Marudhar Desk: केंद्र की मोदी सरकार द्वारा नीलामी प्रक्रिया में बदलाव करने के चलते गरीबों के लिए आवंटित कई टन दाल के जरिये मिल मालिकों की झोली भरी गई है। नीलामी दस्तावेजों की जांच से पता चलता है कि सरकारी खरीद एजेंसी नेफेड, जो कि कल्याणकारी योजनाओं के तहत कच्ची दालों को संसाधित करने के लिए मिल मालिकों को चुनती है, उसने साल 2018 से लेकर अब तक एक हजार से अधिक बार नीलामी की है, लेकिन इसमें बेस रेट/बेस प्राइस या न्यूनतम बोली सीमा तय नहीं की गई थी, जिसके चलते मिल मालिकों को अपना लाभ छिपाने का मौका मिला है। सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध दस्तावेजों और सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त जानकारी से पता चलता है कि इन बोलियों के चलते मिल मालिकों को पिछले चार सालों में 5.4 लाख टन कच्ची दाल को संसाधित (प्रोसेस) करने के लिए कम से कम 4,600 करोड़ रुपये का लाभ मिला है, इसके कारण सरकारी खजाने पर प्रभाव पड़ा और संभवत: दाल की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं रही है। ये दालें देश भर में कल्याणकारी योजनाओं और रक्षा सेवाओं के लाभार्थियों के लिए थीं। बोली प्रक्रिया की इन खामियों का पता तब चला जब कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएमजीकेएवाई )के तहत वितरित की जा रही दाल की गुणवत्ता को लेकर कई राज्यों ने केंद्र सरकार से शिकायत की थी। कुछ राज्यों ने इन दालों को लेने से भी इनकार कर दिया था क्योंकि वे खाने के लिए ठीक नहीं थीं। सरकार अब इस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर रही है। कई सरकारी अधिकारियों ने सूत्रों को बताया कि आंतरिक रूप से सरकार ने इन संदिग्ध नीलामियों की समीक्षा के लिए कहा है, इस कदम को उन्होंने ‘सुधार का नाम दिया है। सरकार के प्रमुख शोध संस्थान सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ पोस्ट-हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीएचईटी) ने भी नीलामी पर सरकार को एक रिपोर्ट भेजी है। सीआईपीएचईटी (CIPHET) के निदेशक नचिकेत कोतवालीवाले ने कहा, ‘हमने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें सिफारिश की गई है कि नेफेड को दालों की खरीद, भंडारण और प्रसंस्करण कैसे करना चाहिए।

पूरे घोटाले की रिपोर्ट के बाद गठित हुई अंतर एजेंसी समिति
रिपोर्ट ने सरकार को इस बात की समीक्षा करने के लिए एक अंतर-एजेंसी समिति का गठन करने के लिए मजबूर किया है कि कैसे लाखों टन दालों की खरीद, भंडारण और मिलिंग (कच्ची दाल की सफाई) नेफेड द्वारा की जाती है, एक ऐसा व्यवसाय जिसमें करदाता को हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। यह समिति अब तक तीन बार बैठक कर चुकी है, लेकिन अभी तक अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप नहीं दिया है, जबकि नेफेड दालों की खरीद और मिलिंग के एक और साल के लिए तैयार है।

किसानों और गरीबों के भले के नाम पर हो गई पूरी लूट
जानकारी के अनुासर दाल मिल मालिकों को लाभ पहुंचाने वाली नई नीलामी प्रक्रिया किसानों और गरीबों के नाम पर लाई गई थी। साल 2015 में जब मटर और दालों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत को ‘झटकों का सामना करना पड़ा, तो नेफेड को इसकी खरीद की जिम्मेदारी दी गई। नेफेड ने किसानों को अत्यधिक दलहन उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया और उनसे वादा किया कि वह उनकी उपज को खरीदेगा। जब दाल का स्टॉक नेफेड के पास बढ़ता गया तो उसने साल 2017 में ये प्रस्ताव रखा कि कल्याणकारी योजनाओं के तहत कम कीमत पर ये दालें राज्यों को दी जाएंगी। नफेड और केंद्र सरकार ने फैसला किया कि वे कच्ची दालों को ‘खाने के लिए उपयुक्तझ् करवाकर राज्य सरकारों को पहुंचाएंगे। उस समय नेफेड के पास मिलिंग शुल्क के आधार पर दाल मिलिंग नीलामी की एक पारदर्शी व्यवस्था थी, जिसके माध्यम से सरकार को न्यूनतम संभावित कीमत पर दालों को संसाधित करने के लिए मिल मालिक मिल जाते थे।

पूरी नीलामी प्रक्रिया को बदलकर खोल दी फजीर्वाड़े की राह
मान लीजिए की सरकार 10 किलो कच्ची उड़द को 70 किलो दाल में परिवर्तित करना चाहती है, तो मिल मालिकों को दालों की भूसी हटाने, दाल को पॉलिश करने उसकी पैकिंग और परिवहन की लागत की गणना करके और उसमें अपना लाभ जोडकर एक मूल्य सरकार के सामने पेश करना होता था। इसमें से जिस मिल मालिक का न्यूनतम मूल्य होता था, उसे सरकार बोली विजेता घोषित कर देती थी। लेकिन केंद्र सरकार की एजेंसी नेफेड ने इस आसान बोली प्रक्रिया को बदलकर जटिल और मिल मालिकों के लिए लाभकारी बना दिया। अब बोली लगाने वालों को दलहन की उपज को संसाधित कर दाल बनाने और उसे निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचाने के लिए न्यूनतम संभावित मूल्य नहीं बताना होता बल्कि इसकी जगह पर उन्होंने उच्चतम संभव आउट-टर्न अनुपात या ओटीआर बताना होता है। ओटीआर का मतलब है कि मिल मालिक कच्चे माल की तुलना में कितना अंतिम प्रोडक्ट दे सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो एक क्विंटल चना, अरहर, उड़द इत्यादि दलहन की तुलना में वे कितनी दाल निकाल सकते हैं। इस प्रकार जो मिल मालिक सबसे ज्यादा दाल या ओटीआर देने का वादा करते हैं, उन्हें बोली विजेता घोषित किया जाता है।

इस प्रक्रिया में मिल मालिकों की जेब में करदाताओं के रुपए
हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में नेफेड ओटीआर की न्यूनतम सीमा घोषित नहीं करता है, नतीजन मिल मालिकों को लाभ होता है और करदाताओं को झटका लगता है। इस अनुपात में महज एक फीसदी का अंतर होने पर सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान होने की संभावना रहती है। दाल मिलिंग के कारोबार में ओटीआर की न्यूनतम सीमा तय करना नई बात नहीं थी। गुटबंदी और अवमूल्यन (कम मूल्य) से बचने के लिए राज्य इसे सुरक्षा उपाय के रूप में अपनाते रहे हैं। राष्ट्रीय आॅडिटर नियंत्रकर एवं महालेखा परीक्षक ने भी साल 2015 में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि नीलामी के लिए ओटीआर प्रक्रिया को अपनाने के चलते चावल मिल मालिकों को अत्यधिक मुनाफा हुआ है। कम ओटीआर के चलते मिल मालिक बाकी बचे चावल को अलग से बेच लेते हैं, जिसके कारण सरकार को करीब 2,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।

कैग रिपोर्ट ने किया पूरी ओटीआर प्रक्रिया का पदार्फाश
इस नीलामी पद्धति को साल 2020 में केंद्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष भी लाया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि नीलामी से 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ और पूरी तरह से आॅडिट की मांग की गई थी। लेकिन इस शिकायत पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यहां पर ये सवाल उठता है कि ओटीआर नीलामी प्रक्रिया के तहत जब नेफेड और मिल मालिकों के बीच पैसे का कोई लेन-देन नहीं होता है, तो मिल मालिकों को कैसे फायदा हुआ? इसका जवाब यह है, चूंकि नेफेड इस नीलामी प्रक्रिया के तहत ओटीआई की न्यूनतम सीमा तय नहीं करता है, इसलिए मिल मालिक जितनी दाल निकलने की संभावना रहती है, उससे कम पर बोली लगाते हैं. इस तरह जो अतिरिक्त दाल बचती है उसे वे बाजार में बेचकर अतिरिक्त लाभ कमाते हैं।

आरटीआई का जवाब नहीं देने के लिए हाईकोर्ट के आदेश का सहारा
यह जानने के लिए कि नेफेड ने किस आधार पर ओटीआर बोली विजेताओं को चुना था, आरटीआई आवेदन दायर किए गए थे, लेकिन एजेंसी ने हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए जवाब देने से इनकार कर दिया। कोर्ट का यह आदेश एजेंसी को सूचना मुहैया कराने से छूट प्रदान करता है। पीएमजीकेएवाई के तहत खराब गुणवत्ता वाली दालों की आपूर्ति होने की खबरों के मद्देनजर मिलिंग नीलामी की समीक्षा शुरू की गई थी। इन शिकायतों को नए नीलामी नियमों से जोडकर देखा जा सकता है, जिसने मिल मालिकों को अतिरिक्त लाभ देने का काम किया है। जब सरकारें कल्याणकारी योजनाओं के तहत अनाज का वितरण करती हैं, तो लाभार्थियों तक पहुंचने वाले अनाज को किसानों से खरीदे गए उसी स्टॉक का माना जाता है। लेकिन बदले हुए नीलामी नियम मिल मालिकों को खुले बाजार से देश की खराब दालों की आपूर्ति करने और सरकार द्वारा प्राप्त स्टॉक को अपने व्यावसायिक उपयोग के लिए रखने की अनुमति देते हैं।