अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्दवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।२३।।

परन्तु उन अल्पबुद्धिवालों का वह फ नाशवान है। आज फल है तो भोगते-भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान है। देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं अर्थात देवता भी नाशवान हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है, जो अव्यक्त है, नैष्ठिकीं परमशान्ति पाता है।

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अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग देवताओं अर्थात दैवी सम्पद की उन्नति करो। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, वहीं तुम्हारी उन्नति है। क्रमश: उन्नति करते-करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है।
देवता हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित करानेवाले सदगुणों का नाम है। तो यह अन्दर की वस्तु: किन्तु कालान्तर में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं, कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस पर भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श£ाकों में किया। गीता में पहली बार अन्य देवताओं का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हँू और मैं ही वहाँ फल भी देता हँू। वह फ भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं, देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही अयुक्तिसंग है।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।

यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, जो फल मिलता है वह भी नाशवान है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नही करते, क्योंकि बुद्धिहीन पुरूष मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये वे मुझ अव्यक्त पुरूष को व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। अर्थात श्रीकृष्ण भी मनुष्य शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर थे। जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के सही दौर में पड़कर क्रमश: उत्थान होते-होते महापुरूष भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं, फिर भी कामाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरूष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें-
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।२५।।

सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा सर्वथा छिपा है। योग साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात योगमाया अर्थात योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान करते-करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हँू। केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सबके लिये प्रत्यक्ष नहीं हँू इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित, अविनाशी, अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानता। अर्जुन श्रीकृष्ण को अपनी ही तरह मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने लगा, प्रार्थना करते लगा। वस्तुत: अव्यक्तस्थित महापुरूष को पहचानने में हमलोग प्राय: अन्धे ही हैं। आगे कहते हैं-
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।

अर्जुन! मैं अतीत, वर्तमान और भविष्य में होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियों को जानता हँू, परन्तु मुझे कोई नहीं जानता। क्यों नहीं जान पाता?
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

भरतवंशी अर्जुन! इच्छा और द्वेष अर्थात राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान पाते। तो क्या कोई जानेगा ही नहीं? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:।।२८।।

परन्तु पुण्यकर्म करने वालो जिन भक्तों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से भली प्रकार मुक्त होकर, व्रत से दृढ़ रहकर मुझे भजते हैं। किसलिये भजते हैं?
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।२९।।

जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिये प्रयत्न करते हैं, वे पुरूष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते है। और उसी क्रम में-
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:।।३०।।

जो पुरूष अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, मुझमें समाहित चित्तवाले वे पुरूष अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं, मुझमें ही स्थिर रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें-सत्ताइसवें श£ोक में उन्होंने कहा मुझे कोई नहीं जानता, क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे सम्पूर्ण ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म, सम्पूर्ण कर्म, सम्पूर्ण अधिभूत, सम्पूर्ण अधिदैव और सम्पूर्ण अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं, अर्थात इन सबका परिणाम मैं हँू। वहीं मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता।
निष्कर्ष – इस सातवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अनन्य भाव से मुझमें समर्पित होकर, मेरे आश्रित होकर जो योग में लगता है वह समग्र रूप से मुझे जानता है। मुझे जानने के लिये हजारों में कोई विरला ही प्रयत्न करता है और प्रयत्न करनेवालों में विरला ही कोई जानता है। वह मुझे पिण्डरूप में एकदेशीय नहीं वरन सर्वत्र व्याप्त देखता है। आठ भेदोंवाली मेरी जड़ प्रकृति है और इसके अन्तराल में जीवरूप मेरी चेतन प्रकृति है। इन्हीं दोनों के संयोग से पूरा जगत खड़ा है। तेज और बल मेरे ही द्वारा हैं। राग और काम से रहित बल तथा धर्मानुकूल कामना भी मैं ही हँू। जैसा कि सब कामनाएँ तो वर्जित हैं, लेकिन मेरी प्राप्ति के लिये कामना कर। ऐसी इच्छा का अभ्युदय होना मेरा ही प्रसाद है। केवल परमात्मा को पाने की कामना ही धर्मानुकूल कामना है।
श्रीकृष्ण ने बताया कि मैं तीनों गुणों अतीत हँू। परम का स्पर्श करके परमभाव में स्थित हँू, किन्तु भोगासक्त मूढ़ पुरूष सीधे मुझे न भजकर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, जबकि वहाँ देवता नाम का कोई है ही नहीं। पत्थर, पानी, पेड़ जिसको भी वे पूजना चाहते हैं, उसी में उनकी श्रद्ध को मैं ही पुष्ट करता हँू। उसकी आड़ में खड़ा होकर मैं ही फल देता हँू, क्योंकि न वहाँ कोई देवता है, न किसी देवता के पास कोई भोग ही है। लोग मुझे साधारण व्यक्ति समझकर नहीं नहीं भजते, क्योंकि मैं योग-प्रक्रिया द्वारा ढँका हुआ हँू। अनुष्ठान करते-करते योगमाया का आवरण पार करनेवाले ही मुझ शरीरधारी को भी अव्यक्त रूप में जानते हैं, अन्य स्थितियों में नहीं।
मेरे भक्त चार प्रकार के हैं- अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। चिन्तन करते-करते अनेक जन्मों के अन्तिम जन्म में प्राप्तिवाला ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है अर्थात अनेक जन्मों से चिन्तन करके उस भगवत्स्वरूप को प्राप्त किया जाता है। राग-द्वेष के मोह से आक्रान्त मनुष्य मुझे कदापि नही जान सकते, किन्तु राग-द्वेष के मोह से रहित होकर जो नियतकर्म का चिन्तन करते हुए जरा-मरण से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे पुरूष सम्पूर्ण रूप से मुझ जान लेते हैं। वे सम्पूर्ण ब्रहा्र को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिभूत को, सम्पूर्ण अधिदैव को, सम्पूर्ण कर्म को और सम्पूर्ण यज्ञ के सहित मुझे जानते हैं। वे मुझमें प्रवेश करते हैं और अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं अर्थात फिर कभी वे विस्मृत नहीं होते।
इस अध्याय में परमात्मा की समग्र जानकारी का विवेचन हैं, अत:-
ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे समग्रबोध: नाम सप्तमोऽध्याय:।।७।।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में समग्र जानकारी नाम सातवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअडग़ड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीताया: यथार्थगीता भाष्ये समग्रबोध: नाम सप्तमोऽध्याय:।।७।।

इस प्रकार श्रीमत परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अडग़ड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य यथार्थ गीता में समग्र जानकारी नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरि: ऊँ तस्सत् ।।