मरूधरा सूबे में इन दिनों सियासी बाड़ाबंदी की चर्चाएं चल रही है। असम से कई विधायकों को पिंकसिटी के फेयरमाउंट होटल में ठहराया गया है। सियासी बाड़ाबंदी के इतर यहां जुबानी बाड़ाबंदी की भी जुगलबंदी हो रही है। विधानसभा की तीन सीटों के उप चुनाव नजदीक होने से जुबानी बाड़ाबंदी का जमकर ट्रेंड चल रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा की ओर से उनके निवास पर आए शिक्षकों को नसीहत देने और नाथी का बाड़ा समझने की धमकी देने का पिछले दो दिनों से वीडियो वायरल हो गया जो सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हुआ। वहीं भाजपा नेता राजेन्द्र राठौड़ की ओर से ‘खाला का बाड़ा’ कहे जाने का वीडियो भी वायरल हो रहा है। आखिर कौन थी नाथी, कहां है नाथी का बाड़ा और कौन-कौन इसमें जा सकता है इस तरह के प्रश्न भी सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा किए जा रहे है। वहीं दूसरी और खाला का बाड़ा के संबंध में भी लोगों द्वारा तरह-तरह के सवाल किए जा रहे है कि कौन है खाला, कहां है खाला का बाड़ा और क्यों प्रसिद्ध है यह बाड़ा आदि सवाल सोशल मीडिया पर छाए हुए है। मरूधरा में उच्च आदर्शों की सियासत करने वाले सियासत के सिपहसालार आखिर इस तरह की जुबानी जंग में उतर गए है कि नैतिकता, विकास और उच्च आदर्शों को तिलांजलि दे बैठे है। मरूधरा सूबा आज भी बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक पिछड़ेपन सहित रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य को लेकर जूझ रहा है। मुल्क में कई सूबे आज विकसित सूबे बन चुके है जिनमें प्रमुख रूप से पंजाब, हरियाणा, गुजरात सहित कई अन्य सूबे शुमार किए जाते है। मरूधरा सूबे की पहचान पूरे मुल्क में संजीदा, भाईचारे, मेहमानवाजी आदि की होने के बावजूद सियासत के सिपहसालार बेतुकी बातों पर उतर आए है। इस तरह के बयान देने वाले गोविंद सिंह डोटासरा और राजेन्द्र राठौड़ क्या कभी नाथी और खाला के बाड़े में गए है। इनको यह भी पता नहीं होगा कि नाथी और खाला का बाड़ा कहां है और क्यों उनका नाम लिया जाता है। फिलहाल चुनावी चौसर बिछी हुई होने के कारण यह मामला गर्म है। यदि चुनाव का समय नहीं होता तो यह बयान कोई मायने नहीं रखता। हालांकि गोविंद सिंह डोटासरा ने शिक्षकों से जो शब्द कहे है कि आपने नाथी का बाड़ा समझ लिया क्या ? इसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। जब बच्चों की पढ़ाई का समय हो, जिन गुरूओं पर भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी हो, कोरोना की दूसरी लहर का खौफ मंडरा रहा हो ऐसे समय में ‘मास्साबों’ को भी सोचना चाहिए कि ज्ञापन देने, समस्याओं से अवगत कराने का क्या यह समय सही है। वहीं सियासत के सिपहसालारों को भी कड़वे या उटपटांग बयानबाजी से बाज आना चाहिए और अधिकारियों, आमजन से शिष्टाचार से सलूक आना चाहिए अन्यथा सूबे की जनता समझदार है और उचित समय आने पर सियासत के ऐसे दहशतगर्दो को उनके खुद के बाड़ों में बिठा देगी।