हुए प्रश्र रखा-
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरूषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।१।।

हे पुरूषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत तथा अधिदैव किसे कहा जाता है?
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि:।।२।।

हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे है? सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरूष है, जो मनुष्य शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले पुरूषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं? इन सातों प्रश्रों का क्रम से निर्णय देने के लिय योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित:।।३।।

अक्षरं ब्रह्म परमम् – जो अक्षय है, जिसका क्षय नहीं होता, वही परम ब्रह्म है। स्वभाव: अध्यात्मम् उच्यते – स्वयं में स्थिर भाव ही अध्यात्म अघ्र्थात आत्मा का आधिपत्य है। इससे पहले सभी माया के आधिपत्य में रहते हैं, किन्तु जब स्व – भाव अर्थात स्वरूप में स्थिरभाव मिल जाता है तो आत्मा का ही आधिपत्य उसमें प्रवाहित हो जाता है। यही अध्यात्म है, अध्यात्म की पराकाष्ठा है। भूतभावोद्भवकर: भूतों के वे भाव जो कुछ-न-कुछ उद्भव करते हैं अर्थात प्राणियों के वे संकल्प जो भले अथवा बुरे संस्कारों की संरचना करते हैं उनका विसर्ग अर्थात विसर्जन, उनका मिट जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। यही सम्पूर्ण कर्म है, जिसके लिये योगेश्वर ने कहा – सम्पूर्ण कर्म को जानता है। वहाँ कर्म पूर्ण है, आगे आवश्यकता नहीं है। इस अवस्था में जबकि भूतों के वे भाव जो कुछ न कुछ रचते हैं, भले अथवा बुरे संस्कार-संग्रह करते हैं, बनाते हैं, वे जब सर्वथा शान्त हो जायँ, यहीं कर्म की सम्पूर्णता है। इसके आगे कर्म करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अत: कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो भूतों के सम्पूर्ण संकल्पों को, जिनसे कुछ-न-कुछ संस्कार बनते हैं उनका शमनकर देती है। कर्म का अर्थ है चिन्तन, जो यज्ञ में है।
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरूषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।४।।

जब तक अक्षय भाव नहीं मिलता, तब तक नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण क्षर भाव अधिभूत अर्थात भूतों के अधिष्ठान हैं। वही भूतों की उत्पत्ति के कारण हैं। पुरूष: च अधिदैवतम् – प्रकृति से परे जो परम पुरूष है, वही अधिदैव अर्थात सम्पूर्ण देवों का अधिष्ठाता है। दैवी सम्पद् उसी परमदेव में विलीन हो जाती है। देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस मनुष्य तन में मैं ही अधियज्ञ हँू अर्थात यज्ञों का अधिष्ठाता हँू। अत: इसी शरीर में, अव्यक्त स्वरूप मे स्थित महापुरूष ही अधियज्ञ है। श्रीकृष्ण एक योगी थे। जो सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता है, अन्त में यज्ञ उसमें प्रवेश पा जाते हैं। वही परमस्वरूप मिल जाता है। इस प्रकार अर्जुन के छ: प्रश्रों का समाधान हुआ। अब अन्तिम प्रश्र कि अन्तकाल में कैसे आप जानने में आते हैं, जो कभी विस्मृत नहीं होते?
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्तवा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।।५।।

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते है कि जो पुरूष अन्तकाल में अर्थात मत के निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़ अलग हो जाता है, वह मद्भावम् – साक्षात मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है।
शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं है। मरने के बाद भी शरीरों का क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही मन का निरोध हो जाता है और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह क्रियात्मक है। केवल कहने से, वार्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह शरीर का परिवर्तन हो रहा है, तब तक शरीरों का अन्त कहाँ हुआ? मन के निरोध और निरूद्ध मन के भी विलयकाल में जीते जी शरीर के सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण भी पूर्ण न होते। उन्होंने कहा कि अनेक जन्मों के अभ्यास से प्राप्तिवाला ज्ञान साक्षात मेरा स्वरूप है। उन्होंने कहा कि अनेक जन्मों के अभ्यास से प्राप्तिवाला ज्ञानी साक्षात मेरा स्वरूप है। मैं वह हँू और वह मुझमें है। लेशमात्र भी उसमें और मुझमें अन्तर नहीं है। यह जीते जी प्राप्ति है। जब फिर कभी शरीर न मिले, वही शरीरों का अन्त है।
यह तो वास्तविक शरीरान्त का चित्रण हुआ, जिसके पश्चात जन्म नहीं लेना पड़ता है। दूसरा शरीरान्त मृत्यु है, जो लोक प्रचलित है, किन्तु इस शरीरान्त के पश्चात पुन: जन्म लेना पड़ता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भवभावित:।।६।।

कौन्तेय! मृत्यु के समय मनुष्य जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है। तब तो बड़ा सस्ता सौदा है, आजीवन मौज करें और मरने लगें तो भगवान का स्मरण कर लेंगे। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं- ऐसा होता नहीं, सदा तद्भावभावित: उस ही भाव का चिन्तन कर पाता है, जैसा जीवन भर किया है। वही विचार बरबस आ जाता है जिसका जीवन भर अभ्यास किया गया है, अन्यथा नहीं हो पाता। अत:
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।७।।

इसलिये अर्जुन! तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। मुझमें अर्पित मन और बुद्धि से युक्त होकर तू नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होगा। निरन्तर चिन्तन और युद्ध एक साथ कैसे सम्भव है? हो सकता है कि निरन्तर चिन्तन और युद्ध का यही स्वरूप हो कि जय कन्हैयालाल की, जय भगवान की कहते रहें और बाण चलाते रहें। किन्तु स्मरण का स्वरूप अगले श£ोक में स्पष्ट करते हुए योगेश्वर कहते हैं-
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरूषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।८।।

हे पार्थ! उस स्मरण के लिये योग के अभ्यास से युक्त हुआ मेरे सिवाय दूसरी ओर न जानेवाली चित्त से निरनतर चिन्तन करनेवाला परम प्रकाशस्वरूप दिव्यपुरूष अर्थात परमात्मा को प्राप्त होता है। मान लीजिये कि यह पेन्सिल भगवान है, तो इसके सिवाय अन्य किसी वस्तु का स्मरण नहीं आना चाहिये। इसके अगल बगल आपको पुस्तक, दिखायी पड़ती है या अन्य कुछ भी, तो आपका स्मरण खण्डित हो गया। स्मरण जब इतना सूक्ष्म है कि इष्ट के अतिरिक्त दूसरी वस्तु का स्मरण भी न हो, मन में तरंगें भी न आयें, तो स्मरण और युद्ध दोनों एक साथ कैसे होंगे? वस्तुत: जब आप चित्त को सब ओर से समेटकर अपने एक आराध्य के स्मरण में प्रवृत्त होंगे तो उस समय मायिक प्रवृत्तियाँ काम-क्रोध, राग-द्वेष बाधा के रूप में सामने प्रकट ही हैं। आप स्मरण करेंगे, किन्तु वे आपके अन्दर उद्वेग पैदा करेंगी, आपका मन स्मरण से चलायमान करना चाहेंगी। उन ब्राह्म प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। निरन्तर चिन्तन के साथ ही युद्ध सम्भव है। गीता का एक भी श£ोक ब्राह्य मारकाट का समर्थन नहीं करता। चिन्तन किसका करें? इस पर कहते हैं-
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य:।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।।९।।

उस युद्ध के साथ वह पुरूष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले किन्तु अचिन्त्य, नित्य प्रकाशस्वरूप और अविद्या से परे उस परमात्मा का स्मरण करता है। पीछे बताया- मेरा चिन्तन करता है, यहाँ कहते हैं- परमात्मा का। अत: उस परमात्मा के चिन्तन का माध्यम तत्त्वस्थित महापुरूष है। इसी क्रम में –
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरूषमुपैति दिव्यम्।।१०।।

जो निरन्तर उस परमात्मा का स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरूष प्रयाणकाले – मन के विलीन अवस्थाकाल में योगबल से अर्थात उसी नियत कर्म के आचरण द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राण को भली प्रकार स्थापित करके वह अचल मन अर्थात स्थिर बुद्धिवाला पुरूष उस दिव्यपुरूष परमात्मा को प्राप्त होता है। सतत स्मरणीय है कि उसी एक परमात्मा की प्राप्ति का विधान योग है। उसके लिये नियत क्रिया का आचरण ही योगक्रिया है, जिसका सविस्तार वर्णन योगेश्वर ने चौथे-छठें अध्याय में किया है। अभी उन्होंने कहा- निरन्तर मेरा ही स्मरण कर। कैसे करे? तो इसी योगी-धारणा में स्थिर रहते हुए करना है। ऐसा करनेवाला दिव्यपुरूष को ही प्राप्त होता है, जो कभी विस्मृत नहीं होता। यहाँ इस प्रश्र का समाधान हुआ कि आप प्रयाणकाल में किस प्रकार जानने में आते हैं? पाने योग्य पद का चित्रण देखें, जो गीता में स्थान-स्थान पर आया है-