ब्राह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।२१।।

बाहर संसार के विषय-भोगों में अनासक्त पुरूष अन्तरात्मा में स्थित जो सुख है, उस सुख को प्राप्त होता है। वह पुरूष ब्रह्मयोगयुक्तात्मा – परब्रह्म परमात्मा के साथ मिलन से युक्त आत्मावाला है इसलिये अक्षय आनन्द का अनुभव करता है, जिस आनन्द का कभी क्षय नहीं होता। इस आनन्द का उपभोग कौन कर सकता है? जो बाहर के विषय-भोगों में अनासक्त है। तो क्या भोग बाधक हैं? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

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ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:।।२२।।

केवल त्वचा ही नहीं, सभी इन्द्रियाँ स्पर्श करती हैं। देखना आँख का स्पर्श हैं, सुनना कान का स्पर्श है। इसी प्रकार इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सभी भोग यद्यपि भोगने में प्रिय प्रतीत होते हैं, किन्तु नि:सन्देह वे सब दु:खयोनय – दु:खद योनियों के ही कारण हैं। वे भोग की योनियों के कारण हैं। इतना ही नहीं, वे भोग पैदा होने और मिटनेवाले हैं, नाशवान हैं। इसलिये कौन्तेय! विवेकी पुरूष उनमें नहीं फंसते। इन्द्रियों के इन स्पर्शों में रहता क्या है? काम और क्रोध, राग और द्वेष। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
शक्रोतीहैव य: सोढुं प्राक्षरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:।।२३।।

इसलिये जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्त्पन्न हुए वेग को सहन करने में सक्षम हैं, वह नर है। वहीं इस लोक में योग से युक्त है और वही सुखी है। जिसके पीछे दुख नहीं है, उस सुख में अर्थात परमात्मा में स्थितिवाला है। जीते जी ही इसकी प्राप्ति का विधान है, मरने पर नहीं। सन्त कबीर ने इसी को स्पष्ट किया- अवधू! जीवत में कर आसा। तो क्या करने के बाद मुक्ति नहीं होती? वे कहते हैं- मुए मुक्ति गुरू कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा। यही योगेश्वर श्रीकृष्ण का कथन है कि शरीर रहते, मरने से पहले ही जो काम, क्रोध के वेग को मिटा देने में सक्षम हो गया, वही पुरूष इस लोक में योगी है, वहीं सुखी है। काम, क्रोध, बाह्य स्पर्श ही शत्रु हैं। इन्हें आप जीतें। इसी पुरूष के लक्षण पुन: बता रहे हैं-
योड्न्त: सुखोड्न्तरारामस्तथान्तज्र्योतिरेव य:।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोडधिगच्छति।।२४।।

जो अन्तरात्मा में ही सुखवाला, अन्तराराम:- अन्तरात्मा में ही आरामवाला तथा जो अन्तरात्मा में ही प्रकाशवाला है, वहीं योगी ब्रह्मभूत: ब्रह्म के साथ एक होकर ब्रह्मनिर्वाणम् – वाणी से परे ब्रह्म, शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होता है। अर्थात पहले विकारों का अन्त, फिर दर्शन, फिर प्रवेश। आगे देखें-
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।
छिन्द्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:।।२५।।

परमात्मा का साक्षात्कार करके जिनका पाप नष्ट हो गया है, जिनकी दुविधाएँ नष्ट हो गयी हैं, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में जो लगे हुए हैं। जो स्वयं गड्ढे में पड़ा है, वह दूसरों को क्या बाहर निकालेगा? इसीलिये करूणा महापुरूष का स्वाभाविक गुण हो जाता है तथा यतात्मान: जितेन्द्रिय ब्रह्मवेत्ता पुरूष शान्त परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उसी महापुरूष की स्थिति पर पुन: प्रकाश डालते हैं-
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।२६।।

काम और क्रोध से रहित, जीत हुए चित्तवाले, परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरूषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म ही प्राप्त है। बार-बार योगेश्वर श्रीकृष्ण उस पुरूष की रहनी पर बल दे रहे हैं, जिससे प्रेरणा मिले। प्रश्र लगभग पूर्ण हुआ। अब वे पुन: बल देते हैं कि इस स्थिति को प्राप्त करने का आवश्यक अंग श्वास-प्रश्वास का चिन्तन हैं। यज्ञ की प्रक्रिया में प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण और अपान दोनों की गति का निरोध उन्होंने बताया है, उसी को समझा रहे हैं-
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो:।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासा यन्तरचारिणौ।।२७।।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण:।
विगतेच्छज्ञभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स:।।२८।।

अर्जुन! बाहर के विषयों, दृश्यों का चिन्तन न करते हुए, उन्हें त्यागकर, नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थिर करके, भ्रुवो: अन्तरे का ऐसा अर्थ नहीं कि आँखों के बीच या भौंह के बीच कहीं देखने की भावना से दृष्टि लगायें। भृकुटी के बीच का शुद्ध अर्थ इतना ही है कि सीधे बैठने पर दृष्टि भृकुटी के ठीक मध्य से सीधे आगे पड़े। दाहिने-बायें, इधर-उधर चकपक न देखें। नाक की डाँड़ी पर सीधी दृष्टि रखते हुए नासिका के अन्दर विचरण करने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके अर्थात दृष्टि तो वहाँ स्थिर करें और सुरत को श्वास में लगा दें कि कब श्वास भीतर गयी? कितना रूकी? कब श्वास बाहर निकली? कितने देर तक बाहर रही? कहने की आवश्यकता नहीं कि श्वास में उठनेवाली नामध्वनि सुनायी पड़ती रहेगी। इस प्रकार श्वास प्रश्वास पर जब सुरत टिक जायेगी। न भीतर से संकल्प उठेंगे और न ब्राह्म संकल्प अन्दर टकराव कर पायेंगे। बाहर के भोगों का चिन्तन तो बाहर ही त्याग दिया गया था, भीतर भी संकल्प नहीं जाग्रत होंगे। सुरत एकदम खड़ी हो जाती है तैलधारावत। तेल की धारा पानी की तरह टप-टप नहीं गिरती, जब तक गिरेगी धारा ही गिरेगा। इसी प्रकार प्राण और अपान की गति एकदम सम, स्थिर करके इन्द्रियों, मन और बुद्धि को जिसने जी लिया है, इच्छा, भय और क्रोध से रहित, मननशीलता की चरम सीमा पर पहँुचा हुआ मोक्षपरायण मुनि सदा मुक्त ही है। मुक्त होकर वह कहाँ जाता है? क्या पाता है? इस पर कहते हैं-
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।।

वह मुक्त पुरूष मुझे यज्ञ और तपों का भोगनेवाला, सम्पूर्ण लोगों के ईश्वरों का ही ईश्वर, सम्पूर्ण प्राणियों का स्वार्थरहित हितैषी, ऐसा साक्षात जानकार शान्ति को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उस पुरूष के श्वास प्रश्वास के यज्ञ और तक का भोक्ता मैं हूँ। यज्ञ और तप अन्त में जिसमें विलय होते हैं, वह मैं हूं। वह मुझे प्राप्त होता है। यज्ञ के अन्त में जिसका नाम शान्ति है, वह मेरा ही स्वरूप है। वह मुक्त पुरूष मुझे जानता है और जानते ही मुझे प्राप्त हो जाता है। इसी का नाम शान्ति है। जैसे मैं ईश्वरों का भी ईश्वर हूं, वैसे ही वह भी है।

निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कभी तो आप निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं और कभी आप संन्यास मार्ग से कर्म करने की प्रशंसा करते हैं, अत: दोनों में एक को, जो आपका सुनिश्चित किया हो, परमकल्याणकारी हो, उसे कहिये। श्रीकृष्ण ने बताया-अर्जुन! परमकल्याण तो दोनों में है। दोनों में वही निर्धारित यज्ञ की क्रिया ही की जाती है, फिर भी निष्काम कर्मयोग विशेष है। बिना इसे किये संन्यास नहीं होता। संन्यास मार्ग नहीं, मंजिल का नाम है। योगयुक्त ही संन्यासी है। योगयुक्त के लक्षण बताये कि वहीं प्रभु है। वह न करता है, न कुछ कराता है, बल्कि स्वभाव में प्रकृति के दबाव के अनुरूप लोग व्यस्त हैं। जो साक्षात मुझे जान लेता है वही ज्ञाता है, वही पण्डित है। यज्ञ के परिणाम में लोग मुझ जानते हैं। श्वास प्रश्वास का जप और यज्ञ तप जिसमें विलय होते हैं, मैं ही हूं। यज्ञ के परिणामस्वरूप मेरे को जानकर वे जिस शान्ति को प्राप्त होते हैं, वह भी मैं ही हूं अर्थात श्रीकृष्ण जैसा, महापुरूष जैसा स्वरूप उस प्राप्तिवाले को भी मिलता है। वह भी ईश्वरों का ईश्वर, आत्मा का भी आत्मस्वरूपमय हो जाता है, उस परमात्मा के साथ एकीभाव पा लेता है। इस अध्याय में स्पष्ट किया कि यज्ञ तपों का भोक्ता, महापुरूषों के भी अन्तर रहनेवाली शक्ति महेश्वर है, अत:-
ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनस वादे यज्ञभोक्तामहापुरूषस्थमहेश्वर: नाम पंचमोड्ध्याय:।।५।।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के स वाद में यज्ञभोक्ता महापुरूषस्थ महेश्वर नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअडग़ड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्रीताया: यथार्थगीता भाष्ये
यज्ञभोक्तामहापुरूषस्थमहेश्वर: नाम पंचमोड्ध्याय:।।५।।

इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अडग़ड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्रीता के भाष्य यथार्थ गीता में यज्ञभोक्ता महापुरूषस्थ महेश्वर नाम पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।।हरि: ऊँ तत्सत्।।